ग्रामीणों को मालिकाना हक दिलाने के अभियान में तेजी
मध्य प्रदेश में ग्रामीण इलाकों की संपत्तियों को कानूनी वैधता और वित्तीय मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से चलाई जा रही स्वामित्व योजना अब एक अहम मोड़ पर पहुंच चुकी है। राज्य के सुदूर गांवों तक रहवासियों को उनकी आवासीय जमीनों और संपत्तियों का पक्का हक देने के लिए सरकार ने प्रशासनिक कसावट तेज कर दी है। योजना के तहत राज्य के हजारों गांवों में ड्रोन सर्वे और मैपिंग का काम पूरा किया जा चुका है, जिसके आधार पर अब पात्र हितग्राहियों को निःशुल्क रजिस्ट्री सौंपने का महाअभियान संचालित किया जा रहा है। सरकार का यह प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने और जमीन से जुड़े पारिवारिक तथा कानूनी विवादों को हमेशा के लिए खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया को जमीन पर अमलीजामा पहनाने की जिम्मेदारी जिन मैदानी कर्मचारियों के कंधों पर है, उनकी ओर से अपेक्षित गति न मिलने की शिकायतें लगातार शासन तक पहुंच रही थीं। पिछले कुछ हफ्तों से कई जिलों में रजिस्ट्री का काम सुस्त पड़ गया था या फिर प्रशासनिक स्तर पर टालमटोल का रवैया अपनाया जा रहा था। आम जनता को हो रही इस असुविधा को गंभीरता से लेते हुए अब राज्य के मुख्य कार्यकारी स्तर से सीधी दखलंदाजी शुरू कर दी गई है, जिससे प्रशासनिक तंत्र में हड़कंप मच गया है।
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मुख्यमंत्री मोहन यादव की दो टूक: काम में लापरवाही अस्वीकार्य
हाल ही में हुई उच्च स्तरीय बैठकों के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य के विभिन्न विभागों के कामकाज की समीक्षा की। इस दौरान राजस्व विभाग के एजेंडे पर विशेष रूप से चर्चा की गई। स्वामित्व योजना के तहत रजिस्ट्री कार्य में आ रही बाधाओं का संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री ने बेहद सख्त तेवर दिखाए। उन्होंने राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से दो टूक शब्दों में कहा कि जब सरकार ने स्पष्ट नीति बना दी है और हर हितग्राही को उसका हक मिलना तय है, तो इसमें किसी भी प्रकार की हीलाहवाली या आनाकानी किसी भी कीमत पर सहन नहीं की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि जो कर्मचारी या मैदानी अमला शासन के इस महत्वपूर्ण अभियान में सहयोग करने से कतरा रहा है या रजिस्ट्री प्रक्रिया को बेवजह लटका रहा है, उनकी पहचान कर तत्काल प्रभाव से सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। सरकार का संदेश बिल्कुल साफ है कि जनता के कल्याण से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में किसी भी स्तर पर ढिलाई दिखाने वाले अफसरों और कर्मचारियों को बख्शा नहीं जाएगा।
"रस्तरी तो कराना है। जब बता दिया है कि शासन रजिस्ट्री करा रहा है और शासन के प्रतिनिधि के रूप में काम करना है तो फिर क्यों टालमटोल हो रही है?" — डॉ. मोहन यादव, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश
लाखों परिवारों के जीवन में आ रहा है बड़ा बदलाव
स्वामित्व योजना के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह प्रदेश के इतिहास के सबसे बड़े ग्रामीण कल्याणकारी अभियानों में से एक है। राज्य के हजारों गांवों में लाखों प्लॉटों का सटीक सर्वे पूरा होने के बाद अब उन परिवारों के चेहरे पर राहत साफ झलक रही है, जो पीढ़ियों से बिना किसी आधिकारिक दस्तावेज के अपनी ही जमीन पर रह रहे थे। इन पक्के दस्तावेजों के मिल जाने से ग्रामीण अब बैंकों से आसानी से ऋण प्राप्त कर सकेंगे, जिससे स्वरोजगार और कृषि के अलावा अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
इसके अलावा, पुश्तैनी जमीनों और मकानों पर मालिकाना हक मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी जमीन विवादों में भी भारी कमी आएगी। सरकार का मानना है कि इस योजना का सीधा लाभ राज्य के करीब 50 लाख परिवारों को मिलना है, और यदि इस प्रक्रिया में कोई अधिकारी या कर्मचारी बाधा बनता है, तो वह सीधे तौर पर ग्रामीण विकास की राह में रोड़ा अटका रहा है।
सहकारिता और प्रशासनिक सुधारों का समन्वय
एक तरफ जहां स्वामित्व योजना के जरिए ग्रामीण संपत्तियों को कानूनी दर्जा दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सहकारिता क्षेत्र को भी मजबूत करने के प्रयास तेजी से चल रहे हैं। हाल ही में विभिन्न मंचों पर यह बात सामने आई है कि किस प्रकार ग्रामीण और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार वित्तीय संस्थाओं के जरिए किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध करा रही है। जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के माध्यम से किसानों को समय पर आर्थिक मदद मिलने से ग्रामीण अंचल में खुशहाली लौट रही है।
इन तमाम सकारात्मक पहलों के बीच प्रशासनिक तंत्र की कार्यकुशलता सबसे बड़ा पैमाना बन गई है। जब तक मैदानी स्तर पर पटवारी और राजस्व अधिकारी पूरी ईमानदारी और तत्परता के साथ काम नहीं करेंगे, तब तक शासन की योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा। यही वजह है कि सरकार अब पूरी तरह से एक्शन मोड में नजर आ रही है और किसी भी प्रकार की प्रशासनिक सुस्ती को दूर करने के लिए ताबड़तोड़ निर्देश जारी किए जा रहे हैं।
भविष्य की रूपरेखा और आम जनता की उम्मीदें
आगामी दिनों में प्रशासन की यह सख्ती और अधिक रंग लाती दिख सकती है। जिन जिलों में स्वामित्व योजना की रजिस्ट्री का काम धीमा चल रहा है, वहां विशेष निगरानी दल गठित किए जा सकते हैं जो हर दिन की प्रगति रिपोर्ट सीधे मुख्यालय को सौंपेंगे। जनता को भी उम्मीद है कि प्रशासनिक फेरबदल और कड़ी चेतावनी के बाद अब उन्हें अपने जमीनी दस्तावेजों के लिए दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
सरकार का यह सख्त संदेश यह भी बताता है कि नीतिगत निर्णयों को जमीन पर उतारने के मामले में राजनीतिक इच्छाशक्ति पूरी तरह मजबूत है। अब देखना यह होगा कि मैदानी अमला मुख्यमंत्री की इस चेतावनी के बाद कितनी तेजी से अपने काम की रफ्तार बढ़ाता है और कितनी जल्दी लंबित पड़ी रजिस्ट्रियों का बैकलॉग खत्म होता है।








