देशभर के शिक्षण संस्थानों और चिकित्सा जगत में इन दिनों सिर्फ एक ही शब्द चर्चा के केंद्र में है—'सीट मैट्रिक्स'। आयुष काउंसलिंग से लेकर एमबीबीएस, नीट पीजी और कृषि विश्वविद्यालयों तक, यह तकनीकी दस्तावेज इस समय लाखों महत्वाकांक्षी छात्रों के भविष्य की डोर थामे बैठा है। द फ्रीलान्स की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेटिव टीम ने जब इस व्यवस्था की परतें टटोलीं, तो प्रशासनिक लापरवाही, पारदर्शिता की कमी और छात्रों की बढ़ती बेचैनी की एक डरावनी तस्वीर सामने आई।
आयुष और कृषि शिक्षा का अटका पहिया
आयुष 2026 काउंसलिंग के दूसरे दौर के लिए आधिकारिक वेबसाइट (aaccc.gov.in) पर जैसे ही सीट मैट्रिक्स जारी हुआ, छात्रों की सांसें थम सी गईं। पिछले कई हफ्तों से अपनी सीट पक्की होने का इंतजार कर रहे छात्र अब नियमों और कॉलेजों की सूची के बीच उलझकर रह गए हैं। हालात तब और बदतर हो गए जब कृषि शिक्षा के क्षेत्र से चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। रिपोर्टों के मुताबिक, अकेले 11 प्रतिष्ठित निजी कृषि विश्वविद्यालयों ने समय पर अपना सीट मैट्रिक्स उपलब्ध नहीं कराया, जिसकी वजह से पिछले डेढ़ महीने से पूरी काउंसलिंग प्रक्रिया ठप पड़ी है। सवाल यह उठता है कि आखिर इन संस्थानों पर नकेल कसने वाला कोई क्यों नहीं है?
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एमबीबीएस और नीट पीजी: 1.40 लाख सीटों का गणित और सख्ती
दूसरी ओर, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने एमबीबीएस 2026 के लिए 1.40 लाख सीटें मंजूर करने का बड़ा ऐलान तो कर दिया है, लेकिन इसके साथ ही कॉलेजों के लिए चेतावनी भी जारी की गई है कि वे निर्धारित कोटे से एक भी अतिरिक्त एडमिशन न लें। वहीं, मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) द्वारा नीट यूजी के तीसरे दौर में नई सीटें जोड़े जाने से उम्मीदें तो जगी हैं, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि किस राज्य को इसका सबसे बड़ा फायदा मिलता है। दूसरी तरफ, NEET PG 2026 के परिणामों के बाद ऑल इंडिया कोटा और स्टेट कोटा की सीटों का बंटवारा भी छात्रों के लिए एक पहेली बना हुआ है।
प्रशासनिक सुस्ती बनाम छात्रों का मानसिक तनाव
"हम महीनों से काउंसलिंग की तारीखों का इंतजार कर रहे हैं। कभी सीट मैट्रिक्स देर से आता है, तो कभी कॉलेज अपनी लिस्ट देने में आनाकानी करते हैं। इस उठापटक में हमारा एक साल बर्बाद हो रहा है और मानसिक तनाव अलग से झेलना पड़ रहा है," यह कहना है दिल्ली के एक मेडिकल एस्पिरेंट का, जो पिछले दो सत्रों से काउंसलिंग के चक्कर काट रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीट मैट्रिक्स जैसी बुनियादी प्रक्रिया का समय पर और पारदर्शी तरीके से प्रकाशित न होना देश की उच्च शिक्षा प्रणाली की लचर व्यवस्था को उजागर करता है। जब तक केंद्रीय और राज्य स्तर की एजेंसियां आपस में समन्वय स्थापित नहीं करेंगी, तब तक छात्र इसी तरह पिसते रहेंगे।
निष्कर्ष और आगे की राह
द फ्रीलान्स की पड़ताल साफ इशारा करती है कि केवल बड़ी घोषणाएं करने से शिक्षा का स्तर नहीं सुधरेगा। 'सीट मैट्रिक्स' के इस खेल में पारदर्शिता का अभाव सीधे तौर पर देश की युवा प्रतिभाओं के साथ खिलवाड़ है। समय आ गया है कि शिक्षा मंत्रालय और संबंधित काउंसलिंग बोर्ड्स इस पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल, समयबद्ध और जवाबदेह बनाएं, ताकि हर छात्र को उसका हक पारदर्शी तरीके से मिल सके।








