ऑनलाइन गेमिंग के जाल में फंसाकर रची गई 102 करोड़ की साजिश
देशभर में साइबर ठगी के नए-नए तरीके सामने आ रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से जो मामला सामने आया है, उसने सुरक्षा एजेंसियों और बैंकिंग सिस्टम दोनों को हैरान कर दिया है। ऑनलाइन गेमिंग के नाम पर 102.54 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि की राष्ट्रीय स्तर पर ठगी का खुलासा हुआ है। इस शातिर गिरोह ने बेहद चालाकी से आम और गरीब लोगों को अपना मोहरा बनाया और करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे कर दिए। पुलिस की शुरुआती जांच में पता चला है कि इस खेल का दायरा सिर्फ एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार देश के दर्जनों राज्यों से जुड़े हुए थे।
साइबर अपराधियों ने बहुत ही सुनियोजित तरीके से इस पूरे खेल को अंजाम दिया। गिरोह के सरगना ने देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठे लोगों को अपना शिकार बनाया और उन्हें ऑनलाइन गेमिंग में भारी मुनाफे का लालच दिया। जब पीड़ित लोग इनके झांसे में आ गए, तो उनकी गाढ़ी कमाई को हड़पने के लिए फर्जी बैंक खातों का इस्तेमाल किया गया। इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब एक स्थानीय युवक ने हिम्मत दिखाते हुए पुलिस में मामले की शिकायत दर्ज कराई और साइबर पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायतें पहुंचनी शुरू हुईं।
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गरीबों को लालच देकर खुलवाए गए बैंक खाते और म्यूल अकाउंट्स
साइबर ठगों ने अपनी पहचान छिपाने और अवैध रकम को ठिकाने लगाने के लिए बेहद शातिर तरीका अपनाया। आरोपियों ने कस्बा जहानाबाद और आसपास के इलाकों के गरीब और सीधे-साधे लोगों को निशाना बनाया। उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने या फिर महीने में 10 हजार रुपये का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाए गए। इन खातों के एटीएम कार्ड, चेकबुक, पासबुक, पैन कार्ड और सिम कार्ड ठगों ने अपने कब्जे में ले लिए थे। इन खातों को बैंकिंग की भाषा में 'म्यूल अकाउंट्स' कहा जाता है, जिनका इस्तेमाल अवैध रकम को ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है।
पुलिस जांच में यह बात खुलकर सामने आई कि इन खातों में देश के अलग-अलग राज्यों जैसे गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, चेन्नई, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश और बिहार के लोगों से ठगी गई रकम पहुंच रही थी। आरोपियों ने सगे भाइयों मोबिन और मोहसिन के जरिए इन खातों का जाल बिछाया था। दानिश अंसारी नामक एक युवक के शिकायत करने और उसके खाते में साइबर अपराध से जुड़े मामलों का होल्ड लगने के बाद इस पूरे रैकेट की परतें एक-एक करके खुलने लगीं।
नाई और किराना दुकानदार के खातों में आए करोड़ों रुपये
इस साइबर ठगी के खुलासे का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिन लोगों के खातों में करोड़ों रुपये का ट्रांजैक्शन हुआ, वे बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। पुलिस की जांच में पता चला कि एक नाई (बार्बर) और एक किराना दुकान चलाने वाले व्यक्ति के नाम पर खोले गए करंट अकाउंट में भारी-भरकम रकम आई। अकेले हारून नाम के व्यक्ति के बैंक खाते पर नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल पर 85 शिकायतें दर्ज थीं, और उसके खाते में 42.54 करोड़ रुपये आए थे। इसी तरह राहुल के बैंक खातों में 34 शिकायतों के जरिए 28 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ।
मोहसिन के खाते में 15 शिकायतों के आधार पर 32 करोड़ रुपये आए, जबकि अन्य आरोपियों के खातों में भी लगातार लाखों और करोड़ों रुपये ट्रांसफर होते रहे। हैरान करने वाली बात यह है कि बैंक ऑफ बड़ौदा की टनकपुर रोड शाखा और डांग शाखा में खोले गए इन करंट अकाउंट्स में जब करोड़ों रुपये का टर्नओवर हो रहा था, तब बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों ने इसकी कोई सुध नहीं ली। नियमों के मुताबिक इतने बड़े ट्रांजैक्शन पर तुरंत 'सॉरी' या संदिग्ध गतिविधियों का अलर्ट मिलना चाहिए था, लेकिन बैंक की ओर से कोई सतर्कता नहीं बरती गई।
दिल्ली और बरेली को बनाया गया था ठगी का मुख्य अड्डा
पूरे नेटवर्क का संचालन करने वाले सरगनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचने के लिए उत्तर प्रदेश के बरेली और देश की राजधानी दिल्ली को अपना मुख्य हब बना रखा था। मुख्य आरोपी विशाल मौर्य ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस राष्ट्रीय स्तर के फ्रॉड का ताना-बाना बुना था। आरोपी दिल्ली और बरेली से बैठकर ही देश के विभिन्न राज्यों में चल रहे इस फर्जीवाड़े को कंट्रोल कर रहा था। पुलिस और साइबर सेल की टीमें अब विशाल मौर्य और उसके अन्य फरार साथियों को दबोचने के लिए लगातार दबिश दे रही हैं।
"इस मामले में शुरुआती जांच बेहद चौकाने वाली रही है। यह राष्ट्रीय स्तर का साइबर फ्रॉड है, जिसमें कई राज्यों के लोग ठगी का शिकार हुए हैं। मुख्य सरगना की तलाश में दबिश दी जा रही है और यह भी खंगाला जा रहा है कि इस फर्जीवाड़े में बैंक स्तर पर किन लोगों की मिलीभगत रही है या किनकी लापरवाही के कारण यह खेल चलता रहा।" — सुकीर्ति माधव, पुलिस अधीक्षक, पीलीभीत
बैंक अधिकारियों की भूमिका और आगे की कानूनी कार्रवाई
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर बैंकिंग सेक्टर की कार्यप्रणाली और केवाईसी (Know Your Customer) के नियमों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या बैंक अधिकारियों ने बिना किसी वैध व्यवसायिक पृष्ठभूमि की जांच के साधारण लोगों के नाम पर करंट अकाउंट खोल दिए? क्या बैंक ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि एक नाई या छोटे दुकानदार की दुकान पर ऐसा कौन सा कारोबार चल रहा है, जिससे उसके खाते में अचानक 42 करोड़ रुपये आ रहे हैं? पुलिस अब इस एंगल से भी गहराई से जांच कर रही है कि क्या बैंक के भीतर का कोई कर्मचारी या अधिकारी इस गिरोह के संपर्क में था और उसने इन्हें फायदा पहुंचाया था।
फिलहाल पुलिस ने आरोपियों के पास से 8 फर्जी आधार कार्ड, 10 एटीएम कार्ड, कई बैंकों की चेकबुक और पासबुक बरामद की हैं। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मुख्य सरगना के पकड़े जाने के बाद इस ठगी के आंकड़े और भी ज्यादा बढ़ सकते हैं। साथ ही, जिन खातों को फ्रीज किया गया है, उनमें बची हुई रकम को सुरक्षित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। आम जनता के लिए यह घटना एक बड़ा सबक है कि वे कभी भी लालच में आकर अपने बैंक खाते या दस्तावेज किसी अन्य व्यक्ति को इस्तेमाल करने के लिए न दें, अन्यथा वे खुद बहुत बड़ी कानूनी मुसीबत में फंस सकते हैं।






