उपन्यास से परदे तक का सफर: क्या उम्मीदों पर खरी उतरी 'वेरिटी'?
किताबों की दुनिया और सिनेमाई पर्दे के बीच का फासला हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। जब कोई मशहूर किताब बड़े परदे पर उतारी जाती है, तो पाठकों की उम्मीदें आसमान पर होती हैं। ऐसा ही कुछ प्रसिद्ध लेखिका कोलिन हूवर के बहुचर्चित उपन्यास 'वेरिटी' के साथ देखने को मिला है। निर्देशक माइकल शोवाल्टर ने इस डार्क और रहस्यमयी कहानी को सिनेमाई रूप देने की कोशिश की, लेकिन जो परिणाम सामने आया, उसने प्रशंसकों को निराश कर दिया। किताब पढ़ते वक्त पाठक अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ा सकते हैं, लेकिन फिल्म में निर्देशक का दृष्टिकोण ही सब कुछ तय करता है। यहीं पर यह प्रोजेक्ट अपनी मूल ताकत खो बैठता है और एक प्रभावी थ्रिलर के रूप में असफल हो जाता है।
फिल्म में रहस्य, जुनून, खौफनाक राज और रिश्तों के कई पेच दिखाए गए हैं, लेकिन इन सभी तत्वों को सही तरीके से पिरोया नहीं जा सका है। डकोटा जॉनसन और ऐनी हैथवे जैसी ग्लोबल स्टार्स की मौजूदगी के बावजूद फिल्म दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब नहीं होती। कई दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि निर्देशक ने कहानी को रोमांचक बनाने के लिए जबरन नाटकीयता का सहारा लिया है। नतीजा यह है कि गंभीर और डार्क थ्रिलर होने का दावा करने वाली यह फिल्म कई जगहों पर एक साधारण बी-ग्रेड सस्पेंस ड्रामा जैसी प्रतीत होती है।
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कहानी की परतें और मुख्य किरदारों का ताना-बाना
फिल्म की मुख्य कहानी लोवेन एशले के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे डकोटा जॉनसन ने निभाया है। लोवेन एक संघर्षरत लेखिका है, जिसकी जिंदगी अचानक एक सड़क हादसे के बाद बदल जाती है। इसी दौरान उसकी मुलाकात जेरेमी क्रॉफर्ड से होती है, जिसका किरदार जोश हार्टनेट ने निभाया है। जेरेमी अपनी पत्नी वेरिटी क्रॉफर्ड की एक एक्सीडेंट के बाद गंभीर हालत के कारण परेशान है। वेरिटी (ऐनी हैथवे) एक जानी-मानी और सफल लेखिका है, जो कोमा में होने के कारण बिस्तर पर पड़ी है। जेरेमी लोवेन को इस बात के लिए राजी करता है कि वह वेरिटी की अधूरी पड़ी किताब और सीरीज को पूरा करे।
जब लोवेन क्रॉफर्ड परिवार के आलीशान लेकिन वीरान घर में रहने पहुंचती है, तो उसे वेरिटी की एक गुप्त आत्मकथा हाथ लगती है। इस डायरी या मैन्युस्क्रिप्ट में जेरेमी के साथ वेरिटी के जुनूनी रिश्तों और अपने ही जुड़वां बच्चों के प्रति उसकी नफरत से जुड़े बेहद खौफनाक खुलासे होते हैं। यह पांडुलिपि लोवेन और दर्शकों दोनों को एक अंधेरे और खतरनाक मानसिक सफर पर ले जाती है। यहीं से कहानी का मुख्य सस्पेंस शुरू होता है कि वेरिटी के लिखे गए शब्द सच हैं या किसी बीमार और कुंठित दिमाग की उपज मात्र हैं।
फिल्म के कमजोर पहलू और बनावटीपन का अहसास
कहानी के कागज पर दमदार होने के बावजूद फिल्म का स्क्रीनप्ले इसे पर्दे पर जीवंत करने में नाकाम साबित हुआ है। निर्देशक ने फिल्म की शुरुआत में एक डरावना और सस्पेंस से भरा माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है। बैकग्राउंड म्यूजिक, अचानक होने वाली कटिंग और डरावने विजुअल्स से यह जताने का प्रयास किया जाता है कि दर्शक किसी गहरी मनोवैज्ञानिक थ्रिलर को देख रहे हैं। हालांकि, यह कोशिश इतनी बनावटी और आरोपित लगती है कि डर पैदा करने के बजाय यह दर्शकों को असहज कर देती है। किरदारों के मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और उनके बीच के जटिल रिश्तों की गहराई पूरी तरह से गायब नजर आती है।
महत्वपूर्ण घटनाओं और रहस्यों को समझाने के लिए फिल्म में बहुत अधिक वॉइसओवर का सहारा लिया गया है। सिनेमाई भाषा में दृश्यों के जरिए बात कहने के बजाय जब पात्रों की आवाज पृष्ठभूमि में कहानी सुनाती है, तो दर्शक घटनाओं को महसूस करने के बजाय केवल एक लेक्चर की तरह सुनते रह जाते हैं। यही वजह है कि फिल्म का वह मुख्य तनाव और सिहरन पैदा नहीं हो पाती, जिसकी एक थ्रिलर फिल्म से सबसे ज्यादा उम्मीद की जाती है।
इरोटिक थ्रिलर के नाम पर अति-नाटकीयता और भटकाव
इस फिल्म को एक डार्क, ट्विस्टेड और इरोटिक थ्रिलर के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन कई मौकों पर बोल्ड सीन्स और अनावश्यक ग्लैमर कहानी की मुख्य धारा से भटका देते हैं। लोवेन का बार-बार कपड़े बदलना, नहाना और भोजन के दृश्यों पर कैमरे का जरूरत से ज्यादा समय बिताना कहानी को गति देने के बजाय समय की बर्बादी जैसा लगता है। इसके अलावा, जेरेमी और लोवेन के बीच पनपने वाला रोमांस भी कई जगहों पर बेहद अटपटा और बेतुका नजर आता है। छोटी-छोटी बातों को प्रेम का आधार बना देना और गंभीर पलों में अचानक से हास्यास्पद ड्रामा आ जाना फिल्म की गंभीरता को पूरी तरह से नष्ट कर देता है।
व्हीलचेयर पर पड़ी वेरिटी के दृश्यों में कई बार अनजाने में ही ऐसा हास्य पैदा हो जाता है, जो एक थ्रिलर फिल्म के बिल्कुल विपरीत है। ऐनी हैथवे ने बिस्तर पर रहते हुए भी अपने अभिनय से प्रभाव छोड़ने की भरपूर कोशिश की है, लेकिन कमजोर निर्देशन के कारण उनका यह प्रयास भी पूरी तरह निखर कर सामने नहीं आ पाया। जोश हार्टनेट को भी एक पति के रूप में बहुत सीमित स्क्रीन स्पेस मिला है, जिससे उनके किरदार का दर्द और संघर्ष सतह पर ही तैरता रह जाता है।
निष्कर्ष: बेहतरीन उपन्यास की कमजोर सिनेमैटिक परछाई
कुल मिलाकर, कोलिन हूवर के लोकप्रिय उपन्यास 'वेरिटी' का यह फिल्मी रूपांतरण पाठकों और दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरने में असफल रहा है। फिल्म में अभिनेत्रियों की मौजूदगी और कुछ बोल्ड तथा सस्पेंस से भरे पल हैं, लेकिन वे इस प्रोजेक्ट को डूबने से बचाने के लिए नाकाफी साबित होते हैं। अंत तक आते-आते कहानी कई अनुत्तरित सवाल हवा में छोड़ देती है, जिससे दर्शकों को एक गहरी निराशा का सामना करना पड़ता है।
"किताबों के पन्नों पर जो डर और रोमांच आसानी से महसूस होता है, उसे परदे पर उतारने के लिए केवल बड़े कलाकारों और महंगे सेटों से काम नहीं चलता, बल्कि एक मजबूत पटकथा की भी उतनी ही जरूरत होती है।" — फिल्म समीक्षक निष्कर्श








