सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की याचिका खारिज
देश की सर्वोच्च अदालत ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा देने वाले एक बड़े मामले में तृणमूल कांग्रेस (TMC) को करारा झटका दिया है। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की बेंच ने साफ कर दिया कि पार्टी के उन चार बैंक खातों को फिलहाल संचालित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिन पर राज्य पुलिस द्वारा रोक लगाई गई थी। अदालत का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य में राजनीतिक उठापटक और चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने के बिल्कुल पक्ष में नहीं है, जिसमें पहले इन खातों से जुड़े प्रतिबंधों को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि पार्टी और उसके फंड्स का असली हकदार कौन है, तब तक खातों पर लगी पाबंदियों को हटाया नहीं जा सकता।
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खातों के मालिकाना हक और चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी अदालत की नजर
बेंच ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि निर्वाचन आयोग द्वारा पार्टी का चुनाव चिह्न फ्रीज किए जाने के बाद से ही विवाद गहराया हुआ है। खातों में जमा करोड़ों रुपये की राशि और पार्टी की वैधानिकता पर कानूनी लड़ाई अभी थमी नहीं है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले के गुण-दोष पर अंतिम निर्णय निचली अदालत या हाईकोर्ट को ही करना चाहिए।
न्यायालय ने कलकत्ता हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस पूरे विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर जल्द से जल्द सुनवाई पूरी करे। अदालत का मानना है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में अनिश्चितता लंबे समय तक नहीं बनी रहनी चाहिए, ताकि राजनीतिक दलों और उससे जुड़े पक्षों को स्पष्टता मिल सके।
पार्टी की राजनीतिक गतिविधियां हो रही हैं प्रभावित: वरिष्ठ वकील एएम सिंहवी की दलील
सुनवाई के दौरान टीएमसी गुट की तरफ से पेश हुए देश के जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंहवी ने अदालत में अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि बैंक खातों के अचानक फ्रीज होने से पार्टी का रोजमर्रा का कामकाज और राजनीतिक गतिविधियां पूरी तरह से प्रभावित हो रही हैं। सिंहवी का कहना था कि आगामी उपचुनावों और सांगठनिक खर्चों को सुचारू रूप से चलाने के लिए पार्टी को हर महीने भारी-भरकम धनराशि की आवश्यकता होती है।
"पार्टी के बैंक खातों को फ्रीज करना असल में हमारी राजनीतिक गतिविधियों को अवरुद्ध करने की एक सुनियोजित कोशिश है। इससे हमारे दैनिक खर्च और चुनावी तैयारियां बुरी तरह ठप पड़ गई हैं, इसलिए इन खातों को तत्काल खोला जाना चाहिए।" — एएम सिंहवी, वरिष्ठ अधिवक्ता
राज्य सरकार और विपक्षी पक्षों का कड़ा विरोध, असली टीएमसी पर संशय
दूसरी ओर, राज्य सरकार और अन्य पक्षों के वकीलों ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि चूंकि पार्टी के भीतर ही विभाजन के बाद कई गुट खुद को असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा कर रहे हैं, इसलिए किसी एक पक्ष को खातों के संचालन की खुली छूट देना कानूनी पेचीदगियों को बढ़ा सकता है। सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि चुनाव आयोग के समक्ष विचाराधीन मामलों के अंतिम निष्कर्ष आने तक सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए और अदालत के निर्देशों का पालन करना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानूनी लड़ाई आने वाले दिनों में और अधिक जटिल हो सकती है, क्योंकि पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में सत्ता समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा पार्टी के नाम और प्रतीकों को लेकर लिए गए फैसलों के बाद से ही राजनीतिक दलों के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई है।
ईडी की जांच और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों की सुई
उल्लेखनीय है कि तृणमूल कांग्रेस के इन बैंक खातों पर यह कार्रवाई केवल राजनीतिक कारणों से नहीं, बल्कि वित्तीय गड़बड़ियों के चलते भी हुई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पार्टी के खातों से एक एविएशन कंपनी को भारी मात्रा में फंड ट्रांसफर किए जाने के मामलों को लेकर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। इसी केंद्रीय जांच के सिलसिले में पश्चिम बंगाल पुलिस और संबंधित वित्तीय एजेंसियों ने इन खातों पर रोक लगाई थी। हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने पहले ही कुछ हद तक राहत देते हुए रोजमर्रा के बेहद जरूरी खर्चों के लिए सीमित निकासी की अनुमति दी थी, लेकिन पूरी तरह से खातों को अनफ्रीज करने से लगातार इनकार किया जाता रहा है।
निष्कर्ष और आगे की राजनीतिक राह
सुप्रीम कोर्ट के इस ताज़ा फैसले के बाद ममता बनर्जी गुट के लिए अपनी चुनावी और राजनीतिक रणनीतियों को अमलीजामा पहनाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। एक तरफ जहां पार्टी को कानूनी मोर्चे पर लगातार झटके मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल इस स्थिति का पूरा राजनीतिक फायदा उठाने की फिराक में हैं। अब सबकी निगाहें कलकत्ता हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जहां इस बहुचर्चित वित्तीय और राजनीतिक विवाद की अगली सुनवाई होनी है।








