वाशिंगटन/नई दिल्ली: 'द फ्रीलान्स' की विशेष ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन डेस्क। पश्चिम एशिया के आसमान पर युद्ध के काले बादल एक बार फिर मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तेवर और उनकी रणनीतिक चालें इस बात गवाही दे रही हैं कि ईरान के साथ वाशिंगटन का टकराव अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से लेकर पेंटागन की गुप्त बैठकों तक, हर तरफ एक ही चर्चा है—क्या अमेरिका ईरान पर अब तक का सबसे बड़ा सैन्य हमला करने जा रहा है?
ट्रंप का कड़ा अल्टीमेटम और सीजफायर प्रस्ताव खारिज
गत सप्ताह तेहरान की ओर से एक बड़ा कूटनीतिक दांव चलते हुए सात दिनों के युद्धविराम (सीजफायर) का प्रस्ताव अमेरिका के सामने रखा गया था। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, ईरान इस प्रस्ताव के जरिए बढ़ते आर्थिक प्रतिबंधों और सैन्य दबाव से थोड़ी राहत चाहता था। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। इसके विपरीत, ट्रंप ने ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि वह 'एक रास्ता चुन ले'। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अल्टीमेटम साफ संकेत है कि अमेरिका अब आधे-अधूरे समझौतों के मूड में नहीं है, बल्कि ईरान की परमाणु और क्षेत्रीय नीतियों पर स्थायी लगाम कसना चाहता है।
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मिडटर्म चुनाव और संभावित बमबारी के सामरिक मायने
अमेरिकी घरेलू राजनीति और आगामी मिडटर्म चुनावों के परिप्रेक्ष्य में ट्रंप के इस आक्रामक रुख को बहुत बारीकी से देखा जा रहा है। रक्षा जानकारों का कहना है कि चुनाव से ठीक पहले अपनी मजबूत 'कठोर छवि' को बनाए रखने के लिए ट्रंप प्रशासन ईरान के ठिकानों पर हवाई हमलों का एक बड़ा विकल्प खुला रख रहा है। हालांकि, पेंटागन के भीतर भी इस बात पर मंथन चल रहा है कि क्या यह हमला सीमित होगा या इसके दायरे में ईरान के रणनीतिक सैन्य ठिकाने और परमाणु संयंत्र भी आएंगे। 'द फ्रीलान्स' के खुफिया सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी सेना क्षेत्र में अपनी संपत्तियों और विमान वाहक पोतों को हाई अलर्ट पर रख चुकी है।
'वर्ल्ड वॉर-2' जैसी तैयारी और क्षेत्रीय कूटनीति पर असर
इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब ईरानी रणनीतिकारों और क्षेत्रीय सहयोगियों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान की ओर से संभावित जवाबी कार्रवाई की धमकियों के बाद ट्रंप ने कुछ समय के लिए अपने इरादे बदले, लेकिन तेहरान के तेवर नरम पड़ने का नाम नहीं ले रहे हैं। ट्रंप ने अपनी हालिया टिप्पणियों में 'वर्ल्ड वॉर-2 जैसी तैयारी' का जिक्र करते हुए यह जताने की कोशिश की है कि अमेरिका किसी भी बड़े संघर्ष से पीछे हटने वाला नहीं है। इस बीच, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश इस संभावित टकराव से खासे चिंतित हैं और राहत की सांस तभी ले पा रहे हैं जब अमेरिकी बयानों में थोड़ा ठहराव नजर आता है। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था इस वक्त किसी भी बड़े क्षेत्रीय युद्ध को झेलने की स्थिति में नहीं है।
क्या सचमुच शुरू होने जा रहा है विनाशकारी युद्ध?
सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ कूटनीतिक दबाव बनाने की चाल है या सचमुच एक महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है? इतिहास गवाह है कि पश्चिम एशिया में जब भी अमेरिका और ईरान आमने-सामने आए हैं, वैश्विक बाजारों से लेकर कच्चे तेल की कीमतों तक भूकम्प आ गया है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी देशों में रह रहे करोड़ों प्रवासियों की सुरक्षा दांव पर है। 'द फ्रीलान्स' की पड़ताल बताती है कि आने वाले 48 से 72 घंटे दुनिया के इस हिस्से के लिए बेहद संवेदनशील होने वाले हैं, जहां एक गलत फैसला पूरी दुनिया को युद्ध की आग में झोंक सकता है।








