मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान पर घमासान, पूर्व जजों ने संभाली कमान
देशभर में इन दिनों चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी 'SIR' (Special Intensive Revision) अभियान को लेकर सियासी और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इसी बीच, इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और संवैधानिक वैधता की स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। वकीलों के प्रमुख संगठन 'लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन' (LAFC) ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन भीमराव लोकुर की अगुआई में पांच पूर्व जजों की एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच समिति का गठन किया है।
यह समिति इस बात की गहराई से पड़ताल करेगी कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाया गया यह पूरा तरीका भारतीय संविधान और मौजूदा कानूनों के दायरे में था या नहीं। इसके साथ ही यह भी परखा जाएगा कि क्या इस अभियान के दौरान किसी भी स्तर पर योग्य और पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कर दिए गए। संगठन का मानना है कि इस तरह के बड़े पैमाने पर चलाए जाने वाले प्रशासनिक अभियानों से आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा असर पड़ता है, इसलिए इसकी निष्पक्ष और पारदर्शी समीक्षा बेहद जरूरी है।
राजनीतिक जानकारों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव आयोग के कामकाज पर इस तरह की न्यायिक और कानूनी निगरानी से लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का भरोसा और मजबूत होता है। समिति के गठन के बाद से ही प्रशासनिक हलकों में भी चर्चाएं तेज हो गई हैं, क्योंकि यह जांच केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके दायरे में जमीन पर होने वाले असर का आकलन भी शामिल होगा।
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कौन-कौन दिग्गज शामिल हैं इस उच्चस्तरीय जांच समिति में?
इस स्वतंत्र जांच पैनल का दायरा और इसका नेतृत्व बेहद मजबूत चेहरों के हाथों में सौंपा गया है। जस्टिस मदन भीमराव लोकुर की अध्यक्षता वाले इस पांच सदस्यीय आयोग में न्यायपालिका के कई जाने-माने और अनुभवी पूर्व न्यायाधीश शामिल हैं। इनमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ए.के. पटनायक, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस बदर दुरेज अहमद, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रेखा शर्मा और पटना हाईकोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश के नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं।
कानूनी क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि इतने वरिष्ठ और अनुभवी न्यायविदों का एक साथ इस जांच से जुड़ना इस बात का संकेत है कि मामला कितना संवेदनशील और गंभीर है। ये सभी पूर्व जज अपने लंबे न्यायिक करियर के दौरान कई ऐतिहासिक और जटिल फैसलों का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में उनकी देखरेख में तैयार होने वाली रिपोर्ट को देश के कानूनी और प्रशासनिक हलकों में बेहद अहम दस्तावेज माना जाएगा।
समिति के गठन के साथ ही इसके कामकाज का खाका भी तैयार कर लिया गया है। यह पैनल पूरी तरह स्वायत्त रहकर अपने कार्यों को अंजाम देगा और किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त होकर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा। देश के कई प्रतिष्ठित वकील, जिनमें कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर जैसे नाम शामिल हैं, अपनी मर्जी से इस स्वतंत्र जांच प्रक्रिया में तकनीकी और कानूनी मदद देने के लिए आगे आए हैं।
कथित तौर पर 13 करोड़ से ज्यादा वोटरों के नाम हटने पर गहरी चिंता
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (LAFC) के मुताबिक, देश भर में चलाए गए इस विशेष गहन संशोधन अभियान के कारण कथित तौर पर 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूचियों से बाहर हो गए हैं। इस विशाल आंकड़े ने नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है। संगठन का तर्क है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से कटते हैं, तो यह सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और सार्वभौमिक मताधिकार के सिद्धांत पर सवालिया निशान लगाता है।
एसआईआर अभियान की शुरुआत के बाद से ही देश के अलग-अलग राज्यों से इस तरह की शिकायतें सामने आ रही थीं कि कई पुराने और वैध मतदाताओं के नाम भी सूचियों में नहीं मिल रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग समय-समय पर यह स्पष्ट करता रहा है कि प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने और फर्जी या दोहरे प्रविष्टियों को हटाने के लिए यह कदम उठाया गया है, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर पैदा हुई दिक्कतों ने विवाद को तूल दे दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मतदान का अधिकार किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होता है। ऐसे में यदि किसी तकनीकी खामी या प्रशासनिक चूक के चलते कोई पात्र नागरिक अपने वोट के अधिकार से वंचित हो जाता है, तो यह देश की लोकतांत्रिक नींव के लिए चिंता का विषय बन जाता है। इसी अंतराल को पाटने और वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए इस जांच आयोग का गठन किया गया है।
जनसुनवाई और जमीनी शोध के जरिए तैयार होगी अंतिम रिपोर्ट
यह जांच आयोग केवल बंद कमरों में बैठकर काम नहीं करेगा, बल्कि इसकी कार्यप्रणाली बेहद व्यापक और पारदर्शी होगी। समिति द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में क्षेत्रीय और पूर्ण बेंचों के माध्यम से जनसुनवाई की जाएगी। इस दौरान प्रभावित नागरिकों, स्थानीय सिविल सोसाइटी समूहों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों के बयान दर्ज किए जाएंगे, ताकि जमीनी हकीकत को पूरी तरह से समझा जा सके।
आयोग के पास एक समर्पित रिसर्च विंग भी होगी, जो देश भर से मतदाता सूची में नाम जुड़ने और कटने से जुड़े आंकड़ों को इकट्ठा करेगी और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण करेगी। इसके साथ ही एक कानूनी सहायता टीम भी बनाई गई है जो इस बात का आकलन करेगी कि संबंधित कानूनों, प्रशासनिक नोटिफिकेशन और वेरिफिकेशन प्रक्रियाओं का पालन करते वक्त संवैधानिक सुरक्षा उपायों का सही से ध्यान रखा गया या नहीं।
"मतदाता सूची में व्यापक स्तर पर सुधार और नाम हटाने की प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को परखना और यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि कोई भी पात्र नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित न रहे।" — लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (LAFC)
दिसंबर 2026 तक सार्वजनिक होगी समिति की विस्तृत रिपोर्ट
निर्धारित समयरेखा के अनुसार, यह स्वतंत्र जांच समिति अपनी पूरी प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाते हुए दिसंबर 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी। इस रिपोर्ट में न केवल कमियों और खामियों का कच्चा-चिट्ठा होगा, बल्कि भविष्य के लिए ऐसे सुधारवादी सुझाव भी दिए जाएंगे जिससे चुनाव प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाया जा सके।
इस बीच, चुनाव आयोग ने भी हाल ही में यह घोषणा की है कि जिन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां विशेष अभियान चलाकर छूटे हुए पात्र मतदाताओं और 18 साल की उम्र पूरी करने वाले नए युवाओं के नाम सूची में जोड़े जाएंगे। महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में जहाँ सबसे ज्यादा दो करोड़ से अधिक नाम वोटर लिस्ट से बाहर हुए हैं, वहां इस तरह के सुधार अभियानों की सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है। पूर्व जजों की इस समिति की रिपोर्ट आने वाले समय में देश की चुनावी राजनीति और प्रशासनिक सुधारों की दिशा तय करने में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।








