नई दिल्ली/रियाद: पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक कैनवास पर एक बार फिर युद्ध के काले बादल मंडराने लगे हैं। 'द फ्रीलान्स' के इनपुट और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब के अत्यंत संवेदनशील और पवित्र शहर मदीना पर हूती विद्रोहियों द्वारा किया गया ड्रोन हमला इस क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है। इस हमले के बाद मदीना के कई इलाकों में बिजली गुल होने की सूचना ने सऊदी प्रशासन की आंतरिक सुरक्षा तैयारियों की पोल खोल दी है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
मदीना पर ड्रोन हमला: सुरक्षा तंत्र में बड़ी सेंध
यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के पवित्र स्थलों को निशाना बनाना कोई नया घटनाक्रम नहीं है, लेकिन इस बार मदीना को निशाना बनाया जाना सीधे तौर पर क्षेत्रीय स्थिरता को चुनौती देना है। हमारी ऑन-द-ग्राउंड रिपोर्ट्स और क्षेत्रीय सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल करके सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देना यह साबित करता है कि इस संघर्ष में परोक्ष रूप से प्रॉक्सी वार का दायरा बढ़ता जा रहा है। हमले के बाद मदीना के कई हिस्सों में बिजली की आपूर्ति ठप होने से नागरिकों में दहशत का माहौल है।
संबंधित खबरें
पाकिस्तान की चुप्पी और 'मक्का रक्षा समझौता' की सार्थकता
इस पूरे घटनाक्रम के बीच इस्लामाबाद की संदिग्ध चुप्पी ने अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों को चौंका दिया है। दशकों से सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान का सैन्य और सामरिक समझौता रहा है, जिसे अक्सर 'मक्का रक्षा समझौता' के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और पवित्र स्थलों की रक्षा का मौन या लिखित वादा किया था। हालांकि, हूती हमलों के इस मौजूदा दौर में पाकिस्तानी हुक्मरानों की चुप्पी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या यह रक्षा समझौता अब केवल कागजी साबित हो रहा है या फिर घरेलू आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अब पश्चिम एशिया के पचड़े में पड़ने से कतरा रहा है।
ईरान की दो टूक और होर्मुज जलडमरूमध्य का भू-राजनीतिक पेंच
मदीना पर हुए इस हमले के तार अप्रत्यक्ष रूप से तेहरान की नीतियों से भी जोड़े जा रहे हैं। हाल ही में ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भेजे गए किसी भी कूटनीतिक प्रस्ताव या शर्तों को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरान ने अपनी पांच कड़ी शर्तें रखी हैं, जिनमें वैश्विक तेल आपूर्ति की सबसे बड़ी धुरी—'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) पर अपना नियंत्रण बनाए रखने का स्पष्ट संदेश शामिल है। ईरान ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि होर्मुज का कंट्रोल पूरी तरह से उसके पास ही रहेगा और वह अमेरिकी या पश्चिमी प्रभाव को कतई स्वीकार नहीं करेगा।
ऐतिहासिक कनेक्शन और क्षेत्रीय अस्थिरता
इस व्यापक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व और उससे जुड़े सत्ता समीकरणों पर भी लगातार चर्चा हो रही है। हाल के घटनाक्रमों और खामेनेई शासन से जुड़े ऐतिहासिक व कूटनीतिक पहलुओं ने वैश्विक मीडिया का ध्यान खींचा है, जिसमें उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से ईरानी शासन के पुराने धार्मिक और सांस्कृतिक संपर्कों तक की चर्चाएं फिर से प्रासंगिक हो उठी हैं। यह दर्शाता है कि पश्चिम एशिया की राजनीति और भारत के बीच के तार कितने गहरे और पुराने हैं।
द फ्रीलान्स का निष्कर्ष
मदीना पर हूती हमला, पाकिस्तान की कूटनीतिक विवशता और ईरान-अमेरिका के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर खिंची तलवारें इस बात का संकेत हैं कि आने वाले दिनों में वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और मध्य-पूर्व की शांति दांव पर लगने वाली है। यदि सऊदी अरब अपनी संप्रभुता और पवित्र शहरों की सुरक्षा के लिए ठोस जवाबी कदम नहीं उठाता है, तो ईरान समर्थित मिलिशिया का यह दुस्साहस पूरे खाड़ी देशों को एक भीषण युद्ध की आग में झोंक सकता है।








