लाल ग्रह पर पानी के निशान खोजने की दिशा में एक और मील का पत्थर
अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में लगातार ऐसे खुलासे हो रहे हैं जो इंसानी जिज्ञासा को और ज्यादा बढ़ा देते हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अत्याधुनिक पर्सिवरेंस रोवर ने मंगल ग्रह की सतह पर एक ऐसी खोज कर डाली है, जो हमारे सौर मंडल के इतिहास को देखने का नजरिया बदल सकती है। वैज्ञानिकों को इस लाल ग्रह पर पानी के प्राचीन वजूद से जुड़े बेहद ठोस और चौंकाने वाले सबूत हाथ लगे हैं। इस ताजा खुलासे ने एक बार फिर इस बहस को जिंदा कर दिया है कि क्या कभी इस बंजर और ठंडे ग्रह पर भी जीवन पनपने लायक स्थितियां मौजूद थीं।
विशेषज्ञों की शुरुआती अटकलें थीं कि जेजेरो क्रेटर के मार्जिन यूनिट इलाके में तलछटी चट्टानें मिलेंगी। लेकिन जब रोवर ने वहां पहुंचकर जमीनी हकीकत टटोली, तो नजारा बिल्कुल अलग मिला। ऑर्बिटल डेटा के उलट वहां कार्बोनेट खनिजों की जगह आग्नेय चट्टानों के भंडार मिले। ये चट्टानें उस समय बनी थीं जब कभी मंगल के भीतर मैग्मा ठंडे होकर जमा हुआ था। हैरानी की बात यह है कि इन ज्वालामुखीय चट्टानों के भीतर पानी के साथ हुई रासायनिक प्रतिक्रियाओं के निशान आज भी सुरक्षित बचे हुए हैं, जिन्हें वैज्ञानिकों ने डिकोड कर लिया है।
संबंधित खबरें
सुपरकैम की लेजर तकनीक से हुआ चट्टानों का पर्दाफाश
इस पूरी खोज के केंद्र में पर्सिवरेंस रोवर पर लगा सुपरकैम उपकरण रहा है। इस हाई-टेक यंत्र ने अपनी लेजर तकनीक का कमाल दिखाते हुए जेजेरो क्रेटर की 185 से ज्यादा अलग-अलग चट्टानी सतहों का बेहद बारीकी से केमिकल एनालिसिस किया। इस गहन जांच-परख से जो तथ्य बाहर आए, उन्होंने शोधकर्ताओं को भी अचंभित कर दिया। डेटा साफ तौर पर यह बताता है कि इन चट्टानों की मूल बनावट को बदलने में पानी की बहुत बड़ी भूमिका रही है, और यह प्रक्रिया किसी एक बार में नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग दौर में पूरी हुई थी।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पानी के संपर्क में आने का यह पूरा चक्र बेहद दिलचस्प रहा है। पहले चरण में कम ऊंचाई वाले इलाकों की चट्टानों में मौजूद ओलिविन के दाने टूट गए और उनमें सिलिका की मात्रा पाई गई। इसके बाद जब कार्बन-डाइऑक्साइड से भरपूर भूजल इन चट्टानों के संपर्क में आया, तो उनके अंदर कार्बोनेट से भरी हुई बारीक दरारें विकसित हो गईं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मंगल के शुरुआती दिनों में पानी सिर्फ सतह पर ही नहीं, बल्कि जमीन के भीतर भी सक्रिय रूप से बह रहा था।
तीन अलग-अलग चरणों में बदला मंगल की चट्टानों का भूगोल
शोधकर्ताओं ने पानी के बहाव के दूसरे चरण को जेजेरो क्रेटर की प्राचीन झील से जोड़कर देखा है। क्रेटर की उस झील के जलस्तर के नीचे रहने वाली चट्टानों के अंदर सिलिका की भारी मौजूदगी मिली है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि वहां लंबे समय तक पानी ठहरा हुआ था। यह चरण इस बात का सबूत है कि मंगल ग्रह पर कभी बड़े जल स्त्रोत हुआ करते थे, जो आज पूरी तरह सूख चुके हैं।
तीसरा और आखिरी चरण इस पूरी रिसर्च का सबसे रोमांचक हिस्सा माना जा रहा है। मार्जिन यूनिट के पूर्वी हिस्से में वैज्ञानिकों को कैल्शियम सल्फेट और फ्लोराइट से भरी हुई खनिज शिराएं मिली हैं। विज्ञान के जानकारों का कहना है कि फ्लोराइट अमूमन तब बनता है जब बेहद गर्म भूजल किसी ज्वालामुखी से जुड़ी चट्टानों के बीच से होकर गुजरता है। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मंगल के गर्भ में एक समय पर मजबूत हाइड्रोथर्मल गतिविधियां यानी गर्म पानी के सोते सक्रिय रहे होंगे।
"पर्सिवरेंस रोवर के जरिए जेजेरो क्रेटर में मिले ये रासायनिक प्रमाण हमारे लिए एक टाइम कैप्सूल की तरह हैं। इनसे पता चलता है कि मंगल का अतीत सिर्फ सूखा नहीं था, बल्कि वहां पानी के कई अलग-अलग और जटिल चक्र चल चुके थे।" — अंतरिक्ष वैज्ञानिक, नासा
भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और जीवन की तलाश की उम्मीदें
नासा का यह रोवर सिर्फ ग्रहों की बनावट का अध्ययन करने नहीं उतरा है, बल्कि उसका सबसे बड़ा लक्ष्य मंगल पर प्राचीन सूक्ष्मजीवों यानी माइक्रोबियल लाइफ के निशान खोजना है। पृथ्वी पर कार्बोनेट और अन्य खनिज अक्सर उथले पानी में बनते हैं और वे अपने भीतर प्राचीन जीवों के जीवाश्मों या जैविक अवशेषों को सुरक्षित रखने की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक इन चट्टानों के नमूनों को लेकर इतने ज्यादा उत्साहित हैं।
फिलहाल पर्सिवरेंस रोवर ने इन मूल्यवान चट्टानों और मिट्टी के नमूनों को बहुत सावधानी से अपने पेट में बने विशेष चैंबर में स्टोर करना शुरू कर दिया है। आने वाले दशकों में जब भी कोई अगला मार्स रिटर्न मिशन भेजा जाएगा, तो इन सीलबंद नमूनों को सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाया जाएगा। धरती की अत्याधुनिक लैब में जब इन पत्थरों की जांच होगी, तो शायद हमें उस सवाल का जवाब मिल जाए जिसका इंतजार सदियों से वैज्ञानिक कर रहे हैं — क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा भी कहीं जीवन का वजूद था?








