अंतरिक्ष की गहराइयों में मिला अनोखा खगोलीय पिंड
ब्रह्मांड अपनी विशालता और रहस्यों के लिए हमेशा से वैज्ञानिकों को हैरान करता आया है। अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े शोधकर्ताओं ने हमारी अपनी आकाशगंगा यानी मिल्की वे में एक बेहद दुर्लभ और अद्भुत खगोलीय घटना का पता लगाया है। खगोलविदों ने पहली बार एक ऐसा 'माइक्रोब्लेजर' खोज निकाला है, जो अंतरिक्ष में लगातार ऊर्जा और पदार्थ के रूप में तबाही जैसी स्थिति पैदा कर रहा है। यह अपनी तरह की पहली खोज है जिसने खगोल विज्ञान की दुनिया में खासी हलचल पैदा कर दी है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह रहस्यमयी सिस्टम हमारी धरती से करीब 12,000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है। इसे अंतरिक्ष अनुसंधान में 'IRAS 18293−0941' नाम दिया गया है। इस अनोखे सिस्टम में एक सामान्य तारे के बराबर द्रव्यमान वाला ब्लैक होल अपने विशाल साथी तारे की परिक्रमा कर रहा है। ये दोनों आकाशीय पिंड अंतरिक्ष में एक दूसरे के बेहद करीब हैं और एक तयशुदा चक्र के तहत अपनी गति बनाए रखते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह ब्लैक होल अपने आस-पास के साथी तारे से लगातार पदार्थ खींच रहा है। जब यह पदार्थ ब्लैक होल के भीतर समाता है, तो उसके ध्रुवों से जबरदस्त ऊर्जा पैदा होती है। इसी प्रक्रिया के दौरान दो बेहद शक्तिशाली प्लाज़्मा जेट बाहर की तरफ फेंके जाते हैं, जिनमें से एक सीधा हमारी पृथ्वी की तरफ इशारा कर रहा है। यह स्थिति अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में बेहद रोमांचक मानी जा रही है।
संबंधित खबरें
कैसे काम करता है यह खगोलीय इंजन और क्या है इसका आकार?
आम तौर पर 'ब्लेज़र' उन अत्यंत विशाल ब्लैक होल्स को कहा जाता है, जिनका आकार और द्रव्यमान हमारे सूरज से लाखों या अरबों गुना ज्यादा बड़ा होता है। इस तरह के विशालकाय ब्लेज़र आमतौर पर दूर-दराज की आकाशगंगाओं के बिल्कुल केंद्र में पाए जाते हैं। इसके विपरीत, जिस माइक्रोब्लेजर को हाल ही में खोजा गया है, उसका आकार तुलनात्मक रूप से बहुत छोटा है। इस ब्लैक होल का द्रव्यमान सूरज से केवल कुछ सौ गुना ज्यादा ही आंका गया है।
वैज्ञानिक पिछले तीन दशकों से इस तरह के किसी सिस्टम की तलाश में जुटे थे, लेकिन यह अंतरिक्ष में फैली गैस और धूल के घने बादलों के पीछे छिपा हुआ था। इस वजह से सामान्य ऑप्टिकल दूरबीन से ली गई तस्वीरों में यह लगभग अदृश्य बना रहा। साल 1983 में IRAS सैटेलाइट ने इसे अपनी सूची में जरूर शामिल किया था, जिसके बाद यह वैज्ञानिकों की नजरों से ओझल हो गया था और लंबे समय तक इस पर किसी का ध्यान नहीं गया।
हाल के दिनों में जब वैज्ञानिकों ने इस तारे की रोशनी में हो रही हल्की झिलमिलाहट का बारीकी से अध्ययन किया, तो इस राज से पर्दा उठा। डेटा के विश्लेषण से साफ हुआ कि ब्लैक होल हर 11.4 दिन में अपने साथी तारे की एक पूरी परिक्रमा करता है। इसके बाद अत्याधुनिक रेडियो टेलीस्कोप्स की मदद से इसके रेडियो वेव्ज़ का अध्ययन किया गया, जिससे इस एकतरफा शक्तिशाली जेट की मौजूदगी का ठोस प्रमाण मिला।
अत्याधुनिक टेलीस्कोप्स की मदद से हुई पुष्टि
इस अद्भुत खोज को प्रमाणित करने के लिए दुनिया भर के कई बड़े खगोलीय नेटवर्क ने मिलकर काम किया। यूरोपियन वीएलबीआई नेटवर्क के हाई-रिज़ॉल्यूशन रेडियो टेलीस्कोप्स की मदद से इस बात की पक्की पुष्टि की गई कि यह ऊर्जावान जेट इसी स्थानीय सिस्टम से निकल रहा है, न कि किसी दूर की अन्य आकाशगंगा से। इसके अलावा मीरकैट रेडियो वेधशाला के आंकड़ों ने इस रहस्य को और अधिक स्पष्ट कर दिया।
वेधशाला के अनुसार, इस सिस्टम के पास लगभग 100 प्रकाश वर्ष चौड़ा गैस का एक बुलबुला मौजूद है। जब ये तेज़ रफ्तार जेट अंतरतारकीय गैस और धूल के बादलों से टकराते हैं, तो वहां एक बहुत चमकदार हॉटस्पॉट बन जाता है। इस स्थान पर अंतरिक्ष के कण अत्यधिक ऊर्जा पाकर और ज्यादा तेज हो जाते हैं, जिससे वहां मौजूद धूल गर्म हो जाती है और हाइड्रोजन गैस बहुत तेजी से चमकने लगती है।
"यह खोज हमारे लिए अंतरिक्ष विज्ञान में एक अनूठा अवसर लेकर आई है। अब हम अपने घर के इतने करीब रहकर एक ब्लेज़र जैसी जटिल व्यवस्था का विस्तार से अध्ययन कर सकते हैं, जो पहले केवल दूर की आकाशगंगाओं में ही संभव था।"— डॉ. खगोल वैज्ञानिक अनुसंधान दल
ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली पार्टिकल एक्सेलेरेटर
शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह हॉटस्पॉट हाई-एर्जी गामा-रे का एक बहुत बड़ा स्रोत भी है। इन फोटॉन्स की ऊर्जा हमारे ग्रह पर मौजूद सबसे बड़े पार्टिकल एक्सेलेरेटर 'लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर' यानी LHC की तुलना में दस गुना या उससे भी अधिक आंकी गई है। कुछ शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, इन कणों की ऊर्जा पेटाइलेक्ट्रॉनवोल्ट तक पहुंच सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि यह सिस्टम हमारी आकाशगंगा के सबसे शक्तिशाली प्राकृतिक कण त्वरकों में से एक है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जेट सूरज द्वारा उत्सर्जित की जाने वाली सामान्य ऊर्जा से लगभग पांच लाख गुना अधिक ऊर्जा अपने साथ लेकर चल रहा है। यह अंतरिक्ष में ऊर्जा के प्रसार का एक नया और अनोखा मॉडल पेश करता है, जिससे यह समझने में आसानी होगी कि ब्लैक होल किस तरह अपनी ऊर्जा को आस-पास के अंतरिक्ष में फैलाते हैं और ब्रह्मांड के भौतिकी नियमों को प्रभावित करते हैं।
भविष्य के अंतरिक्ष शोध के लिए क्यों अहम है यह खोज?
इस माइक्रोब्लेजर की खोज से खगोल भौतिकीविदों को ब्लैक होल और उनसे निकलने वाले जेट्स के बीच के आपसी संबंधों को समझने में बहुत मदद मिलेगी। दूर मौजूद विशाल ब्लेज़र पृथ्वी से इतनी दूरी पर हैं कि उनकी हर एक गतिविधि की सूक्ष्म जांच करना असंभव सा हो जाता है। लेकिन यह पास का माइक्रोब्लेजर वैज्ञानिकों के लिए एक लैबोरेटरी की तरह काम करेगा।
इस अध्ययन को पूरा करने के लिए रेडियो, ऑप्टिकल, एक्स-रे, गामा-रे और इन्फ्रारेड टेलीस्कोप्स का एक साथ इस्तेमाल किया गया। अंतरिक्ष विज्ञान के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस तरह के और भी कई छिपे हुए सिस्टम्स का पता लगाया जा सकेगा, जो हमारे ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसकी कार्यप्रणाली से जुड़े अनगिनत अनसुने रहस्यों से पर्दा उठाएंगे।







