बदलती तस्वीर: चूल्हे-चौके से निकलकर आसमान छू रही हैं बेटियां
आज का दौर वह नहीं है जब बेटियों के दायरे को केवल घर की चारदीवारी और रसोई तक सीमित माना जाता था। समय तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव की बयार देश के छोटे-छोटे कस्बों से लेकर महानगरों तक साफ महसूस की जा रही है। राष्ट्रीय बेटी दिवस के खास मौके पर जब समाज में बेटियों के योगदान का लेखा-जोखा टटोला जाता है, तो कई ऐसी प्रेरणादायक कहानियां सामने आती हैं जो सीना गर्व से चौड़ा कर देती हैं। आज की तारीख में बेटियां हर उस मोर्चे पर आगे बढ़कर नेतृत्व कर रही हैं, जिसे कभी केवल पुरुषों का अधिकार क्षेत्र माना जाता था।
शिक्षा के क्षेत्र में बालिकाओं ने लंबी छलांग लगाई है। सरकारी विद्यालयों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक में छात्राओं की उपस्थिति और उनका प्रदर्शन लगातार बेहतर हो रहा है। हाल ही में आए परीक्षा परिणामों इस बात की गवाही देते हैं कि जिला स्तर की मेरिट सूचियों में बेटियों ने लड़कों को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष स्थानों पर कब्जा जमाया है। अभिभावक भी अब अपनी सोच में बदलाव ला रहे हैं और वे अपनी संतानों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव करने से परहेज कर रहे हैं। उनका एकमात्र सपना अपनी बेटियों को पढ़ा-लिखਾकर काबिल अफसर या डॉक्टर-इंजीनियर बनाना है।
सरकारी स्तर पर चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाएं जैसे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, कन्या सुमंगला योजना और सुकन्या समृद्धि योजना ने इन होनहार बालिकाओं के सपनों को पंख देने का काम किया है। इन योजनाओं के जरिए मिलने वाली आर्थिक मदद ने गरीब परिवारों के लिए अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने का रास्ता आसान कर दिया है। आज बेटियां इस बात को साबित कर रही हैं कि यदि उन्हें सही अवसर और माहौल मिले, तो वे किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रहेंगी।
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खेल के मैदान पर दम दिखातीं होनहार बेटियां
किताबों की दुनिया से बाहर निकलकर खेल के मैदानों पर भी बेटियों का दबदबा लगातार बढ़ रहा है। सामान्य सुविधाओं के अभाव के बावजूद स्थानीय खेल मैदानों पर पसीना बहाने वाली ये खिलाड़ी आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। फुटबॉल हो या कुश्ती या फिर कोई अन्य खेल अनुशासन, बेटियों ने अपनी मेहनत के दम पर बड़े-बड़े मुकाम हासिल किए हैं।
स्थानीय स्तर पर बिना किसी बड़े संसाधनों के तैयार होने वाली ये खिलाड़ी आज उत्तर प्रदेश और देश की विभिन्न टीमों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। कई युवा खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में कप्तानी संभाल चुकी हैं या फिर अपनी टीमों के लिए रीढ़ की हड्डी साबित हो रही हैं। कोचों और खेल प्रेमियों का मानना है कि यदि इन्हें थोड़ा और बेहतर बुनियादी ढांचा मिल जाए, तो ये बेटियां ओलंपिक और विश्व स्तर पर देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर ला सकती हैं।
कुश्ती जैसे पारंपरिक रूप से पुरुष प्रधान माने जाने वाले अखाड़े में भी अब बेटियों ने अपने दांव-पेच से अच्छे-अच्छों को हैरान कर दिया है। प्रदेशीय प्रतियोगिताओं में मैट और मिट्टी के अखाड़े में उतरकर जब ये बेटियां अपने प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ती हैं, तो यह नजारा देखने लायक होता है। समाज की दस्यु मान्यताओं को दरकिनार करते हुए इन्होंने यह साबित कर दिया है कि शारीरिक और मानसिक दृढ़ता के मामले में वे किसी से कमतर नहीं हैं।
अनोखा समाज: जहां लिंगानुपात में बेटों से आगे हैं बेटियां
आमतौर पर देश के कई हिस्सों में लिंगानुपात को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आते हैं, जहां बेटियों की संख्या लड़कों के मुकाबले कम दर्ज की जाती है। लेकिन इसके विपरीत कुछ इलाके ऐसे भी हैं जो इस मामले में पूरे समाज के लिए एक सकारात्मक उदाहरण पेश करते हैं। यहां प्रति पुरुष पर बेटियों की संख्या अधिक है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि समाज में अब कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ जागरूकता बढ़ी है और लोगों की मानसिकता में सकारात्मक परिवर्तन आया है।
यह बदलाव रातोंरात नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे दशकों की सामाजिक जागरूकता, शिक्षा का प्रसार और महिलाओं के अधिकारों के प्रति बढ़ती चेतना का बड़ा हाथ है। जब माता-पिता को यह अहसास होने लगता है कि बेटी बोझ नहीं बल्कि पूरे परिवार की शान है, तब समाज की बुनियाद मजबूत होती है। आज इस जिले की कई बेटियां आईएएस, आईपीएस, आईएफएस और अन्य प्रतिष्ठित केंद्रीय व प्रांतीय सेवाओं में उच्च पदों पर आसीन होकर देश की बागडोर संभाल रही हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय तक में अहम जिम्मेदारियां निभाती इन बेटियों ने पूरे क्षेत्र का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया है।
बुढ़ापे की लाठी बनीं बेटियां: जब अपनों ने ठुकराया तो मसीहा बनीं संतानें
समाज का एक दूसरा कड़वा सच यह भी है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर कई बार बुजुर्ग माता-पिता को अपनों की ही बेरुखी का सामना करना पड़ता है। संपत्ति और लालच के चक्कर में सगे बेटे अक्सर अपने बूढ़े मां-बाप को बेसहारा छोड़ने से भी गुरेज नहीं करते। ऐसा ही एक मार्मिक मामला हाल ही में सामने आया, जहां नब्बे साल पार कर चुके एक बुजुर्ग दंपती को उनके बेटों ने केवल इसलिए घर से बाहर निकाल दिया क्योंकि वे अपनी संपत्ति उनके नाम नहीं कर रहे थे।
ऐसे अत्यंत कठिन और निराशाजनक समय में जब दुनिया पर से भरोसा उठने लगता है, तब पीड़ित बुजुर्ग माता-पिता के लिए उनकी बेटियां मसीहा बनकर सामने आईं। दशकों से अपने ससुराल में रह रही बड़ी बेटी और मुंबई में रहने वाली छोटी बेटी ने बिना एक पल गंवाए अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल का पूरा जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया। बेटियों की इस निष्पक्ष सेवा और समर्पण से अभिभूत होकर पिता ने अपनी स्वेच्छा से अपनी संपत्ति अपनी बेटियों के नाम कर दी।
"समाज चाहे जितनी भी बातें करे, लेकिन मुश्किल वक्त में असली सहारा वही बनता है जो खून के रिश्तों की असल कीमत समझता है। हमारी बेटियों ने यह साबित कर दिया कि वे बेटों से बढ़कर हैं।" — सूरज सिंह, पीड़ित बुजुर्ग पिता
निष्कर्ष: हर दिन हो राष्ट्रीय बेटी दिवस का अहसास
वर्ष में एक दिन बेटी दिवस मनाना केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह समाज के हर नागरिक के लिए आत्मविश्लेषण का अवसर होना चाहिए। जब तक समाज में हर बेटी को सुरक्षित माहौल, समान अवसर और पूरा मान-सम्मान नहीं मिलता, तब तक किसी भी विकास का दावा अधूरा है। आज जरूरत इस बात की है कि हम अपनी सोच को और अधिक प्रगतिशील बनाएं और हर घर में बेटियों को उनके सपनों की उड़ान भरने के लिए प्रोत्साहित करें। देवरिया की इन बेटियों और उनके संघर्षों की दास्तान यह चीख-चीख कर कहती है कि मौका मिलने पर बेटियां इतिहास रच सकती हैं।







