नई दिल्ली और अंतरराष्ट्रीय डेस्क से द फ्रीलान्स की विशेष ग्राउंड रिपोर्ट। अमेरिका के राजनीतिक गलियारों से लेकर मास्को तक कूटनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की पर कड़ा हमला बोला है। ट्रंप के इन तेवरों के बाद अब रूस का रुख भी नरम पड़ता दिख रहा है। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय यानी क्रेमलिन की तरफ से इस मामले में बड़ा बयान सामने आया है, जिससे दुनिया भर के देशों की नजरें इस पर टिक गई हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष को चार साल पूरे होने जा रहे हैं। इन चार सालों में वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर गहरा असर पड़ा है। इस बीच खबर यह भी है कि ट्रंप के दूत ने आधी रात को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की है। इस गुप्त और अहम बैठक के बाद पहली त्रिपक्षीय बातचीत की तैयारी भी शुरू हो चुकी है। जानकारों का मानना है कि यह बैठक आने वाले दिनों में युद्ध रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
फ्रांस का 'सुपर राफेल' और 6th जेन फाइटर जेट का ऐलान
एक तरफ जहां अमेरिका और रूस के बीच कूटनीतिक खेल चल रहा है, वहीं यूरोप में फ्रांस ने भी बड़ा दांव चल दिया है। राफेल विमान बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी ने अपने अगले बड़े प्रोजेक्ट्स का ऐलान कर दिया है। फ्रांस ने अब छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान और 'सुपर राफेल' प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। यूरोपीय देशों की यह तैयारी बताती है कि भविष्य के युद्धों के लिए रक्षा तकनीक कितनी तेजी से बदल रही है। फ्रांस का यह कदम वैश्विक रक्षा बाजार में उसकी स्थिति को और मजबूत करेगा।
इन तमाम वैश्विक बदलावों के बीच भारत के लिए भी कूटनीतिक मोर्चे पर बड़ी खबरें आ रही हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भारत के साथ 'ब्रह्मोस मॉडल' पर काम करने का नया ऑफर दिया है। सवाल यह है कि क्या नई दिल्ली पुतिन के इस प्रस्ताव को स्वीकार करेगी। भारत हमेशा से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के पक्ष में रहा है और इस नए प्रस्ताव पर देश के रक्षा मंत्रालय की पैनी नजर बनी हुई है।
ट्रंप के बयानों पर क्रेमलिन की मुहर और नई शांति की उम्मीद
डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि जेलेंस्की इस युद्ध को लंबा खींच रहे हैं, वैश्विक राजनीति में एक बड़ा मोड़ है। रूस ने ट्रंप के इस बयान का समर्थन किया है और क्रेमलिन के प्रवक्ता ने इसे जमीनी हकीकत के करीब बताया है। रूस का कहना है कि पश्चिमी देशों की मदद के कारण ही यह संघर्ष अब तक खिंचता चला आया है। क्रेमलिन के इस बयान के बाद अब कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिका और रूस मिलकर इस युद्ध को खत्म करने का कोई फॉर्मूला तैयार कर सकते हैं।
जमीन पर स्थिति अभी भी बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है, लेकिन कूटनीतिक बैठकों का दौर तेज होने से आम लोगों में शांति की उम्मीद जगी है। ट्रंप के दूत और रूसी अधिकारियों के बीच हुई बातचीत के नतीजे जल्द ही सामने आ सकते हैं। भारत भी इन तमाम अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों पर बहुत बारीकी से नजर रखे हुए है क्योंकि इसका असर वैश्विक तेल बाजार और रक्षा सप्लाई चेन पर पड़ना तय है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल
द फ्रीलान्स की इस व्यापक पड़ताल से साफ है कि आने वाले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बहुत अहम होने वाले हैं। एक तरफ अमेरिका और रूस के बीच पर्दे के पीछे बातचीत शुरू हो चुकी है, तो दूसरी तरफ फ्रांस और भारत जैसे देश अपनी रक्षा रणनीतियों को नए सिरे से धार दे रहे हैं। युद्ध के चार साल पूरे होने के मुहाने पर खड़े इस दौर में हर एक बयान और हर एक बैठक का बहुत बड़ा मतलब है। हमारी टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए रखेगी और हर नया अपडेट सबसे पहले आप तक पहुंचाएगी।






