भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में तेजी से डिजिटल हुई है। साल 2016 में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई की शुरुआत ने देश के पेमेंट इकोसिस्टम में एक क्रांति ला दी थी। आम आदमी से लेकर छोटे चाय वाले तक ने डिजिटल भुगतान को अपनाकर अपनी जिंदगी आसान बनाई। यह सिस्टम न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन गया। हालांकि, हाल ही में सामने आए नए प्रस्तावों ने इस चमकती हुई डिजिटल तस्वीर पर कुछ सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या नए शुल्कों के कारण देश एक बार फिर नकदी आधारित अर्थव्यवस्था की तरफ लौटने को मजबूर हो जाएगा?
कैश आधारित समाज से डिजिटल क्रांति का सफर
भारतीय अर्थव्यवस्था पारंपरिक रूप से नकदी पर बहुत अधिक निर्भर रही है। वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो भारत में जीडीपी के मुकाबले करेंसी का अनुपात विकसित देशों की तुलना में काफी ज्यादा है। अमेरिका, ब्रिटेन या स्वीडन जैसे देशों में डिजिटल भुगतान और कैशलेस व्यवस्थाएं बहुत पहले गहरी जड़ें जमा चुकी हैं। इसके विपरीत, भारत में यूपीआई आने के बाद से कैश के चलन में उल्लेखनीय गिरावट आई है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि साल 2020-21 के दौरान जो मुद्रा प्रचलन जीडीपी का 14.4 फीसदी तक पहुंच गया था, वह घटकर 2024-25 में लगभग 11.2 फीसदी पर आ गया। इस बदलाव में यूपीआई की भूमिका सबसे अहम रही है, जिसने लोगों की जेब से कैश निकालने की जरूरत को काफी हद तक कम कर दिया है।
लेकिन यह सफलता अब एक नए मोड़ पर खड़ी है। हाल ही में घोषित किए गए संशोधित ढांचे के तहत, कुछ खास श्रेणियों के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लागू करने की बात कही जा रही है। इसके तहत दो हजार रुपये से अधिक के मर्चेंट भुगतान पर शुल्क का प्रावधान किया गया है, हालांकि छोटे लेनदेन को इससे बाहर रखा गया है। इसके बावजूद, बाजार के जानकारों और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव देश के डिजिटल पेमेंट कल्चर के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।
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नया एमडीआर ढांचा और छोटे व्यापारियों पर इसका सीधा असर
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, दो हजार रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी यूपीआई लेनदेन पर 0.4 फीसदी का एमडीआर लग सकता है, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये तय की गई है। इस शुल्क का भुगतान सीधे तौर पर व्यापारियों को करना होगा। हालांकि, सरकार और नियामक यह दलील दे रहे हैं कि कुल लेनदेन का एक बड़ा हिस्सा यानी 2,000 रुपये से कम के भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेंगे, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू कुछ और ही कहानी बयां करता है।
वास्तविक चिंता का विषय वे चार प्रतिशत लेनदेन हैं जो दो हजार रुपये से अधिक के होते हैं, लेकिन कुल लेनदेन के मूल्य का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं। जिन दुकानों पर रोज बड़ी संख्या में मध्यम और बड़े आकार के बिल चुकाए जाते हैं, वहां व्यापारियों को भारी-भरकम शुल्क चुकाना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, एक ऐसी दुकान जो रोजाना औसतन कई बड़े डिजिटल ट्रांजैक्शन प्रोसेस करती है, उसके लिए महीने के अंत में यह लागत हजारों रुपये तक पहुंच जाएगी। ऐसे में व्यापारियों के सामने यह मजबूरी बन जाएगी कि वे इस अतिरिक्त बोझ से बचने के लिए ग्राहकों को फिर से नकद भुगतान करने के लिए प्रोत्साहित करें।
"यदि व्यापारियों पर अत्यधिक शुल्क का बोझ डाला जाएगा, तो वे स्वाभाविक रूप से ग्राहकों को कैश देने के लिए कहेंगे, जिससे वर्षों की मेहनत से खड़ी हुई डिजिटल भुगतान की आदत रातों-रात कमजोर हो सकती है।" — वित्तीय विशेषज्ञ
बैंकिंग प्रणाली और अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा प्रभाव
यदि व्यापारी डिजिटल पेमेंट से कन्नी काटते हैं और देश की जनता एक बार फिर कैश की तरफ लौटती है, तो इसका सबसे बड़ा असर भारतीय बैंकिंग सेक्टर पर पड़ेगा। वर्तमान में यूपीआई के कारण बैंकों को भारी मात्रा में कम लागत वाली कासा जमा (CASA Deposits) मिल जाती है। बैंक इस पैसे का उपयोग अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए करते हैं। इसके अलावा, एटीएम संचालन, करंसी चेस्ट की सुरक्षा, नोटों की छंटाई और परिवहन पर बैंकों को भारी-भरकम खर्च उठाना पड़ता है। कैश का चलन बढ़ने से बैंकों की ये परिचालन लागतें कई गुना बढ़ जाएंगी।
दूसरी तरफ, सरकार और केंद्रीय बैंक के मोर्चे पर भी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। बाजार में यदि नकदी की मांग बढ़ती है, तो करेंसी नोटों की छपाई और उनके रख-रखाव पर होने वाला खर्च सरकार को उठाना पड़ेगा। इससे अंततः आरबीआई के मुनाफे पर असर पड़ेगा और सरकार को मिलने वाला लाभांश भी कम हो सकता है। इसके साथ ही, मौद्रिक नीति के सुचारू संचरण में भी बाधा आएगी, क्योंकि अर्थव्यवस्था में जितना अधिक पैसा डिजिटल या फॉर्मल बैंकिंग चैनल के भीतर रहता है, सरकार और रिजर्व बैंक की नीतियां उतनी ही प्रभावी ढंग से काम करती हैं।
आगे की राह: क्या डिजिटल इंडिया को बचाए रखना है जरूरी?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार की सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) का निर्माण किया है, उसने पूरी दुनिया में देश का मान बढ़ाया है। आज गांवों से लेकर महानगरों तक हर वर्ग का व्यक्ति चाय की दुकान से लेकर मॉल तक में चुटकियों में भुगतान कर रहा है। कुछ सौ करोड़ रुपये के शुल्क या राजस्व के लिए इस विशाल इकोसिस्टम को खतरे में डालना एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हो सकता है।
जरूरत इस बात की है कि नीति निर्माता, बैंक और व्यापारी वर्ग मिलकर ऐसा बीच का रास्ता निकालें जिससे डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता भी बनी रहे और छोटे व्यापारियों पर अनुचित वित्तीय बोझ भी न पड़े। अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भारत को कैशलेस अर्थव्यवस्था की तरफ ले जाने वाला यह सफर अपनी रफ्तार खो सकता है, जिसका खामियाजा अंततः पूरी अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ेगा।








