खोजबीन और आंकड़ों की दुनिया में कभी-कभी एक अंक या कोड अनजाने में कई व्यवस्थागत सच्चाइयों को उजागर कर देता है। गूगल ट्रेंड्स पर इन दिनों भारत में 'ss539' कोड अचानक शीर्ष पर तैर रहा है। सतही तौर पर देखने पर यह डिजिटल एल्गोरिदम का महज एक आंकड़ा लग सकता है, लेकिन 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेटिव टीम ने जब इस संख्या के पीछे छिपी जमीनी हकीकत को खंगाला, तो देश के दो सबसे बड़े राज्यों—हरियाणा और उत्तर प्रदेश—से चौंकाने वाली और चिंताजनक तस्वीरें सामने आईं। यह अंक महज एक संयोग नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था के भीतर गहरी पैठ जमा चुकी प्रशासनिक सुस्ती और आम आदमी के स्वास्थ्य से खिलवाड़ का एक जीवंत दस्तावेज है।
हरियाणा के चरखी दादरी में हुनर की राह पर सन्नाटा: आईटीआई में 628 में से 539 सीटें खाली
हमारी फील्ड इन्वेस्टिगेशन का पहला पड़ाव हरियाणा का चरखी दादरी जिला रहा। यहां के रावलधी नोडल आईटीआई (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान) के आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि देश के युवाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाने का सरकारी दावा जमीनी स्तर पर कितना दम तोड़ रहा है। संस्थान के हालिया दस्तावेजों के मुताबिक, कुल 628 निर्धारित सीटों में से हैरान करने वाली बात यह है कि 539 सीटें आज भी खाली पड़ी हैं।
"हम हर साल नए ट्रेड शुरू करने और बड़े-बड़े विज्ञापन देने की बात करते हैं, लेकिन जब युवा इन संस्थानों का रुख ही नहीं करते, तो करोड़ों के बुनियादी ढांचे का क्या फायदा?" - स्थानीय शिक्षा मामलों के एक वरिष्ठ विश्लेषक ने नाम न छापने की शर्त पर द फ्रीलान्स को बताया।
ग्राउंड जीरो पर छात्रों और अभिभावकों से बातचीत में पता चला कि कोर्स पूरा होने के बाद रोजगार की अनिश्चितता और अप्रचलित पाठ्यक्रम इसके मुख्य कारण हैं। जब एक तरफ देश 'कौशल भारत' (Skilled India) के नारे लगा रहा है, वहीं प्रमुख नोडल संस्थानों में 85 फीसदी से अधिक सीटों का खाली रहना इस बात का प्रमाण है कि नीति-निर्माण और धरातलीय क्रियान्वयन के बीच एक चौड़ी खाई मौजूद है।
संबंधित खबरें
उत्तर प्रदेश में थाली तक पहुंचता जहर: हल्दी के 1172 में से 539 नमूने फेल
इस जांच के दूसरे और सबसे खतरनाक हिस्से ने हमें उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा तंत्र के भीतर झांकने पर मजबूर किया। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की ताजा रिपोर्ट ने हर भारतीय की रसोई में इस्तेमाल होने वाले सबसे पवित्र मसाले 'हल्दी' की शुद्धता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य के विभिन्न जिलों से जुटाए गए कुल 1172 नमूनों में से चौंकाने वाले 539 नमूने प्रयोगशाला जांच में फेल पाए गए हैं।
हमारी टीम ने जब इस मामले पर लखनऊ के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों से संपर्क किया, तो पता चला कि इन नमूनों में लेड क्रोमाइट (सीसा) और मेटानील येलो जैसे खतरनाक केमिकल रंगों की मिलावट पाई जा रही है। ये दोनों ही तत्व कैंसरकारक और मानव शरीर के तंत्रिका तंत्र के लिए बेहद घातक हैं। जिस हल्दी को हम आयुर्वेद में औषधि और हर शुभ कार्य का प्रतीक मानते हैं, वही आज खुलेआम जहर बनकर लोगों की थाली तक पहुंच रही है। 539 का यह आंकड़ा केवल कुछ दुकानों का चालान नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि त्योहारी सीजन और आम दिनों में भी हमारी खाद्य सुरक्षा एजेंसियां मिलावटखोरों पर नकेल कसने में कितनी लाचार साबित हो रही हैं।
नीति निर्माताओं के लिए चेतावनी की घंटी
जब हम चरखी दादरी की सूखी पड़ी आईटीआई कक्षाओं से लेकर उत्तर प्रदेश की लैब्स में फेल हुए हल्दी के 539 नमूनों को एक साथ रखते हैं, तो एक भयावह तस्वीर उभरती है। एक तरफ हमारे युवाओं का भविष्य कौशल के अभाव में अंधकारमय हो रहा है, तो दूसरी तरफ जो युवा या नागरिक किसी तरह अपने पैरों पर खड़े हैं, उन्हें मिलावटी खाद्य पदार्थों के जरिए धीमी मौत दी जा रही है। डिजिटल ट्रेंड्स में भले ही 'ss539' कुछ पलों की सनसनी हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह अंक भारत के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों—शिक्षा और स्वास्थ्य—की खस्ताहाली का प्रतीक बन चुका है। यदि समय रहते इन कमियों को दुरुस्त नहीं किया गया, तो यह आंकड़े सिर्फ फाइलों में सिमट कर रह जाएंगे और देश का आम नागरिक इसकी भारी कीमत चुकाता रहेगा।




