नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान हालात उस समय तनावपूर्ण हो गए जब पुलिस ने सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस यानी सीजेपी से जुड़े प्रमुख कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई में सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे जाने-माने नाम शामिल थे, जिन्हें पुलिस ने तुरंत मौके से हटाकर थाने पहुंचा दिया था। इस पूरे घटनाक्रम के सामने आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का यह समूह देश के विभिन्न मुद्दों पर लगातार आवाज उठाता रहा है, लेकिन इस तरह की पुलिसिया कार्रवाई ने सुरक्षा प्रबंधों और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के बीच की रेखा को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ तब आया जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इन दोनों कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ अपनी स्पष्ट आवाज बुलंद की। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से इस कार्रवाई की तीखी आलोचना की और कहा कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना और विरोध जताना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। राहुल गांधी के समर्थन के बाद इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी राजनीतिक पहचान मिल गई है, जिससे विपक्षी दलों को सरकार को घेरने का एक और मौका मिल गया है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि तानाशाही रवैये से जनता की आवाज को खामोश नहीं किया जा सकता है और वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए पूरी ताकत से लड़ते रहेंगे।
शर्तों पर रिहाई के बाद कार्यकर्ताओं की तीखी प्रतिक्रिया
हिरासत में लिए जाने और लंबी कानूनी तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बाद आखिरकार सौरव दास, आशुतोष रांका और उनके साथी अभिजीत दिपके को कुछ सख्त शर्तों के आधार पर रिहा कर दिया गया है। जेल या हिरासत से बाहर आते ही अभिजीत दिपके ने मीडिया के सामने तीखा रुख अपनाया और दो टूक कहा कि आप किसी भी तरीके से जनता के प्रतिरोध को नहीं दबा सकते हैं। उन्होंने साफ किया कि सरकार चाहे जितनी भी पाबंदियां लगा ले, सच बोलने वालों के हौसले को कमजोर नहीं किया जा सकता है। इन नेताओं की रिहाई के बाद जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में उनके समर्थकों का जमावड़ा लगना शुरू हो गया था, जहां उन्होंने प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और अपनी मांगों पर अडिग रहने का संकल्प दोहराया।
रिहाई के तुरंत बाद अभिजीत दिपके ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा इस मुद्दे पर समर्थन दिए जाने के लिए उनका खुले दिल से धन्यवाद किया। दिपके ने कहा कि जब देश का मुख्य विपक्ष और बड़े नेता इस तरह से जनहित के मुद्दों और कार्यकर्ताओं के साथ खड़े होते हैं, तो तानाशाही ताकतों का मनोबल गिरता है। उन्होंने इसे लोकतंत्र की जिंदादिली का प्रतीक बताया और कहा कि यह लड़ाई सिर्फ सौरव और आशुतोष की नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस नागरिक की है जो संविधान और कानून के दायरे में रहकर अपनी बात कहना चाहता है। इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले दिनों में विपक्ष इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक कितनी मजबूती से उठाएगा।
कानूनी पेच और नागरिक अधिकारों की मौजूदा स्थिति
इस पूरी घटना ने देश में नागरिक अधिकारों, प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मानवाधिकार संगठनों और वकीलों का एक बड़ा वर्ग लगातार यह कह रहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना किसी भी सूरत में अपराध नहीं हो सकता है, बशर्ते वह हिंसात्मक न हो। जंतर-मंतर जैसे ऐतिहासिक धरना स्थलों पर इस तरह की पाबंदियां और अचानक की जाने वाली गिरफ्तारियां लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि शर्तों पर रिहाई का यह मतलब नहीं है कि मामले की वैधता साबित हो गई है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि सरकारें असहमति की आवाजों से किस हद तक असहज महसूस कर रही हैं।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब जंतर-मंतर के आसपास के स्थानीय दुकानदारों और अन्य प्रदर्शनकारियों से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि पुलिस और प्रशासन की ओर से सुरक्षा के नाम पर अनावश्यक सख्ती बरती जा रही है। आम नागरिकों का यह भी कहना है कि यदि देश में महंगाई, बेरोजगारी और अन्य गंभीर मुद्दों पर बात करने वालों को इस तरह जेल में डाला जाएगा, तो आम आदमी की समस्याओं को कौन सुनेगा। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत के राजनीतिक पटल पर नागरिक अधिकार और सरकारी नियंत्रण की यह खींचतान अभी और लंबी चलने वाली है, जिस पर हर देशवासी की गहरी नजर बनी हुई है।





