चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गरमाई सियासत
देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली हमेशा से आम नागरिकों की नजर के केंद्र में रही है। हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर आई कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने राजनीतिक हलकों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इन रिपोर्ट्स के सामने आने के बाद से ही विपक्षी दलों के साथ-साथ सत्ता पक्ष के भीतर भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सत्तारूढ़ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के कई अहम घटक दल खुलकर सामने आ गए हैं और उन्होंने चुनाव आयोग से इस विवाद पर आधिकारिक और पारदर्शी स्पष्टीकरण देने का आग्रह किया है।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह बेहद जरूरी माना जाता है कि चुनाव संचालन करने वाली संस्था की निष्पक्षता पर किसी भी प्रकार का दाग न लगे। यही वजह है कि एनडीए के प्रमुख नेताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि आयोग को आगे आकर उन तमाम बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए जिनसे आम जनता के मन में किसी भी प्रकार का असमंजस पैदा हो सकता है। संस्था की विश्वसनीयता को बनाए रखना ही देश की चुनावी प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत है और इसी ताकत को सुरक्षित रखने की कवायद अब राजनीतिक मंचों पर दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब भी किसी संवैधानिक संस्था के आंतरिक कामकाज या फैसलों पर सवालिया निशान लगते हैं, तो पारदर्शिता ही सबसे बड़ा उपाय साबित होती है। मौजूदा समय में जब सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से सूचनाएं बहुत तेजी से फैलती हैं, तब किसी भी प्रकार का भ्रम पलभर में बड़ा रूप ले सकता है। ऐसे में समय रहते स्थिति का साफ किया जाना बेहद आवश्यक हो जाता है ताकि किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता पर आंच न आए।
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चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की दो टूक
एनडीए के प्रमुख सहयोगियों में शुमार केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने इस पूरे मसले पर बेहद सधा हुआ लेकिन कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि वे सरकार के एक हिस्से के रूप में किसी संस्था का केवल बचाव करने के लिए बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि उनका मुख्य कंसर्न जनता के भरोसे को कायम रखना है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि विपक्ष क्या कहता है और राजनीतिक फायदे के लिए क्या रुख अपनाता है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आम मतदाता का चुनाव प्रक्रिया से विश्वास न डगमगाए।
चिराग पासवान ने मीडिया से चर्चा के दौरान कहा कि चुनाव आयोग को विपक्ष के हर राजनीतिक बयान का जवाब देने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन नागरिकों के मन में उठ रहे बुनियादी सवालों और गलतफहमियों का समाधान करना उसकी नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर देश की जनता का चुनावी व्यवस्था पर से भरोसा उठ गया, तो वह भारतीय लोकतंत्र के लिए कतई एक अच्छा संकेत नहीं होगा। संस्थाओं की साख बचाने के लिए यह जरूरी है कि आयोग खुद पहल करे और सच को सामने रखे।
"अगर लोगों का चुनावी व्यवस्था पर से भरोसा कम होने लगे तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा। इसलिए, मेरा मानना है कि चुनाव आयोग को और अधिक सशक्त तरीके से स्पष्टीकरण देना चाहिए। उसे राजनीतिक बयनों का जवाब देने की जरूरत नहीं, बल्कि लोगों के मन में मौजूद गलतफहमियों को दूर करना चाहिए।" — चिराग पासवान, केंद्रीय मंत्री
दूसरी तरफ, जनता दल यूनाइटेड (JDU) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा ने भी इस मामले में अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े विवाद का जिक्र करते हुए कहा कि इस प्रक्रिया ने धरातल पर काफी भ्रम पैदा किया है। कुशवाहा के अनुसार, जब तक इस तरह के मामलों में जमीनी हकीकत को पारदर्शी तरीके से जनता के सामने नहीं रखा जाएगा, तब तक अफवाहों का बाजार गर्म रहेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि निर्वाचन आयोग जल्द से जल्द वास्तविक स्थिति से सबको अवगत कराए।
तेलुगु देशम पार्टी का दृष्टिकोण और पारदर्शिता की मांग
इस पूरे घटनाक्रम में आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली तेलुगु देशम पार्टी (TDP) ने भी अपनी महत्वपूर्ण राय रखी है। टीडीपी सांसद लावु श्रीकृष्णा देवरायलु ने अपने एक बयान में स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी मानती है कि भारत निर्वाचन आयोग एक बेहद प्रतिष्ठित और स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसे देश में निष्पक्ष चुनाव कराने का कठिन दायित्व सौंपा गया है। जब भी इस संस्था की कार्यप्रणाली पर कोई सवाल उठाए जाते हैं, तो आयोग का दायित्व बनता है कि वह उचित और तथ्यपरक स्पष्टीकरण दे।
टीडीपी के अनुसार, आंध्र प्रदेश में हाल ही में संपन्न हुआ विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का अभियान काफी हद तक सफल रहा है, लेकिन इसके बावजूद यदि राष्ट्रीय स्तर पर किसी तरह की असमंजस की स्थिति बन रही है, तो उसका निवारण किया जाना चाहिए। पारदर्शिता ही वह माध्यम है जिससे किसी भी संस्था की नींव मजबूत होती है। यदि चुनाव आयोग इस मामले में खुलकर अपनी बात रखता है, तो इससे न केवल जनता के बीच का भ्रम दूर होगा बल्कि संस्था की गरिमा और अधिक पुख्ता होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एनडीए के भीतर से इस तरह की मांग उठना इस बात का संकेत है कि सत्ता पक्ष भी लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थागत स्वतंत्रता के प्रति सचेत है। गठबंधन के सहयोगी दल यह भली-भांति समझते हैं कि यदि चुनाव आयोग जैसी संस्था की निष्पक्षता पर दीर्घकालिक असर पड़ा, तो इसका नुकसान अंततः देश की पूरी राजनीतिक व्यवस्था को उठाना पड़ेगा। यही कारण है कि समय रहते स्थिति साफ करने की यह पुरजोर वकालत की जा रही है।
देश की चुनावी व्यवस्था और आम नागरिकों का विश्वास
भारतीय लोकतंत्र की पूरी धुरी इस बात पर टिकी हुई है कि देश का आम मतदाता अपनी मर्जी से बिना किसी डर या दबाव के अपनी सरकार चुन सके। इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता सबसे अहम होती है। जब भी आयोग के प्रशासनिक निर्णयों या अंदरूनी कार्यप्रणाली को लेकर कोई सनसनीखेज रिपोर्ट सामने आती है, तो उसका सीधा असर आम आदमी के विश्वास पर पड़ने का खतरा पैदा हो जाता है।
यही वजह है कि एनडीए के घटक दलों का यह रुख काफी मायनों में खास माना जा रहा है। आमतौर पर राजनीतिक दल अपने खेमे से जुड़ी हर बात पर चुप्पी साध लेते हैं या केवल बचाव की मुद्रा अपनाते हैं, लेकिन यहाँ सहयोगियों ने जनता के मन के संशय को प्राथमिकता दी है। उन्होंने साफ संदेश दिया है कि संस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी होती हैं और उनकी विश्वसनीयता पर कोई आंच नहीं आनी चाहिए।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनाव आयोग इन तमाम राजनीतिक और सार्वजनिक अपीलों का संज्ञान लेते हुए कोई विस्तृत रिपोर्ट या स्पष्टीकरण जारी करता है या नहीं। फिलहाल, इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि देश की चुनावी प्रणाली की पवित्रता को लेकर हर राजनीतिक दल और जागरूक नागरिक बेहद संवेदनशील हैं। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए पारदर्शिता और संवाद का यह दौर आगे भी जारी रहने की पूरी उम्मीद है।



