अमेरिका की डिफेंस कंपनी पावरस और पाकिस्तान के बीच हुआ बड़ा सैन्य समझौता
अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में एक नया और बेहद संवेदनशील घटनाक्रम सामने आया है, जो सीधे तौर पर दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका की फ्लोरिडा स्थित डिफेंस स्टार्ट-अप कंपनी 'पावरस' ने पाकिस्तानी सेना के साथ मानवरहित हवाई प्रणालियों और आधुनिक ड्रोन तकनीक के आदान-प्रदान के लिए एक अहम समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। महज एक साल पुरानी इस कंपनी का पाकिस्तान के साथ हाथ मिलाना दुनिया भर के रक्षा विश्लेषकों के लिए चौंकाने वाला है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस रक्षा सौदे की रूपरेखा तय करने के लिए उच्च स्तर की बैठकें आयोजित की गई थीं। इस समझौते के तहत पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर उन्नत किस्म के आत्मघाती और निगरानी ड्रोन तैयार करने की योजना पर काम शुरू हो चुका है। अमेरिकी रक्षा फर्म का इस प्रकार पाकिस्तान के साथ रक्षा क्षेत्र में जुड़ना कई रणनीतिक और कूटनीतिक सवाल खड़े करता है, खासकर तब जब वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रक्षा सहयोग लगातार प्रगाढ़ हो रहा है।
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डोनाल्ड ट्रंप के परिवार के जुड़ाव से राजनीतिक गलियारों में मची हलचल
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू इसका राजनीतिक कनेक्शन है। डिफेंस स्टार्ट-अप कंपनी पावरस के संबंध सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परिवार से जुड़े बताए जा रहे हैं। कुछ समय पहले पावरस का विलय ऑरियस ग्रीनवे होल्डिंग्स नामक कंपनी में हुआ था, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप की अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 9.9 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ट्रंप परिवार की इस प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष व्यावसायिक भागीदारी के कारण इस रक्षा सौदे का वजन और अधिक बढ़ जाता है।
राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में चर्चा है कि अमेरिकी प्रशासन के उच्च स्तर पर प्रभाव रखने वाले परिवारों से जुड़ी कंपनियों का इस तरह शत्रु देशों के बीच अलग-अलग नीतियां अपनाना चिंता का विषय है। पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर और इस अमेरिकी कंपनी के शीर्ष अधिकारियों के बीच हुई गुप्त बैठकों के बाद यह डील फाइनल हुई है, जिससे यह साफ होता है कि इसके पीछे बड़े कूटनीतिक हित काम कर रहे हैं।
पाकिस्तान के इन तीन शहरों में स्थापित होंगी ड्रोन निर्माण इकाइयां
इस रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान की जमीन पर ही आधुनिक हथियारों का निर्माण करने की बड़ी योजना बनाई गई है। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना और अमेरिकी कंपनी पावरस के संयुक्त उपक्रम के लिए तीन प्रमुख सैन्य साइटों का चयन किया गया है। इनमें पंजाब प्रांत का रावलपिंडी, और खैबर पख्तूनख्वा के हरीपुर और तक्षशिला क्षेत्र शामिल हैं। इन स्थानों पर अत्याधुनिक ड्रोन प्रोडक्शन यूनिट्स लगाई जाएंगी।
सूत्रों का कहना है कि इन यूनिट्स के निर्माण और संचालन में पाकिस्तानी सेना की अपनी औद्योगिक इकाइयां भी पूरी तरह शामिल रहेंगी। इस प्रॉजेक्ट को अंतिम रूप देने के लिए पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों का एक उच्चस्तरीय दल अमेरिका का दौरा करने की तैयारी में है। पाकिस्तान की कोशिश है कि वह चीन और तुर्किये के साथ-साथ अब अमेरिकी तकनीक का इस्तेमाल करके अपने सैन्य शस्त्रागार को पूरी तरह आधुनिक बना सके।
भारत के साथ दोतरफा खेल: एक तरफ लाइसेंस, दूसरी तरफ पाकिस्तान को तकनीक
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विरोधाभासी और भारत के दृष्टिकोण से खतरनाक पहलू यह है कि यही कंपनी भारत के रक्षा बाजार में भी सक्रिय रूप से काम कर रही है। कुछ समय पहले ही पावरस की सहायक कंपनी टैंडेम डिफेंस ने भारत की प्रतिष्ठित फर्म 'पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज' को गार्जियन-1 काउंटर ड्रोन इंटरसेप्टर भारत में ही निर्मित करने का लाइसेंस सौंपा था। एक तरफ अमेरिकी कंपनी भारत को काउंटर-ड्रोन तकनीक बनाने की अनुमति देती है, और दूसरी तरफ पाकिस्तान को आक्रामक ड्रोन सिस्टम की तकनीक ट्रांसफर करती है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही अमेरिकी कंपनी का भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के साथ इस तरह का दोहरा रक्षा सहयोग रखना असाधारण और भारत की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। मई महीने में दोनों देशों के बीच हुए संघर्षों में ड्रोन्स ने जिस प्रकार निर्णायक भूमिका निभाई थी, उसके बाद पाकिस्तान की ड्रोन क्षमता का इस तरह बढ़ना भारतीय सुरक्षा बलों के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकता है।
डिफेंस एक्सपर्ट्स की चेतावनी: भारत की आंतरिक सुरक्षा पर मंडरा सकता है बड़ा खतरा
पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास में लंबे समय तक सेवाएं दे चुके जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ अविनाश मोहनानी का इस पूरे मामले पर कहना है कि पाकिस्तान की धरती पर अमेरिकी तकनीक से बनने वाले ये ड्रोन भविष्य में भारत की सीमाओं के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं। अतीत का अनुभव बताता है कि अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दिए जाने वाले कई सैन्य उपकरण और हथियार अक्सर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के माध्यम से आतंकवादियों तक पहुंच जाते हैं।
"पाकिस्तान को मिलने वाले अमेरिकी हथियार और तकनीक अक्सर आतंकवादियों के हाथों में सुरक्षित पहुंच जाते हैं। कश्मीर घाटी में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां अमेरिकी मेड हथियार आतंकियों के पास बरामद हुए। ऐसे में यह नई ड्रोन तकनीक हमारी अंदरूनी और बाहरी सुरक्षा दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।" — अविनाश मोहनानी, रक्षा विशेषज्ञ
विशेषज्ञों का यह भी आकलन है कि पावरस कंपनी केवल पाकिस्तान की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए वहां यूनिट नहीं लगा रही है, बल्कि इसके जरिए अमेरिका के पारंपरिक नियंत्रण से बाहर रहकर एशिया और अफ्रीका के उन देशों को भी ड्रोन बेचे जा सकते हैं जिन्हें वाशिंगटन सीधे हथियार बेचने से परहेज करता है।







