दिल्ली की राजनीति में बड़ा उलटफेर, प्रियंका कक्कड़ ने छोड़ी आम आदमी पार्टी
भारतीय राजनीतिक गलियारों में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब टेलीविजन डिबेट्स में आम आदमी पार्टी का पक्ष पूरी आक्रामकता और बेबाकी से रखने वाला एक प्रमुख चेहरा अचानक पार्टी से अलग हो गया। राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभाल रही प्रियंका कक्कड़ ने शनिवार को कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली। इस घटनाक्रम को अरविंद केजरीवाल की पार्टी के लिए राष्ट्रीय राजधानी में एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि प्रियंका लंबे समय से पार्टी संगठन की रीढ़ और मीडिया का प्रमुख चेहरा रही थीं।
दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र यादव, वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला और पवन खेड़ा की मौजूदगी में प्रियंका ने कांग्रेस का हाथ थामा। उनके साथ कुछ अन्य चेहरों ने भी कांग्रेस का दामन थामा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के इस माहौल में एक तेज-तर्रार वक्ता और टीवी पैनलिस्ट का पाला बदलना पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह और असंतोष को उजागर करता है।
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'बंगला और गाड़ी नहीं लेंगे' वाले वादे पर उठाए गंभीर सवाल
पार्टी छोड़ने के पीछे की वजहों का खुलासा करते हुए प्रियंका कक्कड़ ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने आम आदमी पार्टी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा कि जब यह राजनीतिक दल वजूद में आया था, तब जनता से साफ तौर पर वादा किया गया था कि न तो बड़े बंगले लिए जाएंगे और न ही महंगी गाड़ियां इस्तेमाल की जाएंगी। लेकिन समय के साथ इस पूरी संस्कृति में बदलाव आ गया और निजी यात्राओं के लिए हेलीकॉप्टर व चार्टर्ड उड़ानों का दौर शुरू हो गया।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिन चीजों का कोई तार्किक बचाव नहीं किया जा सकता, वह उनका समर्थन करने में असमर्थ थीं। प्रियंका के मुताबिक, उन्होंने एक लक्ष्मण रेखा खींच ली थी क्योंकि पार्टी उन आदर्शों से भटकती हुई नजर आई जिनके बूते आम लोगों ने इस राजनीतिक विकल्प पर भरोसा जताया था।
"मैंने आम आदमी पार्टी छोड़ी क्योंकि बात हो रही थी कि बंगला और गाड़ी नहीं लेंगे, पर फिर प्राइवेट यात्रा के लिए चॉपर का इस्तेमाल होने लगा और मैं इसका बचाव नहीं कर सकती थी। आज संगठन में उन लोगों को बड़े पद दिए जा रहे हैं जिन्होंने जमीनी स्तर पर कोई काम नहीं किया है।" — प्रियंका कक्कड़, कांग्रेस नेत्री
योग्य लोगों की अनदेखी और बाहरी प्रभारियों पर तीखा हमला
पार्टी की आंतरिक कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाते हुए प्रियंका ने कहा कि एक वक्त था जब आम आदमी पार्टी ने देश के सबसे काबिल, प्रबुद्ध और समझदार लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया था। लेकिन मौजूदा समय में उन मेधावी लोगों को पार्टी अपने साथ बनाए रखने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है। उनकी जगह ऐसे नए लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है जिन्होंने कभी बूथ स्तर तक पर पसीना नहीं बहाया है।
उन्होंने विशेष रूप से पंजाब और राजस्थान का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि दूसरे राज्यों से बिना जमीनी अनुभव वाले लोगों को लाकर महत्वपूर्ण और वरिष्ठ पद सौंपे जा रहे हैं, साथ ही उन्हें आलीशान बंगले और गाड़ियां भी मुहैया कराई जा रही हैं। उनके अनुसार, इस तरह की व्यवस्था का सार्वजनिक मंचों पर बचाव करना उनके पेशेवर और व्यक्तिगत उसूलों के खिलाफ था।
राहुल गांधी की कार्यशैली और संघर्ष की जमकर की तारीफ
कांग्रेस पार्टी का दामन थामने के बाद प्रियंका कक्कड़ ने राहुल गांधी के नेतृत्व में गहरी आस्था व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज के दौर में अगर भारतीय राजनीति में कोई नेता पूरी तरह से विश्वसनीय और अडिग नजर आता है, तो वह राहुल गांधी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल को नीचा दिखाने और उनकी छवि धूमिल करने के लिए तमाम मशीनरी का इस्तेमाल किया गया, लेकिन इसके बावजूद वे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
प्रियंका ने राहुल गांधी द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों का समर्थन करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा जनता के बीच सच्चाई रखने का काम किया है और कैमरे के सामने झूठे आंसू बहाने के बजाय जमीनी हक की लड़ाई लड़ी है।
एक दशक से अधिक लंबा सफर और राजनीतिक भविष्य
वर्ष 2013 में आम आदमी पार्टी के गठन के शुरुआती दौर से ही जुड़ी रहीं प्रियंका पेशे से एक वकील भी हैं। साल 2023 में उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता नियुक्त किया गया था। टीवी डिबेट्स में विपक्ष के तीखे सवालों का तार्किक और आक्रामक तरीके से जवाब देने के कारण उनकी एक अलग पहचान बन चुकी थी। उनका यह अचानक इस्तीफा और कांग्रेस में शामिल होना दिल्ली की सियासत में नए समीकरण पैदा कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह बदलाव चुनावी मैदान में बड़ा असर डाल सकता है, क्योंकि प्रियंका न केवल एक मुखर वक्ता हैं बल्कि पार्टी के अंदरूनी कामकाज और नीतियों की गहरी समझ भी रखती हैं। अब देखना यह होगा कि आम आदमी पार्टी इस झटके से उबरने के लिए क्या रणनीति अपनाती है और कांग्रेस पार्टी उनके अनुभव का किस तरह से इस्तेमाल करती है।







