डिजिटल स्क्रीन पर मनोरंजन का बदलता स्वरूप और सरकार की बढ़ती नजर
आज के समय में तकनीक ने हमारे घरों के ड्राइंग रूम से लेकर हाथों में मौजूद स्मार्टफोन तक का सफर तय कर लिया है। लोग अब पारंपरिक केबल कनेक्शन या भारी-भरकम डिश टीवी के बजाय सीधे इंटरनेट के जरिए अपने पसंदीदा प्रोग्राम देखना पसंद करते हैं। इस बदलते दौर में इंटरनेट आधारित वीडियो स्ट्रीमिंग और मुफ्त चैनल दिखाने वाली सेवाएं बेहद लोकप्रिय हो चुकी हैं। लेकिन अब इन डिजिटल माध्यमों पर देश के नियामक प्राधिकरण की पैनी नजर पड़ चुकी है, जिससे आने वाले दिनों में ऑनलाइन मनोरंजन की दुनिया में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पहले ही इस बात पर विचार शुरू कर दिया था कि क्या इंटरनेट के माध्यम से मुफ्त और शेड्यूल्ड टीवी जैसी सामग्री प्रसारित करने वाली सेवाओं को भी किसी कानूनी दायरे या लाइसेंसिंग प्रक्रिया के तहत लाया जाना चाहिए। इस पूरे मामले पर देश के प्रमुख नियामक ने अपनी राय स्पष्ट करते हुए कहा है कि इंटरनेट पर प्रसारित होने वाली ऐसी सामग्री को मौजूदा विनियामक व्यवस्था से पूरी तरह बाहर नहीं रखा जा सकता है। डिजिटल माध्यमों का यह बढ़ता दायरा आने वाले समय में दर्शकों की जेब और मनोरंजन के तरीकों को किस प्रकार प्रभावित करेगा, इस पर विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है।
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पारंपरिक ब्रॉडकास्टर्स बनाम इंटरनेट प्लेटफॉर्म्स की महाजंग
इस पूरे विवाद के केंद्र में पारंपरिक केबल और डीटीएच ऑपरेटरों तथा नई पीढ़ी की टेक कंपनियों के बीच का संघर्ष है। पारंपरिक प्रसारणकर्ताओं का यह कड़ा तर्क रहा है कि उन पर सरकार और नियामक के बहुत कड़े नियम लागू होते हैं। उन्हें अपने हर चैनल के प्रसारण के लिए भारी फीस चुकानी पड़ती है, उपभोक्ता संरक्षण के कड़े मानदंडों का पालन करना होता है और कंटेंट कोड का भी सख्ती से ध्यान रखना पड़ता है। इसके विपरीत, इंटरनेट आधारित सेवाएं इन तमाम जटिल नियमों से पूरी तरह मुक्त होकर बिना किसी रोक-टोक के अपनी सेवाएं दे रही थीं।
ब्रॉडकास्टर्स का यह भी मानना है कि इस तरह का अंतर बाजार में अनुचित प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देता है। जब एक ही तरह का वीडियो कंटेंट अलग-अलग माध्यमों से उपभोक्ताओं तक पहुंच रहा है, तो दोनों के लिए नियमों का पैमाना भी एक समान होना चाहिए। दूसरी ओर, दर्शक भी अब पारंपरिक सब्सक्रिप्शन मॉडल से दूरी बनाते हुए इंटरनेट पर आसानी से मिलने वाली डिजिटल सामग्री की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे पुराने कारोबारियों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा है।
ओटीटी और टेक कंपनियों का कड़ा विरोध और उनके अपने तर्क
जैसे ही नियामक द्वारा इन सेवाओं को दायरे में लाने की सुगबुगाहट शुरू हुई, वैसे ही देश-विदेश की बड़ी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और टेक कंपनियों ने इसका तीव्र विरोध करना शुरू कर दिया। इन कंपनियों का स्पष्ट कहना है कि वे किसी भी रूप में पारंपरिक ब्रॉडकास्टर्स नहीं हैं और न ही उनके पास कोई अपना टेलीकॉम नेटवर्क या स्पेक्ट्रम है। वे केवल इंटरनेट और टेलीकॉम ऑपरेटरों द्वारा बिछाए गए नेटवर्क का उपयोग करके अपने सर्वर से डेटा उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं।
तकनीकी कंपनियों का यह भी हवाला है कि हाल ही में पारित टेलीकम्युनिकेशन एक्ट के दायरे से ओटीटी सेवाओं को पहले ही अलग रखा जा चुका है। उनका तर्क है कि इंटरनेट पर केवल चैनल जैसे फॉर्मेट या ग्रिड दिखा देने मात्र से कोई सेवा पारंपरिक टेलीविजन चैनल नहीं बन जाती। इसलिए इन पर केबल नेटवर्क अधिनियम के कड़े प्रावधान थोपने के बजाय सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी नियमों के तहत ही इन्हें नियंत्रित किया जाना चाहिए ताकि डिजिटल नवाचार और तकनीकी विकास में कोई बाधा उत्पन्न न हो।
तेजी से बढ़ते कनेक्टेड टीवी बाजार की भविष्य की तस्वीर
आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में स्मार्ट टीवी और कनेक्टेड डिवाइस का बाजार बहुत तेजी से पैर पसार रहा है। बाजार के अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2028 तक भारतीय परिवारों में कनेक्टेड टीवी की संख्या मौजूदा स्तर से दोगुनी होकर करीब चार करोड़ तक पहुंच सकती है। इस विशाल बाजार में हर दिन करोड़ों लोग विज्ञापन समर्थित मुफ्त स्ट्रीमिंग और इंटरनेट टीवी सेवाओं का आनंद ले रहे हैं।
इस भारी-भरकम आर्थिक संभावनाओं के कारण ही हर पक्ष इस उभरते सेक्टर पर अपनी मजबूत पकड़ बनाना चाहता है। जहां एक ओर सरकार और पारंपरिक ब्रॉडकास्टर्स एक निष्पक्ष खेल का मैदान तैयार करने की वकालत कर रहे हैं, वहीं तकनीकी कंपनियां अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं।
आम जनता की जेब पर क्या होगा इस संभावित बदलाव का असर
यदि नियामक आने वाले दिनों में इन इंटरनेट आधारित मुफ्त टीवी सेवाओं के लिए कोई कड़े नियम या लाइसेंस शुल्क अनिवार्य करता है, तो इसका सीधा असर आम नागरिकों की जेब पर पड़ सकता है। अब तक जो सेवाएं उपभोक्ताओं को पूरी तरह मुफ्त या विज्ञापनों के सहारे मिल रही थीं, वे या तो महंगी हो सकती हैं या फिर उनके देखने के अनुभव में कुछ बदलाव आ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में पारदर्शिता और उपभोक्ता सुरक्षा बेहद जरूरी है, लेकिन साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि नियम इतने सख्त न हो जाएं जिससे देश में डिजिटल क्रांति और मनोरंजन की सुगमता प्रभावित हो। आने वाला वक्त ही तय करेगा कि सरकार संतुलन बनाने के लिए कौन सा मध्यम मार्ग चुनती है।
"इंटरनेट के जरिए प्रसारित होने वाली वीडियो और टीवी जैसी सेवाओं को पारंपरिक प्रसारण नियमों से पूरी तरह बाहर नहीं रखा जा सकता है। बाजार में सभी हितधारकों के लिए एक समान और पारदर्शी व्यवस्था होना जरूरी है।" — दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के सूत्र







