वाशिंगटन डीसी के राजनीतिक गलियारों से इस वक्त एक बड़ी और चौंकाने वाली कूटनीतिक उथल-पुथल की खबर सामने आ रही है। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड पड़ताल और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को अमेरिकी हथियार बेचने से जुड़े दावों पर यू-टर्न ले लिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल अमेरिकी प्रशासन को असमंजस में डाल दिया है, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी नए समीकरणों को जन्म दे दिया है। बीजिंग के साथ होने वाली आगामी शिखर बैठकों से ठीक पहले इस तरह के विरोधाभासी बयां आना कूटनीतिक गलियारों में गहरी चर्चा का विषय बन गया है।
अपने ही राजदूत के बयान से पलटे ट्रंप
मामले की गहराई में जाने पर पता चलता है कि यह विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिका के एक वरिष्ठ राजदूत ने अनौपचारिक या कूटनीतिक मंचों पर चीन को अमेरिकी हथियारों की संभावित बिक्री को लेकर कुछ संकेत दिए थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और हमारे फील्ड इनपुट्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन के भीतर ही इस मुद्दे पर एक राय नहीं दिख रही है। जब यह बयान तूल पकड़ने लगा और इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं, तो राष्ट्रपति ट्रंप ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए इस दावे का खंडन कर दिया। ट्रंप के इस रुख से यह साफ हो गया है कि पेंटागन और व्हाइट हाउस के बीच एशिया-प्रशांत नीति को लेकर पर्दे के पीछे काफी कुछ चल रहा है।
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जिनपिंग-ट्रंप मुलाकात से पहले चीन की चार 'रेड लाइन'
एक तरफ जहां हथियारों की बिक्री के बयान पर घमासान मचा है, वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की संभावित आमने-सामने की बैठक की जमीन तैयार हो रही है। लेकिन इस कूटनीतिक संवाद से पहले ही बीजिंग ने वाशिंगटन को बेहद कड़े शब्दों में अपनी प्राथमिकताएं समझा दी हैं। चीन ने अमेरिका के सामने चार स्पष्ट 'रेड लाइन' (Red Lines) खींच दी हैं, जिनमें ताइवान का मुद्दा सबसे ऊपर है। चीन ने साफ कर दिया है कि ताइवान की संप्रभुता और दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील विषयों पर ड्रैगन किसी भी तरह के अमेरिकी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा।
वांग यी और मार्को रुबियो की फोन डिप्लोमेसी
शिखर सम्मेलन की इस उथल-पुथल के बीच कूटनीतिक चैनलों को सक्रिय रखा गया है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच तनाव को कम करने के लिए हाल ही में चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी और अमेरिकी अधिकारियों के बीच फोन पर लंबी चर्चा हुई है। 'फोन डिप्लोमेसी' के इस दौर में दोनों महाशक्तियों ने व्यापार, तकनीकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे तमाम मुद्दों पर अपने-अपने पक्ष रखे हैं। जानकारों का मानना है कि दोनों देश भले ही सार्वजनिक रूप से सख्त तेवर दिखा रहे हों, लेकिन अंदरखाने द्विपक्षीय वार्ताओं को पटरी पर लाने की कोशिशें जारी हैं।
ईरान-चीन सीक्रेट बार्टर सिस्टम और वैश्विक समीकरण
इस पूरी कूटनीतिक बिसात पर केवल अमेरिका और चीन ही नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया का एक बड़ा खेल भी चल रहा है। खुफिया रिपोर्टों से खुलासा हुआ है कि ईरान और चीन के बीच एक सीक्रेट 'बार्टर सिस्टम' (Barter System) काम कर रहा है। इसके तहत ईरान, चीन को कच्चे तेल की आपूर्ति कर रहा है और बदले में बीजिंग से एयर डिफेंस सिस्टम व अन्य सैन्य हथियार हासिल कर रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों को मात देने के लिए इस गुप्त तेल-बदले-हथियार सौदे ने वाशिंगटन की नींद उड़ा दी है। यह नया गठजोड़ अमेरिकी रणनीतिकारों के लिए एक बड़ी सिरदर्दी बन गया है।
मीडिया बॉयकॉट और ट्रंप का आक्रामक रुख
इन तमाम भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पारंपरिक मीडिया पर जमकर भड़ास निकाली है। अमेरिकी मीडिया के एक बड़े हिस्से द्वारा उनकी नीतियों की लगातार हो रही आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने कहा कि मीडिया कभी उनकी पॉजिटिव कवरेज नहीं करता और हमेशा उन्हें नेगेटिव रूप में ही प्रोजेक्ट करता है। मीडिया बॉयकॉट के इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच ट्रंप की नीतियों की पारदर्शिता पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। बहरहाल, आने वाले दिनों में जिनपिंग और ट्रंप की बैठक तय करेगी कि वैश्विक महाशक्तियों का यह कूटनीतिक पैंतरा किस दिशा में आगे बढ़ता है।









