देश में निष्पक्ष चुनाव प्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुनवाई की है। अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इसके साथ ही अदालत ने प्रक्रिया की समीक्षा को लेकर कुछ स्पष्ट शर्तें भी तय की हैं।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने नए कानून की संवैधानिक वैधता को अदालत में चुनौती दी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों ने चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को बाहर किए जाने का कड़ा विरोध किया है। अब शीर्ष अदालत इस पूरे मामले के कानूनी पहलुओं की बारीकी से जांच कर रही है।
चयन समिति के नए ढांचे पर उठा विवाद
संसद ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए साल 2023 में नया कानून पारित किया था। इस कानून के तहत बनी समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष शामिल हैं। पुराने फैसले में अदालत ने चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने का निर्देश दिया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नई व्यवस्था से कार्यपालिका का पलड़ा भारी हो गया है। इसमें तीन में से दो सदस्य सीधे सरकार के होते हैं। इससे चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
"लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सबसे जरूरी है। चयन समिति का संतुलन किसी भी सूरत में नहीं बिगड़ना चाहिए।"— याचिकाकर्ता के वकील, सुप्रीम कोर्ट में दलील
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य दलों का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर जनता का भरोसा बना रहना चाहिए। अगर चयन प्रक्रिया पर ही सवाल उठेंगे, तो चुनावी नतीजों की साख पर असर पड़ेगा। इसी आधार पर उन्होंने इस प्रक्रिया को चुनौती दी है।
ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति और सरकार का पक्ष
नए कानून के तहत ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। इस नियुक्ति के तुरंत बाद ही विपक्ष ने चयन की गति और पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए थे। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि समिति के सदस्यों को नामों की सूची बहुत देर से दी गई थी।
केंद्र सरकार ने अदालत में अपना पक्ष मजबूती से रखा। सरकार का कहना है कि संसद को कानून बनाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। यह कानून पूरी तरह से संविधान के दायरे में रहकर बनाया गया है।
अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि कार्यपालिका के पास नियुक्तियों की शक्ति संविधान से मिलती है। इसलिए चयन समिति में मंत्रियों की मौजूदगी को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने रखी निष्पक्ष जांच की शर्त
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह कानून की संवैधानिक वैधता की जांच करेगी। लेकिन इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि सामान्य प्रशासनिक कामकाज में अनावश्यक दखल नहीं दिया जाएगा।
अदालत ने केंद्र सरकार से प्रक्रिया से जुड़े सभी दस्तावेज और विवरण तलब किए हैं। कोर्ट यह समझना चाहता है कि शॉर्टलिस्ट किए गए अधिकारियों के नामों पर विचार कैसे हुआ था। क्या समिति के सभी सदस्यों को विचार-विमर्श के लिए पर्याप्त समय दिया गया था?
न्यायालय ने कहा कि किसी भी संस्था की स्थिरता बहुत जरूरी है। इसलिए प्रक्रिया की वैधता तय करने के लिए विस्तृत कानूनी परीक्षण की आवश्यकता होगी।
विपक्ष की दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ताओं की ओर से तत्काल रोक लगाने की मांग की गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद संतुलित रुख अपनाया। अदालत ने अंतरिम आदेश पारित करके नियुक्तियों पर तुरंत रोक लगाने से मना कर दिया।
अदालत का मानना था कि चुनाव प्रक्रिया को किसी भी तरह से अधर में नहीं छोड़ा जा सकता। आयोग के कामकाज में निरंतरता होना देशहित में बेहद जरूरी है। इसलिए अदालत ने बिना जल्दबाजी किए पूरे मामले की विस्तृत समीक्षा करने का फैसला किया।
राहुल गांधी की याचिका में उठाए गए बिंदुओं पर भी अदालत ने विचार किया। अदालत ने कहा कि राजनीतिक दलों की चिंताओं को सुना जाएगा, लेकिन फैसला केवल संविधान के मूल सिद्धांतों के आधार पर होगा।
आगे क्या होगा कानूनी प्रक्रिया में
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना विस्तृत जवाबी हलफनामा दायर करने के लिए समय दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता अपना प्रत्युत्तर दाखिल करेंगे। मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने निश्चित तारीख तय करने का निर्देश दिया है।
संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस फैसले से भविष्य में स्वायत्त संस्थाओं में नियुक्तियों का तरीका तय होगा। पूरे देश की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट के आने वाले अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।






