गया की माटी में उतर आई फिल्मी दुनिया
बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरती इन दिनों एक अलग ही कारण से सुर्खियों में बनी हुई है। हिंदी सिनेमा के जाने-माने कलाकार और क्रू मेंबर्स गया जिले के ग्रामीण इलाकों में डेरा डाले हुए हैं। विश्वप्रसिद्ध बोधगया की डुंगेश्वरी पहाड़ी के आसपास का इलाका इन दिनों एक बड़े फिल्म सेट में तब्दील हो चुका है। यहाँ चल रही फिल्म 'अर्धनायक' की शूटिंग ने स्थानीय लोगों में भारी उत्साह भर दिया है। सामान्य दिनों में शांत रहने वाले खेत-खलिहान और मिट्टी के घर अब कैमरों की चकाचौंध और फिल्मी कलाकारों की चहल-पहल से आबाद हैं।
इस पूरी फिल्म शूटिंग के दौरान जिस बात ने सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान खींचा है, वह है बॉलीवुड अभिनेत्री स्नेहा उल्लाल का ग्रामीण परिवेश के साथ पूरी तरह घुलमिल जाना। सलमान खान के साथ फिल्म 'लकी: नो टाइम फॉर लव' से अपनी फिल्मी पारी की शुरुआत करने वाली स्नेहा इस फिल्म में 'लालमुनिया' के मुख्य किरदार में नजर आएंगी। कैमरे के सामने आने से पहले वह ऑफ-स्क्रीन भी एक आम ग्रामीण महिला की तरह सादगी से पेश आ रही हैं, जिसने वहाँ के बाशिंदों का दिल जीत लिया है।
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सूती साड़ी और बिंदी में नजर आया 'बिहार की छोरी' का अंदाज
फिल्म के किरदार की माँग के अनुसार स्नेहा उल्लाल ने पूरी तरह से बिहारी लुक अपनाया हुआ है। वह सूती साड़ी और माथे पर पारंपरिक बिंदी लगाए हुए सेट पर नजर आती हैं। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक तस्वीर भी साझा की थी, जिसमें उनका यह देसी अवतार काफी पसंद किया जा रहा है। उनके फैंस इस लुक की तुलना 'बिहार की छोरी' से कर रहे हैं। शूटिंग के बीच मिलने वाले ब्रेक में वह वीआईपी वैन में बैठने के बजाय सीधे जमीन पर चटाई बिछाकर ग्रामीण महिलाओं के साथ बैठ जाती हैं।
मंजू देवी और दौलती देवी जैसी स्थानीय महिलाओं के घरों के आसपास ही शूटिंग के दृश्य फिल्माए जा रहे हैं। इन महिलाओं के लिए फिल्मी दुनिया किसी अजूबे से कम नहीं है, लेकिन स्नेहा के मिलनसार स्वभाव ने उनके बीच की झिझक को पूरी तरह खत्म कर दिया है। महिलाएं उनके साथ अपने सुख-दुख और रोजमर्रा की जिंदगी के संघर्षों को साझा करती हैं। स्नेहा भी पूरी उत्सुकता के साथ उनकी परंपराओं और जीवनशैली के बारे में जानकारी हासिल करती हैं.
बकरी के बच्चों के साथ मस्ती और बिहार के लोगों का नरम दिल
शूटिंग के दौरान स्नेहा उल्लाल का एक अलग ही और बेहद प्यारा रूप देखने को मिला है। उन्हें जानवरों से बहुत लगाव है और फुर्सत के पलों में वह गांव में घूम रहे गाय और बकरी के छोटे-छोटे बच्चों के साथ खेलती नजर आती हैं। एक दिलचस्प वाकये का जिक्र करते हुए उन्होंने मीडिया से बातचीत में बताया कि उन्होंने ग्रामीण महिलाओं से बकरी के बच्चे का नाम रखने की बात कही, जिस पर सभी ठहाका मारकर हंस पड़े। उनका यह सहज और मजाकिया अंदाज स्थानीय लोगों को अपना दीवाना बना रहा है।
बिहार के लोगों के बारे में बात करते हुए अभिनेत्री ने कहा कि यहाँ के लोग बेहद प्यारे और नरम दिल के हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पहले उन्हें इस क्षेत्र के बारे में इतनी जानकारी नहीं थी, लेकिन यहाँ आने के बाद उन्हें जो आत्मीयता मिली है, वह अविस्मरणीय है।
"यहाँ के लोग बहुत प्यारे हैं, बहुत नरम दिल हैं। मैं इनके साथ बैठी थी और बता रही थी कि इनको बकरी के बच्चे का नाम रखना चाहिए, तो सब लोग हंसने लगे। बिहार में आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।" — स्नेहा उल्लाल, अभिनेत्री
50 के दशक के ग्रामीण परिवेश पर आधारित है 'अर्धनायक'
यह फिल्म केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी कहानी बेहद मजबूत सामाजिक ताने-बाने पर बुनी गई है। फिल्म के निर्देशक अंजनी कुमार हैं और इसके निर्माता डी. आलिया हैं। कहानी का ताना-बाना 1950 के दशक के ग्रामीण बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें मुख्य रूप से लोक कलाओं के हो रहे क्षरण और पानी के विकराल होते संकट जैसे गंभीर विषयों को उठाया गया है।
फिल्म में स्नेहा उल्लाल के अलावा पुष्यमित्र, 'भाभी जी घर पर हैं' फेम अनूप कुमार सिंह और जाने-माने अभिनेता राजेश कुमार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आएंगे। फिल्म की पटकथा और विषय-वस्तु को लेकर कलाकारों और क्रू मेंबर्स में काफी उत्साह देखा जा रहा है।
दिग्गज लेखक शैवाल की वापसी और क्षेत्रीय सिनेमा को नई उड़ान
इस प्रोजेक्ट की सबसे खास बात यह है कि इसके जरिए हिंदी सिनेमा और क्षेत्रीय कला का एक बेहतरीन संगम देखने को मिल रहा है। फिल्म की पटकथा से जुड़े मशहूर लेखक शैवाल, जो अपनी बेहतरीन रचनाओं जैसे 'दामुल' और 'मृत्युदंड' के लिए जाने जाते हैं, करीब 80 वर्ष की आयु में इस फिल्म के माध्यम से एक बार फिर सक्रिय हुए हैं। उनका मानना है कि यह फिल्म बिहार की संस्कृति और कला को वैश्विक पटल पर मजबूती से रखेगी।
लेखक शैवाल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि बिहार में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। इस फिल्म का मुख्य उद्देश्य हमारी सांस्कृतिक जड़ों और लोक कलाओं को सहेजना है। पानी की समस्या जैसी बुनियादी चुनौती को कहानी के केंद्र में रखकर यह फिल्म समाज को एक सकारात्मक संदेश देने का प्रयास कर रही है। गया में चल रही इस शूटिंग ने यह साबित कर दिया है कि जब बड़े पर्दे के सितारे जमीन से जुड़कर काम करते हैं, तो दर्शक भी उनके साथ गहराई से जुड़ जाते हैं।








