उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग की सुगबुगाहट तेज
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों की सियासी सरगर्मी अभी से ही अपने चरम पर पहुंचने लगी है। राज्य की सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटी हुई हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन यानी इंडिया ब्लॉक के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान शुरू हो चुकी है। कांग्रेस पार्टी जहां राज्य में अपनी ताकत दिखाने के लिए कम से कम डेढ़ सौ सीटों पर ताल ठोकने की तैयारी कर रही है, वहीं मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी अपने गठबंधन सहयोगियों को बहुत ज्यादा जगह देने के मूड में नजर नहीं आ रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या दोनों दलों के बीच सीटों का यह अंतर आने वाले दिनों में किसी बड़े मतभेद का कारण बनेगा या फिर कोई बीच का रास्ता निकाला जाएगा।
समीक्षकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनावी समीकरण साधना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होता है। पिछले कुछ समय से जिस तरह से कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेताओं और सांसदों ने खुलकर अपनी दावेदारी पेश की है, उससे साफ जाहिर होता है कि पार्टी इस बार आसानी से पीछे हटने वाली नहीं है। हालांकि, समाजवादी पार्टी के रणनीतिकार जमीनी हकीकत और पिछले चुनावों के आंकड़ों के आधार पर ही कोई भी फैसला लेने के पक्ष में दिख रहे हैं। पार्टी नेतृत्व का साफ मानना है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले सीटों की जीत की संभावनाओं का बारीकी से आकलन करना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी तरह के नुकसान से बचा जा सके।
संबंधित खबरें
सपा का फॉर्मूला: कांग्रेस के लिए 55 सीटें और खुद के लिए 350 का लक्ष्य
सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों को आधार बनाते हुए एक नया सीट-शेयरिंग फॉर्मूला तैयार किया है। इस प्रस्तावित खाके के तहत सपा कांग्रेस पार्टी को लगभग 53 से 55 सीटें देने का मन बना रही है। इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी खुद उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 350 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की बड़ी तैयारी कर रही है। पार्टी का तर्क है कि जिन क्षेत्रों में उसकी सांगठनिक पकड़ और जमीनी ताकत सबसे ज्यादा मजबूत है, वहां वह खुद चुनाव लड़ेगी ताकि अधिकतम सफलता हासिल की जा सके।
यह पूरा गणित हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों के विधानसभा-वार नतीजों पर टिका हुआ है। वर्ष 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में छह सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी, जिनके अंतर्गत कुल 30 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इसके अलावा 11 ऐसी विधानसभा सीटें भी हैं जहां कांग्रेस उम्मीदवारों ने कड़ा मुकाबला किया था लेकिन वे विजयी नहीं हो पाए थे। इन्हीं आंकड़ों और प्रदर्शन के आधार पर सपा ने कांग्रेस के लिए सीटों का यह आंकड़ा तय किया है। वहीं दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने खुद 37 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी और कई अन्य सीटों पर भी विधानसभा स्तर पर मजबूत बढ़त बनाई थी, जिसके बल पर वह 350 सीटों पर अपनी दावेदारी मजबूत मान रही है।
कांग्रेस नेताओं की 150 सीटों की जिद और सपा का स्पष्ट रुख
एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी सीमित सीटों का प्रस्ताव दे रही है, वहीं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता लगातार आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं। कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद कई मंचों से सार्वजनिक तौर पर यह बयान दे चुके हैं कि उनकी पार्टी किसी भी कीमत पर 150 से कम सीटों पर समझौता नहीं करेगी। कांग्रेस खेमे का यह भी दावा है कि उनके पास राज्य की सभी 403 सीटों के लिए सक्षम और मजबूत उम्मीदवारों की पूरी सूची तैयार है, और गठबंधन के तहत उन्हें आधी सीटों का हक मिलना चाहिए।
इस बीच, समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस की इस मांग पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव और अन्य प्रवक्ताओं ने दो टूक शब्दों में कहा है कि गठबंधन के भीतर रहकर इस तरह के बड़े-बड़े दावे करना और दबाव की राजनीति करना ठीक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सपा का एकमात्र उद्देश्य भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करना है और वे किसी भी ऐसे बयान को ज्यादा तवज्जो नहीं देते जो गठबंधन के साझा हितों को नुकसान पहुंचाए।
"हमारा मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश से भाजपा को हराना और हटाना है। अगर हमारे गठबंधन के साथी किसी सीट पर जीतने की पूरी काबिलियत रखते हैं, तो सीटों की संख्या को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।" — समाजवादी पार्टी नेतृत्व
वर्ष 2017 के गठबंधन की कड़वी यादें और वर्तमान राजनीतिक समीकरण
राजनीतिक विश्लेषक इस पूरी माथापच्ची को साल 2017 के विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहे हैं। उस समय भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था, जिसमें कांग्रेस को 105 सीटें दी गई थीं। हालांकि, वह प्रयोग चुनावी मैदान में पूरी तरह असफल साबित हुआ था और दोनों ही दल मिलकर दहाई के आंकड़े के आसपास सिमट गए थे। उस कड़वे अनुभव से सबक लेते हुए इस बार समाजवादी पार्टी बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और किसी भी सूरत में अपनी पारंपरिक और मजबूत सीटों को छोड़ने के पक्ष में बिल्कुल नहीं दिखाई दे रही है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी अपनी राष्ट्रीय स्तर की रीपोज़िशनिंग और संगठन को दोबारा जमीन पर खड़ा करने की कवायद में जुटी है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि राज्य में अपनी खोई हुई जमीन वापस पानी है, तो पार्टी को अधिक से अधिक सीटों पर लड़ना ही होगा। ऐसे में दोनों दलों के बीच केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर होने वाली आगामी बैठकों में ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो पाएगी कि अंततः सीट बंटवारे का यह ऊँट किस करवट बैठता है।



