होम/देश/उत्तराखंड में मतदाता सूची पर संग्राम: कांग्रेस के गंभीर आरोपों के बाद निर्वाचन आयोग ने तीन जिलों से मांगा स्पष्टीकरण
देशपढ़ने में समय: 6 मिनट

उत्तराखंड में मतदाता सूची पर संग्राम: कांग्रेस के गंभीर आरोपों के बाद निर्वाचन आयोग ने तीन जिलों से मांगा स्पष्टीकरण

उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद नए नोटिस जारी होने पर राजनीतिक घमासान मच गया है। कांग्रेस पार्टी द्वारा उठाए गए तीखे सवालों के बाद राज्य निर्वाचन कार्यालय ने संज्ञान लेते हुए तीन जिलों से इस मामले में विस्तृत स्पष्टीकरण तलब किया है।
✍️
नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•2 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•33
🌐Read in English →
शेयर करें:
उत्तराखंड में मतदाता सूची पर संग्राम: कांग्रेस के गंभीर आरोपों के बाद निर्वाचन आयोग ने तीन जिलों से मांगा स्पष्टीकरण
📷 उत्तराखंड में मतदाता सूची पर संग्राम: कांग्रेस के गंभीर आरोपों के बाद निर्वाचन आयोग ने तीन जिलों से मांगा स्पष्टीकरण — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर कांग्रेस और निर्वाचन आयोग आमने-सामने आ गए हैं।
  • कांग्रेस का दावा है कि प्रक्रिया लॉक होने के बाद तीन विधानसभा क्षेत्रों में फॉर्म-7 के तहत करीब 8 हजार मतदाताओं को नोटिस भेजे गए।
  • कांग्रेस के प्रदेश महासचिव संगठन राजेंद्र भंडारी ने सर्वदलीय बैठक के आंकड़ों का हवाला देते हुए पूरी प्रक्रिया पर पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
  • विवाद बढ़ने के बाद निर्वाचन कार्यालय ने संबंधित तीन जिलों के अधिकारियों से इस पूरी घटना पर जवाब मांगा है।

उत्तराखंड की राजनीति में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर माहौल एक बार फिर गरमा गया है। राज्य में चुनावी तैयारियों और वोटर लिस्ट की पारदर्शिता को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि एसआईआर की पूरी प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर बंद होने और लॉक किए जाने के बाद भी कई विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़े नोटिस जारी किए गए। इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है, जिसके बाद निर्वाचन कार्यालय ने भी त्वरित कार्रवाई करते हुए तीन जिलों से स्पष्टीकरण मांग लिया है।

सर्वदलीय बैठक के बाद सामने आए आंकड़े और कांग्रेस की आपत्तियां

पूरे विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब बीते 28 सितंबर को निर्वाचन आयोग की ओर से एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई थी। इस उच्चस्तरीय बैठक में आयोग के अधिकारियों ने तमाम राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े ताजा आंकड़े साझा किए थे। कांग्रेस पार्टी के प्रदेश महासचिव संगठन राजेंद्र भंडारी ने इस बैठक के बाद की गई आंतरिक जांच का हवाला देते हुए बताया कि आयोग ने स्पष्ट किया था कि डेटा को लॉक किया जा रहा है और इसके बाद आगे की सूची उपलब्ध कराई जाएगी।

लेकिन कांग्रेस के वॉर रूम और तकनीकी सेल द्वारा जब इन आंकड़ों और जमीनी स्थिति का मिलान किया गया, तो एक चौंकाने वाली बात सामने आई। पार्टी नेताओं का दावा है कि राज्य के तीन चुनिंदा विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 8 हजार ऐसे मतदाता पाए गए, जिन्हें फॉर्म-7 के तहत नए सिरे से नोटिस थमाए गए थे। इन नोटिसों के माध्यम से मतदाताओं के नामों पर आपत्तियां दर्ज कराने और उन्हें हटाने की प्रक्रिया पर काम चल रहा था, जबकि तय शेड्यूल के अनुसार यह प्रक्रिया पहले ही समाप्त हो चुकी थी।

फार्म-7 के नोटिस और समय सीमा को लेकर खड़े हुए बड़े सवाल

भारतीय निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक, फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल करने पर आपत्ति जताने या नाम हटाने के लिए किया जाता है। इसके लिए एक निश्चित समय सीमा तय होती है जिसके भीतर ही दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाती हैं। कांग्रेस का मुख्य तर्क यह है कि जब समय सीमा समाप्त हो चुकी थी और खुद निर्वाचन आयोग ने प्रक्रिया को लॉक करने की बात कही थी, तो उसके बाद भी नोटिस जारी होने का सिलसिला कैसे जारी रहा?

राजेंद्र भंडारी का कहना है कि इस तरह के घटनाक्रम लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा सवालिया निशान लगाते हैं। यदि तय प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी पिछले दरवाजे से नाम काटने या जोड़ने की कार्रवाई चल रही है, तो यह सीधे तौर पर मतदाताओं के अधिकारों का हनन है। पार्टी ने इस संबंध में निर्वाचन कार्यालय को औपचारिक पत्र भेजकर तत्काल प्रभाव से हस्तक्षेप करने और पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराने की मांग की है।

"सर्वदलीय बैठक में साफ कहा गया था कि एसआईआर की प्रक्रिया को लॉक किया जा रहा है और डेटा फाइनल हो चुका है। इसके बावजूद यदि फॉर्म-7 के तहत हजारों नोटिस जारी किए जा रहे हैं, तो यह निर्वाचन आयोग की कार्यशैली और प्रशासनिक पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।" — राजेंद्र भंडारी, प्रदेश महासचिव संगठन, कांग्रेस

निर्वाचन कार्यालय की प्रतिक्रिया और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई

कांग्रेस पार्टी द्वारा लिखित शिकायत दर्ज कराए जाने और मामले को सार्वजनिक रूप से तूल दिए जाने के बाद राज्य का निर्वाचन कार्यालय भी हरकत में आ गया है। शुरुआती आंतरिक रिपोर्टों का संज्ञान लेते हुए निर्वाचन अधिकारियों ने उन तीन जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEO) से इस मामले में तत्काल रिपोर्ट तलब की है, जहां से इन संदिग्ध नोटिसों के जारी होने की शिकायतें मिली हैं।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, निर्वाचन कार्यालय यह जांच कर रहा है कि क्या यह कोई तकनीकी त्रुटि थी, डेटा सिंक्रोनाइज़ेशन की समस्या थी या फिर जमीनी स्तर पर मैपिंग के दौरान कोई बड़ी मानवीय चूक हुई है। आयोग की ओर से यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि समयावधि पूरी होने के बाद यदि कोई नोटिस डिस्पैच हुआ है, तो उसके पीछे अधिकृत आदेश किसका था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए आने वाले दिनों में उत्तराखंड के निर्वाचन तंत्र द्वारा कुछ सख्त निर्देश जारी किए जाने की संभावना है ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी प्रशासनिक चूक से बचा जा सके।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकतंत्र की धुरी उसकी मतदाता सूची होती है। यदि वोटर लिस्ट में ही हेरफेर या तकनीकी खामियों के आरोप लगने लगें, तो चुनाव परिणामों पर से जनता का विश्वास डगमगाने लगता है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां भौगोलिक दूरियों के कारण लोगों का प्रशासनिक दफ्तरों तक पहुंचना पहले से ही कठिन होता है, वहां अंतिम समय में नाम कटने या नोटिस मिलने का डर मतदाताओं को परेशान कर देता है।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि निर्वाचन कार्यालय द्वारा जिन तीन जिलों से स्पष्टीकरण मांगा गया है, वहां के अधिकारी क्या जवाब देते हैं। कांग्रेस पार्टी ने साफ कर दिया है कि यदि इस मामले में संतोषजनक जवाब और सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो वे इस मुद्दे को राज्य स्तर पर और अधिक आक्रामक तरीके से उठाएंगे। फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में गर्मी बढ़ा दी है और एक बार फिर चुनावी प्रबंधन की कार्यप्रणाली चर्चा के केंद्र में आ गई है।

द फ्रीलांस पत्रकारिता नीति (Editorial Commitment):हम निष्पक्ष, सटीक और तथ्यात्मक पत्रकारिता के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह समाचार रिपोर्ट विभिन्न प्रमाणित समाचार एजेंसियों, आधिकारिक बयानों और स्थानीय संवाददाताओं से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार की गई है।
✍️

नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस

सत्यापित संपादकीय डेस्क

राजनीतिक, नीतिगत एवं राष्ट्रीय सरोकार रिपोर्टिंग टीम

द फ्रीलांस की राष्ट्रीय संपादकीय डेस्क देश की राजनीति, संसद, नीतिगत फैसलों, केंद्रीय योजनाओं और जनसरोकार से जुड़े बड़े मुद्दों पर 24/7 निष्पक्ष, तथ्यपरक और खोजी रिपोर्टिंग करती है। यह टीम दोहरे तथ्य-सत्यापन के कठोर सिद्धांतों का पालन करती है।