नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गई है। साल 1945 में इस संगठन के गठन के बाद से दुनिया बहुत बदल चुकी है। आज भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की संरचना आज भी पुरानी व्यवस्था पर टिकी हुई है। भारत और दुनिया के कई देश लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह संगठन आज की दुनिया की सच्चाई को सही मायनों में दिखाता है या नहीं।
इस बीच, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन का एक बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने साफ कहा है कि चीन हरसंभव कोशिश करेगा कि भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट न मिले। चीन की यह रणनीति एशिया में अपने प्रभुत्व को बनाए रखने और भारत को रोकने के लिए है। बीजिंग लगातार उन देशों के साथ खड़ा रहता है जो भारत की दावेदारी का विरोध करते हैं। इसके अलावा, सुरक्षा परिषद के मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो पावर है। इस वीटो पावर की वजह से भी किसी नए देश को स्थायी सदस्यता मिलना बेहद कठिन हो गया है।
यूरोप के समर्थन से भारत की स्थिति मजबूत
एक तरफ जहां चीन भारत के रास्ते में रोड़े अटका रहा है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के कई देश भारत के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं। हाल ही में यूरोप के कई प्रमुख देशों ने भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। इन देशों का मानना है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत जैसी महाशक्ति को यूएनएससी में शामिल करना बहुत जरूरी है। ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश पहले से ही भारत की दावेदारी का समर्थन करते आए हैं। अब अन्य यूरोपीय देशों के जुड़ने से वैश्विक मंच पर भारत की राजनीतिक स्थिति और अधिक मजबूत हुई है।
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कश्मीर मुद्दे पर एक बड़ा बयान देकर पाकिस्तान को तगड़ा झटका दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि संयुक्त राष्ट्र के पास कश्मीर समस्या को अपने दम पर सुलझाने की कोई विशेष क्षमता नहीं है। इस बयान को कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान के लिए एक करारा झटका माना जा रहा है। हालांकि इस टिप्पणी ने भारत के भीतर भी कुछ राजनीतिक हलकों में बहस को जन्म दिया है, क्योंकि भारत हमेशा से मानता रहा है कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और इसमें किसी तीसरे देश या संगठन के दखल की कोई जरूरत नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया और नियमों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था
सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी अब यह कह रहे हैं कि दुनिया में केवल ताकतवर देशों की मनमानी नहीं चलनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया ने साफ किया है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में नियमों का शासन होना चाहिए। वर्तमान समय में यूएनएससी के कामकाज के तरीके पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कई देश मानते हैं कि सुरक्षा परिषद अब दुनिया की समस्याओं को सुलझाने में नाकाम साबित हो रही है। जब तक इसमें सुधार नहीं होगा, तब तक दुनिया भर में शांति और सुरक्षा बनाए रखना बहुत मुश्किल होगा।
भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव है। इसके साथ ही भारतीय सेना संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में शामिल है। भारत का यह योगदान दुनिया भर में सराहा जाता है। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद में भारत को वह जगह नहीं मिली है जिसका वह हकदार है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में भारत को अपनी कूटनीतिक चालों को और तेज करना होगा ताकि चीन के विरोध को कमजोर किया जा सके।
सुधार की उम्मीद और आगे की चुनौतियां
संयुक्त राष्ट्र में सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी गति से चलती है। इसके नियमों में बदलाव के लिए दो-तिहाई बहुमत और सभी पांच स्थायी सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। यही वजह है कि पिछले कई दशकों से चली आ रही बैठकों और बहसों के बावजूद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका है। भारत लगातार जी-4 देशों यानी जापान, जर्मनी और ब्राजील के साथ मिलकर इस दिशा में दबाव बना रहा है। इन चारों देशों का यह समूह संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार चाहता है ताकि विकासशील देशों को भी उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत और रणनीतिक महत्व को अब नजरअंदाज करना नामुमकिन होता जा रहा है। भले ही चीन और कुछ अन्य देश अपनी पुरानी चालों से भारत को रोकने की कोशिश करें, लेकिन दुनिया के बदलते समीकरण अब भारत के पक्ष में झुकते दिखाई दे रहे हैं। भारत के लिए यह वक्त अपनी कूटनीतिक पकड़ को और मजबूत करने का है ताकि वह अपने हक की जगह पा सके।






