नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों से जुड़े मुद्दों पर इस समय देश भर में हलचल तेज हो गई है। एक तरफ जहां पंजाब और हरियाणा के बीच स्थित शंभू बॉर्डर और अन्य सीमाओं पर किसान एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर मुखर हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गांवों में खेती की लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के लिए जमीनी प्रयास भी शुरू हो चुके हैं। हाल ही में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, पंजाब-हरियाणा बॉर्डर पर किसानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और प्रदर्शन तेज कर दिए हैं। युवा किसानों के बाद अब वरिष्ठ किसान नेताओं ने भी हुंकार भरी है और साफ कह दिया है कि उनका यह विरोध प्रदर्शन अभी सिर्फ शुरुआत है।
स्थानीय स्तर पर मिल रही खबरों के मुताबिक, किसान संगठनों के नेताओं ने मंच से सरकार को खुली चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें जल्द नहीं मानी गईं तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन ने भी बॉर्डर इलाकों में अपनी चौकसी बढ़ा दी है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। पिछले कुछ महीनों से ठंडे बस्ते में पड़े किसान आंदोलन के इस नए दौर ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों और प्रशासनिक हलकों में सरगर्मी बढ़ा दी है। किसान नेताओं का कहना है कि उनकी मुख्य मांगें अब भी पूरी नहीं हुई हैं और वे अपने अधिकारों के लिए पीछे हटने वाले नहीं हैं।
खेती की लागत घटाने के लिए गांवों में वैज्ञानिक पहल
एक तरफ जहां बॉर्डर पर तनाव का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ देश के कृषि वैज्ञानिक किसानों को आत्मनिर्भर और आधुनिक बनाने के लिए सीधे गांवों का रुख कर रहे हैं। हाल ही में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और अन्य क्षेत्रीय संस्थानों द्वारा देश के कई ग्रामीण इलाकों में विशेष जागरूकता शिविर आयोजित किए गए हैं। इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य किसानों को मिट्टी की जांच का महत्व समझाना और उन्हें आधुनिक तकनीक से जोड़ना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अंधी रासायनिक खादों के इस्तेमाल से न सिर्फ जमीन की उपजाऊ शक्ति कम हो रही है, बल्कि किसानों की लागत भी बेवजह बढ़ रही है।
इन जागरूकता शिविरों के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों को मिट्टी परीक्षण किट का इस्तेमाल करने का लाइव प्रशिक्षण दिया। इसके साथ ही यह भी सिखाया गया कि किस फसल के लिए कितनी मात्रा में खाद की जरूरत होती है। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि संतुलित उर्वरकों का प्रयोग ही अधिक पैदावार और सुरक्षित मुनाफे का एकमात्र रास्ता है। कई गांवों में किसानों ने इन किटों को लेकर अपनी गहरी दिलचस्पी दिखाई है और माना है कि इससे उन्हें खेती में होने वाले नुकसान से बचने में बड़ी मदद मिलेगी। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में आज भी कई जगह जागरूकता की भारी कमी है, जिसे दूर करने के लिए इस तरह के अभियानों को और बड़े पैमाने पर चलाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
सुरक्षा और आर्थिक मोर्चे पर किसानों की चुनौतियां
जमीनी स्तर पर किसानों के सामने केवल खेती-किसानी की तकनीकी समस्याएं ही नहीं, बल्कि कई अन्य सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां भी मुंह बाए खड़ी हैं। हाल ही में देश के एक हिस्से से ऐसी खबर भी सामने आई जहां बैंक से पैसे निकालकर लौट रहे एक सीधे-साधे किसान को शातिर चोरों ने अपना निशाना बना लिया। बैंक परिसर से ही किसान का पीछा कर रहे चोरों ने मौका पाकर उसके मेहनत के दो लाख रुपये उड़ा लिए। इस तरह की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि ग्रामीण भारत के लोग आज भी वित्तीय सुरक्षा और साइबर या नकद धोखाधड़ी के मामलों में कितने संवेदनशील और असुरक्षित हैं।
इन तमाम मोर्चों पर पड़ताल करने से यह साफ हो जाता है कि भारतीय किसान का जीवन इस वक्त दो अलग-अलग दुनिया के बीच फंसा हुआ है। एक तरफ वह दिल्ली के बॉर्डर पर अपनी हक की लड़ाई के लिए प्रशासन से सीधा मुकाबला कर रहा है, तो दूसरी तरफ अपने गांव और खेतों में कर्ज, कम पैदावार और रोजमर्रा की सुरक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। सरकार और किसान संगठनों के बीच संवाद की कमी अक्सर ऐसे गतिरोधों को जन्म देती है, जिसका खामियाजा अंततः देश के आम किसानों को ही भुगतना पड़ता है।
आगे की राह और प्रशासनिक तैयारियां
बॉर्डर पर बढ़ते तनाव और किसान नेताओं की सख्त चेतावनियों को देखते हुए आने वाले दिन काफी महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। खुफिया एजेंसियां और स्थानीय प्रशासन दोनों ही स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए हैं ताकि किसी भी अनहोनी को समय रहते टाला जा सके। किसान संगठनों ने अपनी अगली रणनीतिक बैठकों का दौर शुरू कर दिया है, जिसमें वे देश के अन्य राज्यों के किसानों को भी अपने साथ जोड़ने की योजना बना रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक बड़ा बयान सामने नहीं आया है, लेकिन अंदरखाने वार्ताओं के दौर की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है। चाहे वह बॉर्डर पर सुलगती चिंगारी हो या फिर गांवों में मिट्टी की जांच से जुड़ा जमीनी बदलाव, हर पहलू सीधे तौर पर देश के भविष्य से जुड़ा है। किसानों के इन तीखे तेवरों और वैज्ञानिक बदलावों के बीच यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले हफ्तों में सरकार इन मुद्दों का क्या और कैसे समाधान निकालती है, क्योंकि देश का अन्नदाता अब और अधिक इंतजार करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखाई दे रहा है।




