स्वतंत्र सिनेमा में प्रेम और रिश्तों की नई परिभाषा तलाशती फिल्म 'लवरेज'
भारतीय सिनेमा के स्वतंत्र गलियारों से एक ऐसी कलाकृति सामने आ रही है जो प्रेम को केवल एक सतही भावना के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के सबसे गहरे और जटिल पहलुओं के रूप में देखती है। लेखक और निर्देशक मनोज कृष्ण की आने वाली स्वतंत्र फिल्म 'लवरेज' सिनेमा प्रेमियों के बीच खासी चर्चा का केंद्र बन चुकी है। यह फिल्म इस शाश्वत प्रश्न का उत्तर तलाशने का प्रयास करती है कि क्या प्रेम को किसी एक स्थापित परिभाषा या सामाजिक दायरे में कैद किया जा सकता है। क्या आकर्षण से परे जाकर किसी दूसरे इंसान के मन की गहराइयों और उसकी पीड़ा को महसूस करना ही सच्चा प्रेम है? ऐसे ही कई विचारोत्तेजक सवालों के साथ यह फिल्म दर्शकों के सामने आने के लिए पूरी तरह तैयार है।
हाल ही में मायानगरी मुंबई में इस बहुप्रतीक्षित फिल्म का एक विशेष प्रीमियर आयोजित किया गया, जिसमें फिल्म जगत की कई जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की। इस खास मौके पर वरिष्ठ अभिनेता शिशिर शर्मा, कला निर्देशक जयंत देसमुख, तारिक उमर खान, राजकुमार कनौजिया और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक व छायाकार शुभ्रांशु दास जैसे प्रतिष्ठित कलाकार और समीक्षक मौजूद रहे। सभी ने फिल्म के वैचारिक पक्ष और इसकी कहानी कहने के अनूठे अंदाज की खुलकर सराहना की। प्रीमियर के दौरान हुई चर्चाओं से साफ हो गया कि यह फिल्म केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि एक गंभीर वैचारिक बहस छेड़ने का माद्दा रखती है।
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अदहन क्रिएशन के बैनर तले चार अलग-अलग शहरों की चार अनकही दास्तानें
अदहन क्रिएशन के बैनर तले निर्मित की गई फिल्म 'लवरेज' मुख्य रूप से चार अलग-अलग और स्वतंत्र कहानियों का एक बेहतरीन गुलदस्ता है। इन कहानियों का कैनवास बहुत व्यापक है क्योंकि इन्हें देश के चार अलग-अलग हिस्सों यानी दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, कोलकाता और मथुरा के वास्तविक परिवेश में फिल्माया गया है। हालांकि इन सभी कहानियों के भौगोलिक और सामाजिक परिवेश एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, लेकिन इन सबको आपस में पिरोने वाला एकमात्र सूत्र 'प्रेम' और एक-दूसरे से जुड़ने की मनुष्य की मूल आवश्यकता है। निर्देशक ने बहुत ही खूबी से समाज के अलग-अलग वर्गों के जीवन संघर्षों को इन कथाओं के माध्यम से पर्दे परजीवित किया है।
इन कहानियों में केवल रोमांस का सतही आवरण नहीं है, बल्कि आम आदमी के जीवन की वे उलझनें और खामोशियां हैं जिन्हें अक्सर मुख्यधारा का सिनेमा नजरअंदाज कर देता है। हर एक कहानी अपने आप में एक अलग मिजाज रखती है, फिर भी समग्र रूप से देखने पर वे एक ही धरातल पर खड़ी नजर आती हैं। कोलकाता वाली कहानी में तो महान साहित्यकार गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक प्रसिद्ध रचना का भी बहुत ही सुंदर ढंग से समावेश किया गया है, जो इस फिल्म की साहित्यिक गहराई को और अधिक बढ़ा देता है।
तन के आकर्षण से आगे बढ़कर मन के पन्नों को टटोलता स्त्री का अनुभव
यह फिल्म विशेष रूप से स्त्री के अनुभवों और उसके भावनात्मक संसार को अपने केंद्र में रखती है। आज के व्यावसायिक दौर में जहां सिनेमा अक्सर उपभोग की वस्तु बनकर रह गया है, वहीं 'लवरेज' तन के सतही आकर्षण से कहीं आगे निकलकर मन के प्रति प्रेम की महत्ता को तलाशती है। इसमें ममता की छांव भी है, अपनेपन की गर्मी भी है और संदेह की वजह से भटकते हुए प्रेम की टीस भी साफ महसूस की जा सकती है। फिल्म की पटकथा बहुत ही पैने सवाल उठाती है कि जहां विश्वास की जगह संशय ले लेता है और अपनत्व की भावना अधिकार जमाने की जिद में बदल जाती है, वहां प्रेम का स्वरूप कैसे विकृत हो जाता है।
फिल्म यह सोचने पर मजबूर करती है कि प्रेम को जीवित रखने के लिए जहां अगाध समर्पण और भरोसे की जरूरत होती है, वहीं क्या हमारा समाज आज भी किसी दूसरे व्यक्ति की वैयक्तिक स्वतंत्रता और उसके मन की स्वतंत्र स्वीकृति देने के लिए तैयार है? 'लवरेज' महज एक दृश्य कला नहीं है, बल्कि यह प्रेम पर एक ऐसा वैचारिक संवाद है जो दर्शकों के मन में लंबे समय तक गूंजता रहता है। इसकी अधूरी और अधखिली कहानियां जीवन की पूरी दास्तान बयान कर जाती हैं, क्योंकि जरूरी नहीं कि हर रिश्ते को उसकी पसंद का अंजाम मिले ही।
संगीत का अनूठा संगम और समाज को झकझोरते तीखे सवाल
किसी भी कला फिल्म की सफलता उसकी जीवंतता और प्रामाणिकता में छिपी होती है। स्वतंत्र सिनेमा की यही ताकत होती है कि वह बिना किसी बनावटीपन के जीवन की असहज सच्चाइयों को दर्शकों के सामने रख सकता है। 'लवरेज' अपनी इसी मौलिकता के कारण खास बन जाती है। इस फिल्म के संगीत पक्ष पर भी खासी मेहनत की गई है। फिल्म में कुल चार बेहद अर्थपूर्ण गीत हैं, जिनमें से तीन गानों को अपनी सुरीली और रूहानी आवाज से सजाने का काम मशहूर गायिका मधुश्री भट्टाचार्य ने किया है। इन सभी गानों का संगीत रॉबी बादल ने तैयार किया है जो कहानी के मूड को पूरी तरह समर्थन देता है।
फिल्म की पटकथा, संवाद और गीत खुद निर्देशक मनोज कृष्ण की ही कलम से निकले हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि निर्देशक के मन में इस प्रोजेक्ट को लेकर एक स्पष्ट और परिपक्व दृष्टिकोण था। फिल्म के अंत में जब पार्श्व में गायिका मधुश्री की आवाज में यह पंक्तियां गूंजती हैं— 'पूछती फिर रही लड़कियां...'—तो दर्शक भीतर तक हिल जाते हैं। यह गीत महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा की पीड़ा और उनके प्रतिरोध को स्वर देता है।
"यह फिल्म केवल कुछ पात्रों की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर उस इंसान के भीतर झांकने का प्रयास है जो जीवन में एक बार भी सच्चे जुड़ाव और प्रेम की तलाश में निकला हो। समाज को अपनी सोच का दायरा बढ़ाने की जरूरत है।" — मनोज कृष्ण, लेखक-निर्देशक
अंततः यह गीत और फिल्म की पूरी शैली दर्शकों से एक सीधा और तीखा सवाल पूछती है कि क्या स्त्री की गरिमा, उसकी सुरक्षा और उसकी स्वतंत्रता पर उठ रहे गंभीर सवालों के जवाब देने के लिए पितृसत्तात्मक समाज कभी आगे आएगा या फिर हमेशा की तरह अपनी चुप्पी साधे रखेगा। फिल्म का यह अंत दर्शकों को सिनेमाघर से बाहर निकलते वक्त भी सोचने पर मजबूर कर देता है और यही इस स्वतंत्र सिनेमा की सबसे बड़ी जीत है।







