नई दिल्ली/संयुक्त राष्ट्र: वैश्विक मंचों पर एक बार फिर से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के ढांचे को बदलने की मांगें जोर पकड़ रही हैं। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड ग्राउंडिंग और उपलब्ध कूटनीतिक दस्तावेजों के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि मौजूदा समय में UNSC की प्रासंगिकता और उसकी निर्णय लेने की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। भारत, जो लंबे समय से ग्लोबल साउथ की आवाज बनता रहा है, उसकी स्थायी उम्मीदवारी पर अब वैश्विक ध्रुवीकरण साफ दिखाई दे रहा है।
IBSA का दो टूक अल्टीमेटम और वीटो पावर की विडंबना
हाल ही में IBSA (भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका) समूह ने UNSC में सुधारों को लेकर एक कड़ा अल्टीमेटम जारी किया है। समूह का स्पष्ट कहना है कि यदि सुरक्षा परिषद को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप प्रासंगिक बनाए रखना है, तो इसमें विकासशील देशों विशेषकर भारत को तत्काल स्थायी प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, UNSC की 'वीटो पावर' (Veto Power) को लेकर Drishti IAS और अन्य अकादमिक मंचों पर चल रही परिचर्चाएं इस बात की गवाही देती हैं कि कैसे पांच स्थायी सदस्यों के हाथ में केंद्रित यह शक्ति वैश्विक शांति के आड़े आ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि वीटो का यह प्रावधान अब कूटनीतिक गतिरोध का सबसे बड़ा कारण बन चुका है।
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रूस की खुली पैरवी और मॉरीशस का समर्थन
इस कूटनीतिक रस्साकशी के बीच भारत के लिए एक बड़ी राहत और कूटनीतिक जीत रूस का खुला समर्थन है। Jagran और India TV Hindi की रिपोर्टों के मुताबिक, रूस ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी उम्मीदवारी का जोरदार समर्थन किया है। मास्को का मानना है कि भारत वैश्विक पटल पर एक महाशक्ति के रूप में उभर चुका है और संयुक्त राष्ट्र में उसकी अनुपस्थिति इस संस्था की वैधता को कमजोर करती है। इसके साथ ही, मॉरीशस जैसे छोटे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों ने भी खुलकर भारत का पक्ष लिया है, जिससे पश्चिमी देशों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
जर्मनी और जापान पर रूस का रुख: एक पेचीदा कूटनीति
News18 Hindi की ग्राउंड रिपोर्ट्स के अनुसार, जहां एक तरफ रूस भारत की उम्मीदवारी के लिए जी-जान से पैरवी कर रहा है, वहीं G-4 समूह के अन्य प्रमुख देशों—विशेषकर जर्मनी और जापान—को लेकर उसका रुख बेहद नपा-तुला और कुछ हद तक असहमतियों से भरा रहा है। मॉस्को की यह दोहरी रणनीति इस बात को दर्शाती है कि वैश्विक राजनीति में समर्थन केवल सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक हितों और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के शक्ति संतुलन के आधार पर तय होते हैं। रूस का यह दृष्टिकोण पश्चिमी देशों के उस खेमे को सीधा संदेश है जो सुधारों की बात तो करता है लेकिन वास्तविक बदलाव से कतराता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा और 'दब्बू' होती वैश्विक संस्थाएं
The Hindu की एक हालिया रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र संघ और संयुक्त राष्ट्र महासभा के बदलते स्वरूप को 'दब्बू और कमजोर' करार दिया गया है। 81वें सत्र की पृष्ठभूमि में यह बात खुलकर सामने आई है कि कैसे महाशक्तियों के आपसी टकराव और वीटो के दुरुपयोग के कारण यूएन जैसी संस्थाएं वैश्विक आपदाओं, युद्धों (जैसे इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध) को रोकने में बेबस साबित हो रही हैं। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि जब तक UNSC में भारत जैसे बड़े और जिम्मेदार लोकतंत्र को शामिल नहीं किया जाता, तब तक इस संस्था का चरित्र औपनिवेशिक और पश्चिमी देशों के हितों तक सीमित रहेगा।
भविष्य का असर और फील्ड निष्कर्ष
हमारी फील्ड जांच और विशेषज्ञों से बातचीत का निष्कर्ष यह है कि भारत के लिए UNSC का दरवाजा खटखटाना अब केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था की अनिवार्यता बन चुका है। IBSA का अल्टीमेटम और रूस का समर्थन इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र सुधारों पर बड़ा भू-राजनीतिक भूकम्प आ सकता है। हालांकि, पश्चिमी देशों की हिचकिचाहट और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की तुच्छ आपत्तियों के बीच भारत को अपनी कूटनीतिक चालें बेहद सावधानी से चलनी होंगी। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए रखेगा।




