नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के चुनावी मैदान में एक बार फिर वोटर लिस्ट को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का नया आदेश जारी किया गया है। इस आदेश के सामने आते ही सियासी गलियारों और प्रशासनिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब इस पूरे मामले की थाह ली, तो सामने आया कि पिछले कुछ समय से चुनाव आयोग के भीतर और बाहर इस पूरी प्रक्रिया को लेकर काफी खींचतान चल रही थी।
शुरुआती पड़ताल बताती है कि एसआईआर की इस पूरी प्रक्रिया के तहत उन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए या जांचे जा रहे हैं जो लंबे समय से अपने पते पर नहीं मिल रहे हैं या जिनके दस्तावेजों में कोई बड़ी गड़बड़ी पाई गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश के करीब 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पहले ही इस तरह के अभियान चलाए जा चुके हैं, और अब बाकी बचे महत्वपूर्ण चुनावी राज्यों को इसके दायरे में लाया जा रहा है। आम नागरिकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उनका नाम सूची से बाहर तो नहीं हो जाएगा।
नाम कटने पर सीधे घर आएंगे अफसर
मतदाताओं के बीच फैल रही आशंकाओं को दूर करते हुए चुनाव आयोग की तरफ से कुछ बेहद साफ निर्देश जारी किए गए हैं। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का नाम एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान संदिग्ध पाया जाता है या लिस्ट से कटने की स्थिति बनती है, तो सीधे तौर पर बूथ लेवल अधिकारी यानी बीएलओ और अन्य जिम्मेदार अफसर संबंधित नागरिक के घर जाएंगे। वे घर जाकर जरूरी दस्तावेज खुद एकत्र करेंगे ताकि किसी भी असली वोटर का नाम गलती से भी सूची से बाहर न हो सके।
इस पूरी प्रक्रिया में फॉर्म-6 और डिजिटल डेटाबेस को सुरक्षित रखने के लिए बेहद कड़े नियम बनाए गए हैं। पिछले दिनों जब एसआईआर को लेकर सवाल उठे थे और यह बात सामने आई थी कि कुछ आयुक्त इस बात से नाराज हैं, तब आयोग ने खुलकर स्थिति स्पष्ट की थी। आयोग का यह कड़ा रुख बताता है कि वे चुनावी डेटा की शुद्धता और पारदर्शिता के साथ किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं।
आयोग ने दी सफाई, कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए
विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने एक आधिकारिक बयान जारी कर यह साफ कर दिया है कि संस्थान के भीतर किसी भी तरह का मतभेद नहीं है। आयोग के शीर्ष अधिकारियों का कहना है कि वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया से लेकर नए फॉर्म और डेटाबेस तैयार करने तक के सभी अहम फैसले पूरी तरह से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। यह बयान उन तमाम राजनीतिक चर्चाओं और अटकलों पर विराम लगाने के लिए काफी था, जिनमें कहा जा रहा था कि चुनाव आयुक्तों के बीच फैसलों को लेकर गहरी खटास पैदा हो गई है।
जमीनी स्तर पर हमारी टीम ने पाया कि जिला प्रशासन के नुमाइंदों ने अब इन दिशा-निर्देशों के मुताबिक अपनी कमर कस ली है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई जिलों में स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक बैठकें शुरू हो चुकी हैं ताकि बीएलओ को सही ट्रेनिंग दी जा सके। अफसरों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि वे जनता के बीच जाएं और उन्हें किसी भी तरह की अफवाहों से बचने की सलाह दें, ताकि लोग समय रहते अपने दस्तावेज तैयार रख सकें।
वोटर लिस्ट सुधार पर सियासी और प्रशासनिक असर
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर आने वाले स्थानीय और विधानसभा चुनावों की तैयारियों पर पड़ना तय है। राजनीतिक दल भी अब इस बात पर पैनी नजर रख रहे हैं कि उनके समर्थकों के नाम वोटर लिस्ट में सुरक्षित रहें। विपक्षी दल लगातार यह मांग कर रहे हैं कि किसी भी वोटर का नाम बिना पुख्ता जांच के न काटा जाए, वहीं सत्ता पक्ष का तर्क है कि पारदर्शी चुनाव के लिए एक साफ-सुथरी मतदाता सूची का होना सबसे ज्यादा जरूरी है।
द फ्रीलान्स की पड़ताल का लब्बोलुआब यह है कि चुनाव आयोग का यह कदम भले ही प्रशासनिक रूप से रूटीन प्रक्रिया का हिस्सा हो, लेकिन चुनावी राज्यों में इसके राजनीतिक मायने बहुत गहरे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि प्रशासन घर-घर जाकर दस्तावेज इकट्ठा करने के इस काम को कितनी पारदर्शिता और तेजी के साथ पूरा कर पाता है, ताकि आम जनता को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े।






