ओटीटी प्लेटफॉर्म पर छाई 'पूजा मेरी जान': क्या है इस थ्रिलर ड्रामा की कहानी
आज के दौर में जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर थ्रिलर और सोशल ड्रामा फिल्मों की भरमार है, तब ZEE5 पर रिलीज हुई मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की फिल्म 'पूजा मेरी जान' एक बेहद जरूरी और संवेदनशील विषय को लेकर सामने आई है। यह फिल्म महज मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की उस सड़ियल और मर्दवादी सोच को आईना दिखाती है, जो आज भी महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनकी 'ना' को स्वीकार करने से इनकार करती है। फिल्म का निर्देशन और इसकी मूल परिकल्पना काफी मजबूत है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर क्यों किसी के प्यार को ठुकराना किसी लड़की के लिए जी का जंजाल बन जाता है।
कहानी की शुरुआत थिएटर के मंच से होती है जहां मुख्य किरदार अपनी कला में डूबे नजर आते हैं। पूजा, जिसे पर्दे पर मृणाल ठाकुर ने निभाया है, एक ऐसी आधुनिक और आत्मनिर्भर लड़की है जो अपने जीवन के फैसले खुद लेना अच्छी तरह जानती है। दूसरी तरफ अनिकेत है जो नाटक में उसके साथ काम कर रहा है। बिना किसी पूर्व पृष्ठभूमि या गहरे परिचय के, अनिकेत मंच पर सबके सामने पूजा को प्रपोज कर देता है। यह प्रस्ताव इतना अचानक और असहज होता है कि पूजा को गुस्सा आ जाता है। वह न सिर्फ उस प्रस्ताव को ठुकरा देती है, बल्कि फूलों का गुलदस्ता फेंककर और अंगूठी वापस करके वहां से चली जाती है।
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जब एक इनकार बन जाता है जिंदगी का सबसे बड़ा अभिशाप
यहाँ से कहानी एक खतरनाक और अप्रत्याशित मोड़ लेती है। अनिकेत कोई साधारण आशिक नहीं बल्कि एक ऐसा जुनूनी शख्स है जिसे अपने अहंकार पर लगी चोट बर्दाश्त नहीं होती। उसे पूजा का 'ना' किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। इस रिजेक्शन को पचा न पाने की स्थिति में वह एक खौफनाक कदम उठाता है और अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है। यहीं से शुरू होता है असली मानसिक प्रताड़ना और कानूनी पचड़ों का दौर। जिस लड़की ने न तो कभी कोई झूठा वादा किया था और न ही उस शख्स की मौत के लिए किसी भी तरह जिम्मेदार थी, उसे ही आत्महत्या के लिए उकसाने के गंभीर जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाता है।
फिल्म का यह हिस्सा हमारे समाज के दोहरे चरित्र को बहुत बारीकी से उजागर करता है। एक तरफ जहां पुरुषवादी मानसिकता यह मानकर चलती है कि महिला का हर 'ना' असल में 'हाँ' का इशारा है, वहीं दूसरी तरफ जब कोई महिला खुलकर अपनी बात रखती है, तो सिस्टम और समाज मिलकर उसे ही कसूरवार ठहराने में जुट जाते हैं। फिल्म पूछती है कि क्या किसी के एकतरफा प्रेम को स्वीकार न करना कोई अपराध है? क्या किसी की सनक की सजा किसी बेकसूर लड़की को मिलनी चाहिए?
अदालती कशमकश और हुमा कुरैशी-मृणाल ठाकुर का अभिनय
फिल्म का दूसरा अहम हिस्सा कोर्टरूम ड्रामा और कानूनी लड़ाई के इर्द-गिर्द घूमता है। हुमा कुरैशी और विजय राज जैसे दिग्गज कलाकारों की मौजूदगी इस अदालती लड़ाई में वजन पैदा करती है। हालांकि विभिन्न मीडिया समीक्षाओं और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं के अनुसार, पटकथा या स्क्रीनप्ले के स्तर पर कुछ कमियां जरूर खटकती हैं। कोर्टरूम की बहस और कानूनी प्रक्रिया को जिस कटर और पैने अंदाज में दिखाया जाना चाहिए था, वह कई मौकों पर काफी सामान्य और धीमा प्रतीत होता है। थ्रिलर शैली की फिल्म होने के बावजूद कई जगहों पर वो अपेक्षित सस्पेंस और रोमांच गायब नजर आता है जो दर्शक उम्मीद करते हैं।
इसके बावजूद, कलाकारों की अभिनय क्षमता ने फिल्म को डूबने से बचा लिया है। मृणाल ठाकुर ने पूजा के किरदार में जिस लाचारी, गुस्से और आत्मसम्मान को पर्दे पर उतारा है, वह तारीफ के काबिल है। हुमा कुरैशी भी अपनी मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस से कहानी को एक नया आयाम देती हैं। विक्रम सिंह चौहान ने भी जुनूनी आशिक के रूप में अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। कलाकारों की यह सिंसियर एक्टिंग ही है जो स्क्रीनप्ले की कई कमजोरियों को ढक लेती है और दर्शकों को अंत तक जोड़े रखती है।
संगीत और बैकग्राउंड स्कोर जो माहौल को बनाते हैं जीवंत
किसी भी भावनात्मक और थ्रिलर फिल्म की सफलता में उसके संगीत की बहुत बड़ी भूमिका होती है। 'पूजा मेरी जान' के मामले में इसका बैकग्राउंड स्कोर और मेलोडियस गाने फिल्म के मूड को बहुत अच्छी तरह सपोर्ट करते हैं। जब कहानी कोर्ट के चक्करों और मानसिक तनाव के बीच उलझती है, तो बैकग्राउंड म्यूजिक तनाव के स्तर को बढ़ाने का काम करता है। गाने अनावश्यक नहीं लगते बल्कि वे किरदारों की आंतरिक मनोदशा और दर्द को पर्दे पर बयां करने का सशक्त माध्यम बनते हैं। फिल्म खत्म होने के बाद भी इसका संगीत और उसके बोल दर्शकों के दिलों-दिमाग में एक गहरी छाप छोड़ जाते हैं।
"सिनेमा का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज की कुंठाओं और दोहरी सोच पर चोट करना भी होना चाहिए। 'पूजा मेरी जान' जैसी फिल्में इसी दिशा में एक जरूरी और साहसिक कदम हैं जो लोगों को सोचने पर मजबूर करती हैं कि सहमति का असली मतलब क्या है।" — मीडिया विश्लेषक
कमजोर स्क्रीनप्ले के बावजूद क्यों देखनी चाहिए यह फिल्म
अगर समग्रता से आंकलन किया जाए तो यह फिल्म अपने मकसद में काफी हद तक कामयाब रहती है भले ही इसके निर्देशन या पटकथा में कुछ खामियां रह गई हों। यह फिल्म हर उस शख्स को देखनी चाहिए जो आज भी जेंडर इक्वालिटी और महिलाओं की पर्सनल बाउंड्रीज को हल्के में लेता है। फिल्म यह संदेश साफ तौर पर देती है कि प्यार जबरदस्ती या जिद का नाम नहीं है, बल्कि यह आपसी सम्मान और सहमति पर आधारित होना चाहिए। वीकेंड पर अगर आप कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जो आपको सिर्फ समय काटने के बजाय सोचने पर मजबूर करे, तो ZEE5 पर मौजूद यह फिल्म आपके लिए एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।







