सिनेमा की दुनिया में कम उम्र में रखा कदम
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी उन चुनिंदा कलाकारों की बात होगी जिन्होंने अपने अभिनय के दम पर सिल्वर स्क्रीन पर राज किया, तो श्रीदेवी का नाम सबसे ऊपर आएगा। बहुत कम उम्र में बाल कलाकार के रूप में अभिनय की दुनिया में कदम रखने वाली श्रीदेवी ने अपनी मेहनत, लगन और सहज अभिनय शैली से दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई। उन्होंने न केवल दक्षिण भारतीय सिनेमा में अपनी धाक जमाई, बल्कि बॉलीवुड में कदम रखते ही बॉक्स ऑफिस के सारे समीकरण बदल दिए। एक समय ऐसा आया जब उन्हें हिंदी सिनेमा की पहली 'फीमेल सुपरस्टार' कहा जाने लगा, क्योंकि उनकी मौजूदगी ही फिल्म की सफलता की गारंटी बन गई थी।
श्रीदेवी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे किसी भी सांचे में खुद को ढाल सकती थीं। चाहे कॉमेडी हो, ड्रामा हो, एक्शन हो या फिर एक गंभीर और संवेदनशील किरदार, उन्होंने हर विधा में खुद को साबित किया। उनके चेहरे के भाव और आंखों से संवाद करने की कला ऐसी थी कि दर्शक उनके साथ हंसते और रोते थे। यही वजह है कि आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा निभाए गए किरदार आज भी हमारी स्मृतियों में पूरी तरह जीवंत हैं।
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'सदमा' में मासूमियत और अभिनय का बेजोड़ संगम
साल 1983 में रिलीज हुई फिल्म 'सदमा' को भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन और भावनात्मक फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म में श्रीदेवी ने एक ऐसी लड़की का किरदार निभाया था जो एक हादसे के बाद अपनी मानसिक स्थिति खो बैठती है और बच्चों जैसी हरकतें करने लगती है। फिल्म के आखिरी दृश्य में उनका कमल हासन के सामने अभिनय देखकर आज भी दर्शकों की आंखें नम हो जाती हैं। बिना किसी बड़े संवाद के सिर्फ अपनी आंखों और शारीरिक भाषा के जरिए उन्होंने जिस तरह से उस दर्द को पर्दे पर उतारा, वह अभिनय का एक दुर्लभ उदाहरण है।
इस फिल्म ने आलोचकों को भी यह मानने पर मजबूर कर दिया कि श्रीदेवी केवल एक ग्लैमरस अभिनेत्री नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर एक असाधारण और परिपक्व कलाकार छिपा है। 'सदमा' के बाद उनके करियर का ग्राफ तेजी से ऊपर उठा और उन्हें निर्देशकों की पहली पसंद बना दिया। आज भी जब इस फिल्म का जिक्र होता है, तो सबसे पहले श्रीदेवी का वह मासूम चेहरा और उनका निष्कपट अभिनय ही लोगों के जहन में आता है।
'मिस्टर इंडिया' और 'चालबाज़' में दिखा कॉमिक और ग्लैमरस अंदाज
गंभीर और भावुक भूमिकाएं निभाने के साथ-साथ श्रीदेवी ने कॉमिडी और ग्लैमर के मामले में भी नए कीर्तिमान स्थापित किए। शेखर कपूर के निर्देशन में बनी फिल्म 'मिस्टर इंडिया' में उन्होंने एक खोजी पत्रकार सीमा साहनी की भूमिका निभाई। फिल्म में उनका चुलबुलापन, रिपोर्टिंग करने का अंदाज और 'हवा हवाई' गाने पर किया गया उनका प्रतिष्ठित डांस आज भी पॉप कल्चर का हिस्सा है। इस फिल्म ने उन्हें एक कॉमेडी क्वीन के रूप में भी स्थापित किया।
इसके बाद आई पंकज पाराशर की फिल्म 'चालबाज़' में श्रीदेवी ने जुड़वां बहनों (अंजू और मंजू) का डबल रोल निभाया। एक बहन बिल्कुल सीधी-सादी और डरी हुई थी, तो दूसरी एकदम बिंदास और दबंग। दोनों किरदारों के बीच का अंतर उन्होंने जिस खूबी और कॉमिक टाइमिग के साथ निभाया, वह आज की अभिनेत्रियों के लिए भी एक पाठ की तरह है। इस फिल्म में सनी देओल और रजनीकांत के साथ उनकी केमिस्ट्री को भी बहुत पसंद किया गया था।
'नगीना' और 'चांदनी' से बॉलीवुड पर जमाया सिक्का
साल 1986 में आई फिल्म 'नगीना' ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए। इस फिल्म में श्रीदेवी ने इच्छाधारी नागिन 'रजनी' का किरदार निभाया था। फिल्म का क्लाइमेक्स और उनका 'नागिन डांस' आज भी दर्शकों को अच्छी तरह याद है। इस रोल को निभाना किसी भी अभिनेत्री के लिए एक बड़ा जोखिम था, लेकिन श्रीदेवी ने अपनी आंखों के सम्मोहन और शानदार नृत्य से इस काल्पनिक किरदार को भी जीवंत कर दिया। यह फिल्म उनके करियर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक साबित हुई।
इसके ठीक बाद यश चोपड़ा की फिल्म 'चांदनी' ने उन्हें रोमांस की मल्लिका बना दिया। सफेद शिफॉन साड़ियों में लिपटी श्रीदेवी की सुंदरता और उनका रोमांटिक अंदाज इस फिल्म का मुख्य आकर्षण था। 'चांदनी' ने न केवल फैशन की एक नई परिभाषा गढ़ी, बल्कि यह भी साबित किया कि श्रीदेवी किसी भी रोमांटिक फिल्म की अकेली जान हो सकती हैं। इस फिल्म के गाने और उनके दृश्यों ने युवाओं के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।
'इंग्लिश विंग्लिश' और 'मॉम' से की धमाकेदार वापसी
शादी के बाद फिल्मों से लंबा ब्रेक लेने के बाद श्रीदेवी ने साल 2012 में गौरी शिंदे की फिल्म 'इंग्लिश विंग्लिश' से सिल्वर स्क्रीन पर वापसी की। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसी गृहिणी का किरदार निभाया जो अंग्रेजी न जानने की वजह से अपने परिवार में ही हीनभावना का शिकार होती है, लेकिन फिर हिम्मत जुटाकर अंग्रेजी सीखती है। यह कहानी हर उस घरेलू महिला की थी जो अपने आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करती है। श्रीदेवी की यह वापसी बेहद शानदार रही और आलोचकों के साथ-साथ दर्शकों ने भी इसे खुले दिल से अपनाया।
उनकी आखिरी फिल्म 'मॉम' (2017) उनके करियर की सबसे गंभीर और शक्तिशाली फिल्मों में गिनी जाती है। एक मां के रूप में अपने बच्चे के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने वाली इस थ्रिलर फिल्म में उनका अभिनय रोंगटे खड़े कर देने वाला था। इस फिल्म के लिए उन्हें मरणोपरांत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
"श्रीदेवी जैसी कलाकार सदियों में एक बार पैदा होती हैं। उनका जाना भारतीय सिनेमा के लिए एक अपूरणीय क्षति है, लेकिन उनके किरदार हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।" — बोनी कपूर, फिल्म निर्माता
निष्कर्ष
श्रीदेवी का अभिनय सफर इस बात का प्रमाण है कि यदि आपके पास प्रतिभा है, तो भाषा और समय की कोई सीमा नहीं होती। उन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा से लेकर बॉलीवुड तक जो मुकाम हासिल किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और उनके द्वारा निभाए गए अमर किरदार हमेशा हिंदी सिनेमा के सुनहरे पन्नों पर चमकते रहेंगे।





