होम/देश/उमर अब्दुल्ला बोले- राज्य का दर्जा मांगना हमारा मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 370 पर सियासी घमासान तेज
देशपढ़ने में समय: 4 मिनट

उमर अब्दुल्ला बोले- राज्य का दर्जा मांगना हमारा मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 370 पर सियासी घमासान तेज

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रस्ताव को लेकर सियासत गरमा गई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विपक्ष को खुली चुनौती देते हुए कहा है कि इस प्रस्ताव में कुछ भी देश-विरोधी नहीं है, जबकि बीजेपी ने इसे लेकर तीखा विरोध जताया है।
The Freelance ब्यूरो
TheFreelance ब्यूरो
25 सितंबर 2026 • अपडेटेड
🌐Read in English →
शेयर करें:
उमर अब्दुल्ला बोले- राज्य का दर्जा मांगना हमारा मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 370 पर सियासी घमासान तेज
📷 उमर अब्दुल्ला बोले- राज्य का दर्जा मांगना हमारा मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 370 पर सियासी घमासान तेज — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि राज्य का दर्जा मांगना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
  • विधानसभा में नए प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्षी बीजेपी के बीच तीखी नोकझोंक हुई।
  • बीजेपी ने पुराने स्वायत्तता प्रस्ताव और अनुच्छेद 370 को दोबारा लाने पर कड़ा ऐترض जताया है।
प्रायोजित • SPONSOREDVoterAction Campaign Suite
VoterAction - कागज़ पर नहीं, ऐप पर लड़े जाते हैं चुनाव | अभियान की पूरी कमान

विधानसभा में उठा राज्य के दर्जे का मुद्दा

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर से अनुच्छेद 370 और राज्य के दर्जे की बहाली को लेकर घमासान छिड़ गया है। हाल ही में विधानसभा के भीतर पेश किए गए एक नए प्रस्ताव ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपनी सरकार के इस कदम का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा है कि इस प्रस्ताव में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे असंवैधानिक या राष्ट्रविरोधी करार दिया जा सके।

सत्र के दौरान जब इस प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत हुई, तो सदन का माहौल पूरी तरह गरमा गया। विपक्षी दलों, खासकर भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों ने इसका कड़ा विरोध किया। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि सदन की कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा। इसके बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए मुख्यमंत्री ने अपनी बात को बेहद दो टूक अंदाज में रखा।

उनका साफ कहना था कि केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय की ओर से जनता को यह आश्वासन दिया गया था कि उचित समय पर राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा। ऐसे में इस वादे की याद दिलाना और इसे मांगना किसी भी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता है।

विज्ञापन • ADVERTISEMENT

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की विपक्ष को दो टूक चुनौती

मीडिया के सामने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री ने विपक्षी खेमे को सीधे तौर पर चुनौती दी। उन्होंने कहा कि यदि किसी के पास इस बात का सुबूत है कि उनके द्वारा पेश किए गए दस्तावेज में कोई भी शब्द देश के खिलाफ है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

"मुझे प्रस्ताव में इस्तेमाल किया गया एक भी देश-विरोधी शब्द दिखाएं। राज्य का दर्जा मांगना एक मौलिक अधिकार है, जिसका वादा देश की सर्वोच्च अदालत और केंद्र सरकार ने यहां के अवाम से किया है।" — उमर अब्दुल्ला, मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जो दल चुनाव के दौरान राज्य के दर्जे को वापस दिलाने के नाम पर वोट मांग रहे थे, आज वही दल इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा करने या सदन में मतदान करने से बच रहे हैं। उनके अनुसार, यह रवैया राजनीतिक दोहरेपन को साफ तौर पर उजागर करता है।

बीजेपी का कड़ा विरोध और पुराने प्रस्तावों पर सवाल

दूसरी ओर, विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने सरकार के इस कदम को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि सरकार असल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के विवादित विषयों को हवा दे रही है।

विपक्ष का मुख्य ऐतराज इस बात पर है कि नए प्रस्ताव में साल 2000 के पुराने स्वायत्तता प्रस्ताव और अनुच्छेद 370 से जुड़े बिंदुओं को क्यों शामिल किया गया है। सुनील शर्मा का तर्क है कि जब देश और संसद पहले ही उन प्रस्तावों को नामंजूर कर चुकी है, तो उन्हें बार-बार सदन के पटल पर लाना अनुचित है।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब अतीत में तत्कालीन एनडीए सरकार के दौरान स्वायत्तता प्रस्ताव को खारिज किया गया था, तब उमर खुद उस सरकार का हिस्सा थे। ऐसे में इस पुराने एजेंडे को दोबारा जिंदा करने का क्या औचित्य है?

कांग्रेस पार्टी की भूमिका पर उठते सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस पार्टी की चुप्पी और उसका स्टैंड भी बहस के केंद्र में आ गया है। विपक्षी नेताओं ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि क्या वे सरकार के इस नए प्रस्ताव के साथ खड़े हैं या फिर वे पुराने प्रावधानों के पक्ष में हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा जम्मू-कश्मीर की राजनीति की दिशा तय करेगा। एक तरफ जहां क्षेत्रीय दल जनता की भावनाओं को भुनाने में जुटे हैं, वहीं राष्ट्रीय दल इस बात पर अड़े हैं कि संविधान सम्मत दायरे से बाहर जाकर किसी भी विषय पर बहस की अनुमति नहीं दी जाएगी।

निष्कर्ष और आगे की राजनीतिक दिशा

फिलहाल यह साफ है कि जम्मू-कश्मीर में विकास और प्रशासनिक कामकाज के साथ-साथ संवैधानिक दर्जे की लड़ाई एक बार फिर मुख्यधारा की राजनीति में लौट आई है। आम जनता इस उठापटक के बीच यह उम्मीद कर रही है कि उनके बुनियादी मुद्दों को दरकिनार किए बिना इस गतिरोध का कोई स्थायी समाधान निकाला जाएगा।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
विज्ञापन एवं अनुशंसित सामग्री • RECOMMENDED