उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में प्रकृति की मार और प्रशासनिक लापरवाही ने मिलकर आम जनता का जीना मुहाल कर दिया है। जिले के कप्तानगंज इलाके में मनोरमा नदी का पानी अचानक खेतों में घुस गया है, जिससे किसानों की खड़ी फसलें पूरी तरह पानी में डूब गई हैं। शुरुआती आकलन के मुताबिक इलाके में करीब सौ बीघा धान, तिल और सब्जियों की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं। किसानों की सालभर की मेहनत इस तरह पानी में डूबने से उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट पैदा हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समय पर उचित इंतजाम न होने के कारण नदी का पानी हर साल खेतों की तरफ रुख कर लेता है और अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है।
दूसरी ओर, इसी इलाके में बुनियादी ढांचे की खस्ताहालता की एक और बानगी देखने को मिल रही है जो किसी भी बड़े हादसे को दावत दे रही है। मनोरमा नदी पर बने पैदल पुल की रेलिंग पिछले सात महीनों से गायब पड़ी है, जिसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। इस पुल से रोजाना सैकड़ों छात्र, बुजुर्ग और आम लोग गुजरते हैं लेकिन रेलिंग न होने के कारण यहां हर वक्त दुर्घटना का गंभीर खतरा बना रहता है। अंधेरा होने पर या जरा सी चूक होने पर कोई भी व्यक्ति सीधे नदी में गिर सकता है। स्थानीय निवासियों ने कई बार इस टूटी रेलिंग को ठीक कराने की गुहार लगाई है, लेकिन सरकारी दफ्तरों में फाइलें आगे बढ़ने के नाम पर सिर्फ टालमटोल किया जा रहा है।
सोनारी में नई बनी सड़क धंसी, चेक डैम की गुणवत्ता पर उठे सवाल
बस्ती के सोनारी इलाके में विकास कार्यों की पोल खोलती एक और घटना सामने आई है जहां हाल ही में बनाई गई सड़क अचानक धंस गई है। मनोरमा नदी पर बनाए गए चेक डैम के निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत से घटिया सामग्री का इस्तेमाल करके निर्माण कार्य कराया गया है, जिसकी वजह से जरा सा दबाव पड़ते ही नई सड़कें और बांध टूटने लगे हैं। इस सड़क के धंसने से आवागमन बाधित हो गया है और आसपास के गांवों के लोगों को आने-जाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जांच के नाम पर केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं, लेकिन धरातल पर सुधार का कोई नामोनिशान नहीं दिख रहा है।
इन तमाम स्थानीय समस्याओं के बीच दूसरी तरफ केरल के कोच्चि में मनोरमा न्यूज कॉन्क्लेव 2025 का आयोजन चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। इस बड़े मीडिया कार्यक्रम में देश के गृह मंत्री अमित शाह ने शिरकत की और देश के कई अहम मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी। एक तरफ जहां बड़े मंचों पर नीतियां और भविष्य के प्लान तय हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में आम जनता पानी में डूबी फसलों और जर्जर पुलों के बीच अपनी बुनियादी जिंदगी बचाने की जद्दोजहद कर रही है। राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियों और स्थानीय स्तर की इन दर्दनाक सच्चाइयों के बीच का यह अंतर साफ दिखाता है कि आम आदमी की जमीनी परेशानियां अक्सर बड़े आयोजनों की चमक-धमक में पीछे छूट जाती हैं।
बाजार में मनोरमा इंडस्ट्रीज के शेयरों में उछाल और निवेशकों का रुख
इन क्षेत्रीय और राजनीतिक हलचल के बीच कॉर्पोरेट जगत से भी मनोरमा नाम से जुड़ी एक बड़ी वित्तीय खबर सामने आई है। वित्तीय वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में मनोरमा इंडस्ट्रीज के मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। कंपनी के टैक्स चुकाने के बाद के मुनाफे यानी पैट में 137 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है, जिसके बाद शेयर बाजार में इसके शेयरों में करीब साढ़े आठ प्रतिशत की तेज उछाल देखने को मिली है। बाजार के जानकारों का मानना है कि कंपनी का यह मजबूत प्रदर्शन निवेशकों के बीच भरोसा पैदा कर रहा है। हालांकि, इन कारोबारी आंकड़ों और मुनाफे की दौड़ से कोसों दूर बस्ती के वे किसान अनजान हैं जिनकी फसलें मनोरमा नदी के पानी में डूबकर स्वाहा हो चुकी हैं।
द फ्रीलान्स की टीम ने जब जमीनी स्तर पर इन सभी मामलों की पड़ताल की तो यह साफ हुआ कि विकास के दावों और हकीकत के बीच एक बहुत गहरी खाई मौजूद है। एक तरफ कॉर्पोरेट कंपनियां और शेयर बाजार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ ग्रामीण भारत के लोग टूटे पुलों, गायब रेलिंग्स और बाढ़ जैसे हालातों से जूझने को मजबूर हैं। स्थानीय प्रशासन की यह उदासीनता न केवल उनकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि जनता के भरोसे को भी कमजोर करती है। आने वाले दिनों में अगर इन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो किसानों और स्थानीय निवासियों का गुस्सा सड़क पर फूट सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी सुस्त पड़ी स्थानीय व्यवस्था की होगी।








