नई दिल्ली/रियाद: पश्चिम एशिया (Middle East) के सुलगते रेगिस्तान में एक बार फिर युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं। 'द फ्रीलान्स' के रक्षा और कूटनीतिक मामलों के डेस्क को खुफिया और कूटनीतिक गलियारों से मिले इनपुट्स के अनुसार, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए रणनीतिक 'मक्का पैक्ट' (Mecca Pact) ने क्षेत्रीय समीकरणों को पूरी तरह से उलट दिया है। यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों से त्रस्त रियाद की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान ने अपने लगभग 40,000 सैनिक और अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को सऊदी धरती पर उतार दिया है। इस कदम से न केवल अरब प्रायद्वीप की भू-राजनीति में गर्माहट आ गई है, बल्कि वैश्विक ताकतों के बीच नए सिरे से कूटनीतिक पालाबंदी शुरू हो गई है।
मक्का पैक्ट के तहत पाकिस्तानी सैन्य तैनाती का अंदरूनी सच
हमारी फील्ड जांच और मध्य पूर्व के सैन्य विश्लेषकों से मिली जानकारी के मुताबिक, मक्का पैक्ट के तहत यह अब तक की सबसे बड़ी सैन्य लामबंदी है। सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों और सामरिक ठिकानों पर हूतियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद रियाद पर भारी दबाव था। ऐसे में, पारंपरिक सैन्य सहयोग समझौतों से आगे बढ़कर इस नए रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तानी सेना के फ्रंटलाइन कॉम्बैट ट्रूप्स और एयर डिफेंस यूनिट्स को तैनात किया गया है। यह तैनाती केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि हूतियों के खिलाफ किसी भी बड़े 'प्रिवेंटिव स्ट्राइक' या व्यापक सैन्य अभियान की जमीन तैयार कर रही है।
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तुर्की की भूमिका और एर्दोगान के रुख पर टकटकी
इस पूरे घटनाक्रम में तुर्की (Türkiye) की चुप्पी और उसकी भावी रणनीति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पैनी नजर है। क्या राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान मक्का पैक्ट का समर्थन करेंगे या इस भू-राजनीतिक जंग से दूरी बनाए रखेंगे? रक्षा जानकारों का मानना है कि इस्लामिक दुनिया के भीतर सुरक्षा संरचनाओं को लेकर एक नया ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है। पाकिस्तान का इस तरह खुलकर सऊदी पाले में खड़े होना और आक्रामक तेवर अपनाना अंकारा के नीति-निर्माताओं के लिए भी मंथन का विषय बन गया है।
वैश्विक आसमान पर मंडराते खतरे और अन्य मोर्चे
मिडल ईस्ट की अस्थिरता का असर केवल जमीनी लड़ाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार अंतरराष्ट्रीय उड़ानों और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी पड़ रहा है। हाल ही में ओमान के एक को-पायलट द्वारा इजरायल में एक विमान को लेकर पैदा किए गए सुरक्षा संकट (हमाम अलहमामी और कैप्टन स्मित मच्छार प्रकरण) ने नागरिक उड्डयन सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि यह घटना एक अलग प्रकरण से जुड़ी है, लेकिन यह दर्शाती है कि क्षेत्र में तनाव किस हद तक व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर फैल चुका है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय अपराधों और कुख्यात गैंगस्टर्स के सिंडिकेट जो दिल्ली-अहमदाबाद से लेकर अमेरिका तक फैले हैं, इस अस्थिर माहौल का फायदा उठाकर अपनी जड़ें मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, जिन पर सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी नजर है।
हूतियों के खिलाफ आगामी युद्ध और भारत पर कूटनीतिक असर
हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी-पाकिस्तान गठबंधन के संभावित युद्ध का असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया में रह रहे लाखों प्रवासियों पर पड़ना तय है। भारत हमेशा से इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता का पक्षधर रहा है। पाकिस्तान की सक्रिय सैन्य भागीदारी और युद्ध के आसन्न खतरे के बीच, नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बैठे रणनीतिकार हर एक गतिविधि पर बारीकी से नजर बनाए हुए हैं। क्या यह युद्ध एक सीमित सैन्य कार्रवाई तक रहेगा या पूरे खाड़ी क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेगा, यह आने वाले कुछ हफ्तों की सामरिक चालों पर निर्भर करेगा।
'द फ्रीलान्स' की पड़ताल यह साफ करती है कि मक्का पैक्ट के तहत सऊदी अरब में पाकिस्तान की यह भारी सैन्य मौजूदगी केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में हूतियों के खिलाफ एक बड़े आक्रामक सैन्य अभियान का स्पष्ट संकेत है।








