डिजिटल भुगतान की दुनिया में नया मोड़: क्यों गरमाई है सियासत और व्यापार की बहस
आज के दौर में जब हम अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बाजार का रुख करते हैं, तो जेब में नकदी रखने के बजाय स्मार्टफोन से क्यूआर कोड स्कैन करना सबसे आम आदत बन चुका है। चाय की टपरी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, हर जगह यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस ने लेनदेन को बेहद आसान बना दिया है। लेकिन हाल ही में डिजिटल ट्रांजैक्शन से जुड़े नए नियमों ने बाजार में एक नई हलचल पैदा कर दी है। सरकार और नियामक संस्थाओं के फैसलों के बाद से कारोबारियों के बीच चर्चा तेज हो गई है कि आखिर डिजिटल भुगतान का यह सफर कितना महंगा या सस्ता साबित होने वाला है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया यानी एनपीसीआई के नए दिशा-निर्देशों ने सबका ध्यान खींचा है। आम उपभोक्ताओं को यह लग रहा था कि शायद उनकी जेब पर सीधा बोझ पड़ने वाला है, लेकिन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि ग्राहकों के लिए यह प्रक्रिया पूरी तरह मुफ्त बनी हुई है। असली सवाल यह है कि दुकानदारों और व्यापारियों के लिए डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और यूपीआई में से कौन सा माध्यम सबसे ज्यादा किफायती और फायदेमंद साबित होता है।
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क्या है नया मर्चेंट डिस्काउंट रेट नियम और किसे देना होगा यह शुल्क
एनपीसीआई के नए प्रावधानों के मुताबिक, दो हजार रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर शून्य दशमलव चार प्रतिशत का मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू किया गया है। यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि यह शुल्क किसी भी आम नागरिक या ग्राहक से बिल्कुल नहीं वसूला जाएगा। इसका सीधा संबंध उन दुकानदारों और व्यापारियों से है जो अपने बिजनेस अकाउंट पर ग्राहकों से डिजिटल पेमेंट लेते हैं। इसके अलावा छोटे और मझोले व्यापारियों को इस नए दायरे से काफी हद तक सुरक्षित रखा गया है ताकि उनका कारोबार प्रभावित न हो।
बाजार के जानकारों का मानना है कि इस नियम को लेकर फैली कुछ प्राथमिक गलतफहमियों की वजह से व्यापारियों में असमंजस की स्थिति बन गई थी। हालांकि नियामकों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अधिकांश दैनिक लेनदेन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। कुल मिलाकर यह व्यवस्था केवल बड़े व्यावसायिक भुगतानों और विशिष्ट मर्चेंट खातों पर केंद्रित है, जिससे सामान्य खरीदारी पूरी तरह अप्रभावित रहने वाली है।
पेमेंट के अन्य माध्यमों से कितनी अलग है यूपीआई की अर्थशास्त्र
यदि विभिन्न भुगतान माध्यमों के वित्तीय आंकड़ों की तुलना की जाए, तो तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाती है। डेबिट कार्ड से भुगतान स्वीकार करने पर दुकानदारों को औसतन लगभग नब्बे पैसे प्रति सैकड़ा यानी शून्य दशमलव नौ शून्य प्रतिशत तक का शुल्क देना पड़ता है। वहीं यदि ग्राहक क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करता है, तो यह बोझ बढ़कर लगभग दो प्रतिशत तक पहुंच जाता है। इसके विपरीत, यूपीआई के जरिए लेनदेन करने पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट केवल शून्य दशमलव चार प्रतिशत तय किया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा भी तय है।
इस गणित को एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी ग्राहक ने बाजार में दस हजार रुपये की खरीदारी की और उसका भुगतान डिजिटल माध्यम से किया। यदि यह भुगतान क्रेडिट कार्ड के जरिए हुआ है तो व्यापारी को लगभग दो सौ रुपये तक का शुल्क चुकाना पड़ सकता है। वहीं डेबिट कार्ड के मामले में यह खर्च नब्बे रुपये के आसपास बैठता है। इसके मुकाबले यदि यही दस हजार रुपये यूपीआई के माध्यम से दिए जाते हैं, तो मर्चेंट पर केवल चालीस रुपये का शुल्क आता है। इस प्रकार व्यापारी क्रेडिट कार्ड की तुलना में यूपीआई के जरिए खासी बचत कर लेते हैं।
व्यापारियों का बड़ा विरोध और दो अक्टूबर को नो यूपीआई डे का ऐलान
नए शुल्कों और नियमों के विरोध में देश के व्यापारी संगठनों ने कड़ा रुख अपनाया है। विभिन्न व्यापारिक संघों ने मिलकर दो अक्टूबर को देशव्यापी स्तर पर नो यूपीआई डे मनाने का फैसला किया है। इस विरोध प्रदर्शन के तहत व्यापारी अपनी दुकानों पर लगे क्यूआर कोड, साउंड बॉक्स और डिजिटल स्कैनर को काले कपड़ों से ढंककर अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे। उनका मुख्य तर्क यह है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के नाम पर व्यापारियों पर आर्थिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।
"डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने वाली नीतियों से व्यापारियों का कारोबार सुगम होना चाहिए, न कि उन पर अतिरिक्त शुल्कों का बोझ लादा जाना चाहिए। हम सरकार से इन नए प्रावधानों पर पुनर्विचार करने की मांग करते हैं।" — रवींद्र मंगवे, अध्यक्ष, महाराष्ट्र चैंबर ऑफ कॉमर्स, इंडस्ट्री एंड एग्रीकल्चर
महाराष्ट्र समेत देश के पांच सौ से अधिक प्रमुख व्यापारिक संगठन इस विरोध में खुलकर सामने आ चुके हैं। उनका कहना है कि यदि इन शुल्कों को वापस नहीं लिया गया तो छोटे कारोबारियों का मुनाफा बुरी तरह प्रभावित होगा। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि ग्राहकों के बीच डिजिटल पेमेंट की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि इसे पूरी तरह से नकारना किसी भी व्यापारी के लिए संभव नहीं होगा।
आम आदमी के लिए राहत: 96 प्रतिशत भुगतान अब भी पूरी तरह मुफ्त
आम जनता के दृष्टिकोण से राहत की सबसे बड़ी बात यह है कि देश में होने वाले कुल दैनिक यूपीआई भुगतानों का लगभग छियानवे प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह से शून्य शुल्क के दायरे में आता है। दो हजार रुपये तक के किसी भी मर्चेंट लेनदेन पर किसी भी प्रकार का शुल्क लागू नहीं होता है। यही कारण है कि रोजमर्रा की छोटी-मोटी खरीदारी करने वाले आम नागरिकों को इस नए बदलाव से घबराने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है।
इसके साथ ही आवश्यक सेवाओं जैसे कि रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन और कृषि क्षेत्र से जुड़े भुगतानों के लिए विशेष राहत दी गई है। इन कम-मार्जिन वाले क्षेत्रों में दो हजार रुपये से अधिक के लेनदेन पर प्रतिशत के आधार पर शुल्क लगाने के बजाय मात्र पांच रुपये का एक फ्लैट चार्ज तय किया गया है। कुल मिलाकर तमाम विरोध और बहसों के बावजूद, डिजिटल इंडिया के मौजूदा परिदृश्य में यूपीआई अपनी सुगमता और कम लागत के कारण व्यापारियों और ग्राहकों दोनों के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प बना हुआ है।








