ग्लोबल वार्मिंग और सुपर अल नीनो का खतरनाक कॉकटेल
दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन का असर अब बेहद खतरनाक रूपों में सामने आने लगा है। हाल ही में शिकागो विश्वविद्यालय के ‘एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट’ की ओर से जारी एक सनसनीखेज अध्ययन रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में सक्रिय ‘सुपर अल नीनो’ का प्रभाव आने वाले महीनों में और अधिक आक्रामक होने वाला है। इसके कारण वैश्विक तापमान में भारी उछाल आने की पूरी संभावना है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर संकट का संकेत दे रहा है।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस प्राकृतिक जलवायु चक्र और ग्लोबल वार्मिंग के संयुक्त प्रभाव से अगले छह महीनों यानी करीब 180 दिनों के भीतर दुनियाभर में लगभग 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह आंकड़ा सामान्य वर्षों की तुलना में काफी ज्यादा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र की सतह के गर्म होने और वायुमंडलीय बदलावों के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में भीषण लू और सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
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अध्ययन के आंकड़े और वैज्ञानिक कार्यप्रणाली
इस महत्वपूर्ण अध्ययन की सह-लेखिका एमिली ग्रोवर-कोपेक ने इस डरावने अनुमान के पीछे के वैज्ञानिक आधारों को साझा किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अंदेशा मुख्य रूप से दो बड़े कारकों पर आधारित है—पहला, मौसमी तापमान का पूर्वानुमान और दूसरा, तापमान तथा मृत्यु-दर के बीच का सीधा संबंध। शोध टीम ने ‘यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स’ (ईसीएमडब्ल्यूएफ एसईएएस) के मौसमी पूर्वानुमानों का उपयोग किया है, जिन्हें वैश्विक स्तर पर सबसे सटीक और व्यापक माना जाता है।
एमिली ग्रोवर-कोपेक ने आगे बताया कि उनके द्वारा उपयोग किए गए आंकड़े और पद्धतियां पूरी तरह से ‘पियर रिव्यू’ से गुजर चुकी हैं। नवंबर 2022 में अर्थशास्त्र की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘क्वाटर्ली जर्नल ऑफ इकोनॉमिक्स’ में प्रकाशित एक पुराने अध्ययन के सूत्रों को ही इस नए अल्पकालिक पूर्वानुमान मॉडल में ढाला गया है। इसके जरिए यह समझने की कोशिश की गई है कि तापमान में मामूली वृद्धि भी इंसानी शरीर और विशेषकर कमजोर वर्ग के लिए कितनी घातक साबित हो सकती है।
भारत पर क्या होगा सुपर अल नीनो का असर
अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के भारतीय संदर्भों पर बात करें तो देश के भीतर भी स्थिति चिंताजनक हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस ‘सुपर अल नीनो’ के प्रभाव से भारत में अगले छह महीनों के दौरान गर्मी के कारण करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें होने की आशंका जताई गई है। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति कितना संवेदनशील है और यहां लगातार बढ़ते तापमान से किस स्तर पर मानवीय संकट खड़ा हो रहा है।
प्राकृतिक संसाधन रक्षा परिषद (एनआरडीसी) की जलवायु लचीलापन और स्वास्थ्य संबंधी टीम का नेतृत्व करने वाले अभियांत तिवारी ने इस रिपोर्ट को एक बेहद उपयोगी ‘प्रारंभिक चेतावनी’ करार दिया है। उनका मानना है कि हालांकि यह आंकड़े मॉडल के अनुमानों पर आधारित हैं और इनकी विस्तृत समीक्षा की जानी अभी बाकी है, फिर भी इनसे मिलने वाले संकेत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह समय पर ठोस कदम उठाने और अपनी तैयारियों को पुख्ता करने का स्पष्ट संदेश देता है।
तैयारियों और हीट एक्शन प्लान की अहमियत
बढ़ते तापमान और अल नीनो के संभावित खतरों से निपटने के लिए भारत के पास पहले से ही कुछ संस्थागत अनुभव मौजूद हैं। जानकारों का कहना है कि देश के कई हिस्सों में लागू किए गए ‘हीट एक्शन प्लान’ इस दिशा में एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम कर सकते हैं। हालांकि, जिस तरह से तापमान के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं, उसे देखते हुए इन योजनाओं के दायरे और उनकी प्रभावशीलता को जमीनी स्तर पर और अधिक मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और संकाय सदस्य डॉ. हर्षल रमेश साल्वे ने इस बात पर जोर दिया है कि इस तरह के वैज्ञानिक अध्ययन हमें पहले से सतर्क होने का मौका देते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर गर्मी के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए युद्ध स्तर पर रणनीति बनानी होगी ताकि कमजोर और संवेदनशील समुदायों के जीवन की रक्षा की जा सके।
भविष्य का जोखिम और वैश्विक तापमान में वृद्धि
शोध रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले महीनों में वैश्विक तापमान सामान्य से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह तापमान वृद्धि उस स्थिति के समान है जिसकी आशंका आमतौर पर जलवायु मॉडलों में अगले 20 वर्षों के भीतर जताई जाती थी। इसका मतलब यह है कि भविष्य का जलवायु संकट तय समय से बहुत पहले हमारे सामने आ खड़ा हुआ है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) का यह भी अनुमान है कि यह अल नीनो चक्र अपनी चरम सीमा की ओर बढ़ रहा है, जिससे 2027 का वर्ष इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शुमार हो सकता है। पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से रिकॉर्ड स्तर पर ऊपर चल रहा है। ऐसे में पूरी दुनिया के लिए यह समय केवल चेतावनी सुनने का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य आपातकालीन तैयारियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का है।
"यह अध्ययन एक उपयोगी प्रारंभिक चेतावनी है, लेकिन इसमें मौतों के जो अनुमान दिए गए हैं, उन्हें सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए क्योंकि ये मॉडल पर आधारित हैं। हालांकि, इसके निष्कर्ष तत्काल और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता को साफ तौर पर रेखांकित करते हैं।" — अभियांत तिवारी, जलवायु लचीलापन और स्वास्थ्य विशेषज्ञ








