आज़मगढ़ में पसमांदा अधिकारों की नई गूंज
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक पटल पर इन दिनों पसमांदा मुसलमानों के अधिकारों और उनकी हिस्सेदारी को लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। इसी कड़ी में आज़मगढ़ जनपद में एक विशेष पसमांदा अधिकार सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े पसमांदा वर्ग के लोगों को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाना और उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना था।
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आजादी के इतने दशकों बाद भी समाज का एक बड़ा वर्ग हाशिए पर जीवन जीने को मजबूर है। शिक्षा और आर्थिक तंगी के कारण इस तबके की आवाज अक्सर दबा दी जाती है। सम्मेलन में मौजूद विचारकों ने दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक समाज के हर वर्ग को बराबरी के अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक सच्चे अर्थों में समावेशी विकास की कल्पना करना बेमानी है।
स्थानीय स्तर पर आयोजित इस सम्मेलन ने न सिर्फ पसमांदा समाज की बुनियादी समस्याओं को उजागर किया, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए भी एक स्पष्ट संदेश दिया कि अब यह वर्ग अपने हक और हुकूक के प्रति पूरी तरह से जागरूक हो चुका है। सभा में आए प्रतिनिधियों ने अपनी बात बेबाकी से रखते हुए कहा कि विकास योजनाओं का लाभ धरातल पर पहुंचना चाहिए ताकि हर घर तक रोशनी पहुंच सके।
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शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर पिछड़ रहा समाज
सम्मेलन में मुख्य रूप से शिक्षा और रोजगार की बदहाल स्थिति पर गंभीर चिंता जताई गई। वक्ताओं का कहना था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में पसमांदा समाज की युवा पीढ़ी आधुनिक युग की प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट रही है। महंगे होते जा रहे शिक्षण संस्थान और तकनीकी शिक्षा तक पहुंच न होने के कारण युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तलाशना बेहद कठिन हो गया है।
इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए शिक्षाविदों ने सुझाव दिया कि सरकार और समाज दोनों को मिलकर विशेष शैक्षिक अभियान चलाने की आवश्यकता है। पिछड़े इलाकों में आवासीय विद्यालय खोले जाने चाहिए ताकि गरीब परिवारों के बच्चे भी बिना किसी आर्थिक बाधा के उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसके अलावा कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से पारंपरिक कामगारों को आधुनिक तकनीकों से प्रशिक्षित करने की जरूरत पर भी बल दिया गया।
रोजगार के अवसरों की बात करें तो असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले पसमांदा कारीगरों और श्रमिकों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। उन्हें न तो न्यूनतम मजदूरी की सुरक्षा मिलती है और न ही सामाजिक सुरक्षा योजनाएं उन तक आसानी से पहुंच पाती हैं। सम्मेलन में मांग की गई कि इन तमाम विसंगतियों को दूर करने के लिए ठोस प्रशासनिक नीतियां बनाई जानी चाहिए।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी का सवाल
राजनीतिक गलियारों में अपनी बात मजबूती से रखने का मुद्दा भी इस सम्मेलन के केंद्र में रहा। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के समय लुभावने वादे तो किए जाते हैं, लेकिन जब सत्ता में हिस्सेदारी की बात आती है तो पसमांदा समाज को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उन्होंने मांग की कि राजनीतिक दलों को अपनी टिकट वितरण नीति में बदलाव करना चाहिए और आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
लोकतांत्रिक प्रणाली में भागीदारी के बिना किसी भी समुदाय का उत्थान संभव नहीं है। जब तक नीति निर्धारण करने वाले मंचों पर इस वर्ग के लोग सीधे तौर पर शामिल नहीं होंगे, तब तक उनकी वास्तविक समस्याएं शासन के उच्च स्तर तक नहीं पहुंच पाएंगी। सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने एक स्वर में कहा कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर पसमांदा समाज के नेतृत्व को स्वीकार करें।
"पसमांदा समाज के बिना किसी भी प्रगतिशील समाज की कल्पना अधूरी है। जब तक हमारे युवाओं को शिक्षा और रोजगार में बराबरी का हक नहीं मिलेगा, तब तक सामाजिक न्याय की लड़ाई अधूरी रहेगी। हमें अपनी ताकत पहचान कर एकजुट होना होगा।" — प्रमुख सामाजिक वक्ता, आज़मगढ़ सम्मेलन
आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक सुधार की दिशा में कदम
केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे रहने के बजाय खुद के पैरों पर खड़े होने की प्रेरणा भी इस सम्मेलन के मंच से दी गई। वक्ताओं ने कहा कि समाज के भीतर फैली कुरीतियों और आंतरिक कमजोरियों को दूर करने के लिए खुद पहल करनी होगी। महिला सशक्तिकरण पर विशेष ध्यान देते हुए कहा गया कि जब तक महिलाओं को शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वावलंबी नहीं बनाया जाएगा, तब तक समाज का संपूर्ण विकास संभव नहीं है।
छोट-छोटे उद्योगों, कुटीर उद्योगों और पारंपरिक कलाओं को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता और आसान ऋण उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई गई। कई वक्ताओं ने स्थानीय स्तर पर सहकारिता समितियों के गठन पर जोर दिया ताकि बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो सके और मेहनतकश लोगों को उनकी मेहनत का पूरा फल मिल सके।
निष्कर्ष और आगे की राह
आज़मगढ़ में हुआ यह पसमांदा अधिकार सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि देश का वंचित तबका अब अपने अधिकारों के प्रति सजग हो रहा है। सम्मेलन के अंत में एक साझा घोषणा पत्र तैयार करने की बात कही गई, जिसे संबंधित प्रशासनिक और राजनीतिक अधिकारियों को सौंपा जाएगा ताकि उठाए गए मुद्दों पर व्यावहारिक कार्रवाई हो सके। यह आयोजन आने वाले समय में सामाजिक न्याय के आंदोलन को एक नई दिशा देने का काम करेगा, ऐसी उम्मीद आयोजकों और उपस्थित लोगों द्वारा जताई गई है।








