देशभर में कैसे फैला हुआ है कोढ़ा गैंग का जाल
भारतीय अपराध जगत में पिछले कुछ दशकों से एक ऐसा नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है, जिसने देश के कई राज्यों की पुलिस और न्यायव्यवस्था की नींद उड़ा रखी है। हम बात कर रहे हैं बिहार के कटिहार जिले से ताल्लुक रखने वाले कुख्यात कोढ़ा गैंग की। यह गिरोह अब किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके शातिर अपराधी देश के अलग-अलग कोनों में जाकर वारदातों को अंजाम देते हैं और हवा की तरह गायब हो जाते हैं। इनकी कार्यशैली इतनी शातिर होती है कि पलक झपकते ही ये बैंक, एटीएम या आभूषण की दुकानों के बाहर से बड़ी रकम या कीमती सामान लेकर फरार हो जाते हैं।
इस गिरोह के अपराधी अपराध करने के लिए आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार, ये लोग ट्रेन, विमान या फिर अत्याधुनिक हाई-स्पीड बाइकों के जरिए दूसरे राज्यों के बड़े शहरों में पहुंचते हैं। वहां कुछ समय तक रेकी करने के बाद ये सुनियोजित तरीके से वारदात को अंजाम देते हैं। खास बात यह है कि घटना को अंजाम देने के कुछ ही मिनटों के भीतर ये अपराधी राज्य की सीमाएं पार कर लेते हैं, जिससे स्थानीय पुलिस के लिए इन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है। पिछले एक दशक के दौरान इस अकेले गिरोह के खिलाफ देश भर के विभिन्न थानों में तीन हजार से अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जो इसकी व्यापकता को बयां करते हैं।
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अदालतों और कानून की आंखों में धूल झोंकने के हथकंडे
जब दूसरे राज्यों की पुलिस इन शातिरों को पकड़ने में कामयाब हो भी जाती है, तब एक नई कानूनी उलझन शुरू होती है। ये अपराधी इतने शातिर होते हैं कि गिरफ्तारी के बाद फर्जी दस्तावेजों और गढ़े गए जाली पतों के आधार पर अदालत से आसानी से जमानत हासिल कर लेते हैं। न्यायिक प्रक्रिया के दौरान जब इन पर आरोप सिद्ध हो जाते हैं और अदालतें इन्हें सजा सुनाती हैं, तब असली पेंच फंसता है। सजा के बाद जब वारंट और कुर्की-जब्ती के आदेश जारी होते हैं, तो पुलिस को वह इंसान और उसका वह पता कहीं नहीं मिलता, जो कागजों में दर्ज होता है।
फर्जी नाम और पते के सहारे अदालतों को गुमराह करने की यह कला इस गिरोह के सदस्यों ने बखूबी सीख ली है। स्थिति यह बन जाती है कि दूसरे राज्यों से वारंट लेकर आने वाली पुलिस टीमें स्थानीय गांवों की धूल फांकती रह जाती हैं। कागजी औपचारिकताओं और दस्तावेजों के सत्यापन में उलझकर न्याय प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है, जिसका सीधा फायदा ये शातिर अपराधी उठाते हैं। कई मामलों में तो स्थिति यह हो जाती है कि बाहरी राज्यों की पुलिस को स्थानीय स्तर पर लोगों से अपने ही आरोपियों की निशानदेही कराने के लिए मनुहार करनी पड़ती है।
जुराबगंज और रौतारा बने आपराधिक गतिविधियों के मुख्य केंद्र
कटिहार जिले का कोढ़ा प्रखंड का क्षेत्र, जो भागलपुर के काफी नजदीक पड़ता है, लंबे समय से इन गैरकानूनी गतिविधियों का गढ़ बना हुआ है। प्रशासनिक दस्तावेजों के मुताबिक, यह पूरा गिरोह मुख्य रूप से दो बड़े हिस्सों में बंटा हुआ है। इसका एक बड़ा धड़ा कोढ़ा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले जुराबगंज इलाके में सक्रिय है, जबकि दूसरा मुख्य केंद्र रौतारा क्षेत्र में संचालित होता है। इन दोनों ही इलाकों में आए दिन देश के अन्य राज्यों की पुलिस टीमों का आना-जाना लगा रहता है।
स्थानीय थानों की स्थिति यह है कि वहां लगभग हर समय दूसरे राज्यों से आए पुलिसकर्मी अपने मामलों के सिलसिले में बैठे नजर आते हैं। चूंकि इन अपराधियों के असली ठिकानों का पता लगाना और उनका सत्यापन करना बाहरी पुलिस के लिए अकेले मुमकिन नहीं होता, इसलिए उन्हें स्थानीय पुलिस बल का सहयोग लेना पड़ता है। दोनों राज्यों की पुलिस के बीच समन्वय स्थापित कर इन वारंटों का निष्पादन कराने की प्रक्रिया इन दिनों काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है, क्योंकि अपराधी बार-बार अपने ठिकाने बदलने में माहिर हैं।
पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का शिकंजा, कसे जा रहे हैं कानूनी फंदे
भले ही ये शातिर अपराधी कानून की नजरों से बचने के लिए नए-नए पैंतरे अपनाते हों, लेकिन अब सुरक्षा एजेंसियां भी इनके खिलाफ आक्रामक रुख अपना चुकी हैं। इस गिरोह की कमर तोड़ने के लिए विभिन्न राज्यों की पुलिस ने आपसी समन्वय को और अधिक मजबूत किया है। हाल ही के दिनों में पांच अलग-अलग राज्यों की पुलिस ने मिलकर एक बड़ा अभियान चलाया है, जिसके तहत कई आरोपियों पर शिकंजा कसा गया है।
कार्रवाई के अगले चरण में पुलिस ने इन भगोड़ों के घरों पर कानूनी इश्तेहार चस्पा करने शुरू कर दिए हैं। अब तक 23 से अधिक वारंटियों के घरों पर इस तरह के नोटिस चस्पा किए जा चुके हैं। इसके साथ ही, जिन आरोपियों को अदालतें पहले ही भगोड़ा घोषित कर चुकी हैं, उनकी संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी गई है। हाल ही में झारखंड और औरंगाबाद की पुलिस टीमों ने कटिहार पहुंचकर कई शातिरों के खिलाफ कुर्की-जब्ती की सख्त कार्रवाई को अमलीजामा पहनाया है।
"कोढ़ा गिरोह के सदस्यों के खिलाफ वारंट और कुर्की-जब्ती के आदेश मिलने पर आरोपियों के नाम और पते का सूक्ष्मता से सत्यापन किया जाता है। बाहरी राज्यों से आने वाली पुलिस टीमों को स्थानीय स्तर पर पूरी मदद मुहैया कराई जाती है, और हाल ही में झारखंड तथा औरंगाबाद के मामलों में कुर्की की कार्रवाई सफलतापूर्वक पूरी की गई है।" — परिचय कुमार, पुलिस अधीक्षक, कटिहार
अंतरराज्यीय समन्वय की कमी और भविष्य की चुनौतियां
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी बाधा अलग-अलग राज्यों के पुलिस विभागों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान में होने वाली देरी है। जब तक एक राज्य की पुलिस दूसरे राज्य के स्थानीय प्रशासन से संपर्क साधती है, तब तक अपराधी अपनी लोकेशन बदल चुके होते हैं। तकनीक और डिजिटल डेटाबेस के इस दौर में भी अपराधियों द्वारा फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल किया जाना पुलिस और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के अंतरराज्यीय गिरोहों पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए देश के सभी राज्यों की पुलिस को एक साझा और एकीकृत डिजिटल डेटाबेस तैयार करना होगा। जब तक अपराधियों की डिजिटल पहचान और बायोमेट्रिक डेटा हर राज्य के थाने में तुरंत उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक ऐसे शातिर कानून की पनाह से बचते रहेंगे। हालांकि, कटिहार पुलिस के वर्तमान तेवर और दूसरे राज्यों के साथ बढ़ते सहयोग को देखते हुए यह उम्मीद जरूर जगी है कि जल्द ही इन शातिरों का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाएगा।






