नई दिल्ली से 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के तमाम बड़े नेताओं ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। गठबंधन के नेताओं ने कोर्ट के सामने अपनी दस सूत्रीय मांगें भी रखी थीं। लेकिन अब इस पूरी कानूनी कार्रवाई पर एक तकनीकी अड़चन आ गई है। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ऑफिस की जांच में इस याचिका के अंदर कुल चौदह कमियां पाई गई हैं।
मामले की शुरुआती पड़ताल में सामने आया है कि याचिका में सिर्फ कानूनी पेचीदगियां ही नहीं थीं, बल्कि कागजी प्रक्रिया में भी बड़ी चूक हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, इस याचिका को दाखिल करते समय जो फीस जमा की जानी थी, उसमें दो सौ बीस रुपये की कमी रह गई थी। इसके अलावा दस्तावेजों के फॉर्मेट और जरूरी प्रमाण पत्रों को जोड़ने में भी कुछ नियमों का पालन नहीं किया गया था। यही वजह रही कि देश की सबसे बड़ी अदालत में यह महत्वपूर्ण पिटीशन तय समय पर लिस्ट नहीं हो पाई। अब कानूनी जानकारों का कहना है कि इन कमियों को दूर करने के बाद ही अदालत इस पर आगे कोई सुनवाई करेगी।
इंडिया गठबंधन की दस बड़ी मांगें और मुख्य चुनाव आयुक्त की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है। इंडिया गठबंधन के नेताओं ने कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट के बाहर मार्च निकाला था। इस मार्च में तमाम विपक्षी दलों के बड़े चेहरे शामिल हुए थे। खास बात यह रही कि इस दौरान जन्नत बिश्नोई नाम की एक युवा चेहरा भी भीड़ के बीच चर्चा का केंद्र बनी रहीं। विपक्षी दलों का साफ आरोप है कि देश में निष्पक्ष चुनाव कराने की व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपनी शिकायतों को लेकर दस प्रमुख मांगें उठाई हैं। नेताओं का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए ताकि किसी भी दल को नुकसान न हो।
संसदीय लोकतंत्र और चुनाव प्रणाली की निष्पक्षता को लेकर विपक्ष का यह दबाव काफी बड़ा माना जा रहा है। गठबंधन के नेताओं का तर्क है कि वीवीपैट पर्चियों का सौ प्रतिशत मिलान होना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि डिजिटल वोटिंग डेटा और ईवीएम की सुरक्षा को लेकर कई तरह की आशंकाएं बनी हुई हैं। इन सभी मुद्दों को लेकर वे अदालत से सख्त निर्देश चाहते हैं। हालांकि, जब तक कानूनी याचिका की सभी कमियां पूरी नहीं होतीं, तब तक कोर्ट के स्तर पर कोई आधिकारिक नोटिस जारी नहीं किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच लेकर जाने की पूरी तैयारी में है।
याचिका में तकनीकी कमियां दूर करने में जुटे वकीलों के दल
सुप्रीम कोर्ट के नियमों के मुताबिक किसी भी जनहित याचिका या मुख्य मामले में सभी दस्तावेजों का सही होना अनिवार्य है। राहुल गांधी की कानूनी टीम अब इन चौदह कमियों को तेजी से दूर करने में जुटी हुई है। वकीलों का यह दल उन सभी आपत्तियों को हटा रहा है जो रजिस्ट्री विभाग ने उठाई हैं। इनमें दो सौ रुपये से अधिक की कम पड़ी फीस का भुगतान भी शामिल है। वकीलों का प्रयास है कि जल्द से जल्द इन कमियों को दूर करके फाइल को दोबारा सुनवाई के लिए आगे बढ़ाया जाए। कोर्ट के नियमों के तहत छोटी-छोटी तकनीकी गलतियों के कारण कई बार बड़े मामलों की सुनवाई में देरी हो जाती है।
आम जनता के बीच भी इस बात की चर्चा है कि इतनी बड़ी राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाले दलों से ऐसी कागजी चूक कैसे हो गई। दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष के नेताओं ने इस तकनीकी देरी को लेकर विपक्ष पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि विपक्ष केवल मीडिया में बने रहने के लिए बिना पूरी तैयारी के कोर्ट का रुख करता है। बहरहाल, जब तक याचिका दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं होती, तब तक इस मामले पर असमंजस की स्थिति बनी रहेगी। 'द फ्रीलान्स' की टीम इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और आगे के हर अपडेट से आपको अवगत कराती रहेगी।






