तमिलनाडु की राजनीति में पॉक्सो केस की गूंज
दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु की राजनीतिक फिजा इन दिनों काफी गर्म है। एक संवेदनशील और गंभीर पॉक्सो (POCSO) मामले को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। इस हाई-प्रोफाइल प्रकरण ने राज्य की कानून व्यवस्था और पिछली सरकारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक इस मामले की चर्चा जोरों पर है और हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर पर्दे के पीछे क्या कुछ छिपा हुआ था।
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब मौजूदा सियासी घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री विजय ने सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन को आड़े हाथों लिया। एक चुनावी जनसभा और प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने स्टालिन से दो टूक शब्दों में जवाब मांगा। इस तीखे हमले के बाद से राज्य की राजनीति में भूचाल सा आ गया है और दोनों प्रमुख दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
संबंधित खबरें
पिछली सरकार पर मामले को दबाने का गंभीर आरोप
मुख्यमंत्री विजय ने अपनी तीखी बयानबाजी में पिछली डीएमके सरकार पर सीधा निशाना साधा। उनका आरोप था कि जब यह मामला पहली बार सामने आया था और इसके संबंध में शिकायत दर्ज कराई गई थी, तब तत्कालीन सरकार ने इस पर पर्दा डालने का काम किया। उन्होंने कहा कि इतनी गंभीर घटना होने के बावजूद पुलिस और प्रशासन ने उचित कदम उठाने से गुरेज किया, जिससे आरोपियों के हौसले बुलंद होते चले गए।
विपक्षी दल की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जनता जानना चाहती है कि इस पूरे प्रकरण में किस तरह की साठगांठ या समझौता हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में राजनीतिक फायदे के लिए लीपापोती करना बेहद शर्मनाक है और राज्य की जनता अब इसका हिसाब मांग रही है।
"तमिलनाडु की जनता पूछ रही है कि आखिर इस मामले में क्या डील हुई थी? स्टालिन सर, इस पर कुछ तो बोलिए। क्या विपक्ष और सत्ता पक्ष की मिलीभगत से ऐसे मामलों को दबाया जाता रहेगा?" — मुख्यमंत्री, तमिलनाडु
अदालत के हस्तक्षेप से खुली परतें और नए खुलासे
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जब यह मामला अक्टूबर 2025 के आसपास सामने आया था, तब बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने एंटी-वाइस स्क्वाड से संपर्क साधा था। शुरुआती दौर में एफआईआर तो दर्ज कर ली गई थी, लेकिन कथित तौर पर पर्याप्त सबूतों के अभाव का हवाला देकर मामले को कमजोर कर दिया गया और क्लोजर रिपोर्ट लगाने की तैयारी कर ली गई थी।
हालांकि, न्यायपालिका की सतर्कता के कारण इस खेल पर रोक लग गई। हाल ही में एक विशेष पोक्सो कोर्ट ने पुलिस की उस रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें मामले को बंद करने की सिफारिश की गई थी। अदालत ने नए सिरे से गहन जांच के आदेश दिए, जिसके बाद पुलिस ने हरकत में आते हुए मुख्य आरोपी वीरमणि और उसके सहयोगियों को धर दबोचा।
पीड़ितों के बयान और गहराई से चल रही जांच
न्यायालय के आदेश पर जब मामले की नए सिरे से तफ्तीश शुरू हुई, तो एक के बाद एक कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आने लगे। पुलिस ने अनुसंधान के दौरान मुख्य पीड़िता की पहचान कर ली और मजिस्ट्रेट के समक्ष उसके बयान दर्ज करवाए गए। इसके साथ ही, इस मामले से जुड़ी अन्य महिलाओं की भी शिनाख्त की गई है, जिन्होंने घटना के समय नाबालिग होने की बात कही है।
जांच एजेंसियों के हाथ एक यूएसबी ड्राइव भी लगी थी जिसमें कथित रूप से इस जघन्य अपराध से जुड़े वीडियो क्लिप्स मौजूद थे। इन डिजिटल साक्ष्यों ने मामले को और मजबूत कर दिया है। पुलिस अब इस एंगल पर भी गहराई से छानबीन कर रही है कि क्या शुरुआती जांच को कमजोर करने या दबाने के लिए बिचौलियों के माध्यम से किसी तरह का पैसों का लेनदेन हुआ था या नहीं।
निष्कर्ष और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई
यह पूरा घटनाक्रम न केवल एक आपराधिक न्याय का मामला है, बल्कि यह राज्य की राजनीति में नैतिकता और जवाबदेही पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। जिस प्रकार से अदालती हस्तक्षेप के बाद इस मामले को नई दिशा मिली है, उससे पीड़ित पक्ष को न्याय की उम्मीद बंधती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में इस जांच की आंच कई अन्य लोगों तक भी पहुंच सकती है, क्योंकि पुलिस हर एक कड़ी को जोड़ने का प्रयास कर रही है।








