बदलती लाइफस्टाइल और जवानी में हड्डियों का खोखला होना
आमतौर पर समाज में यह मान लिया जाता है कि हड्डियों का कमजोर होना यानी ऑस्टियोपोरोसिस केवल बुढ़ापे की बीमारी है। जैसे-जैसे उम्र ढलती है, शरीर की ताकत कम होने लगती है और जोड़ दर्द करने लगते हैं। लेकिन आज के समय में यह धारणा पूरी तरह से बदल चुकी है। भागदौड़ भरी जिंदगी, खानपान में पोषक तत्वों की भारी कमी और घंटों तक एक ही जगह पर बैठकर काम करने की आदत ने युवाओं को भी अपनी चपेट में ले लिया है। देश के विभिन्न हिस्सों में स्वास्थ्य संगठनों द्वारा चलाए गए विशेष जांच अभियानों से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं और एक बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या में धूप से दूरी और जंक फूड का अत्यधिक सेवन शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है। बच्चे हों या युवा, खेल के मैदानों से दूर रहकर मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन के सामने अधिक समय बिता रहे हैं। इसके कारण उनके शरीर को प्राकृतिक रूप से मिलने वाला विटामिन डी और कैल्शियम नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, कम उम्र में ही शरीर की मस्कुलोस्केलेटल प्रणाली कमजोर होने लगती है और मामूली धक्के या चोट पर भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है।
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बड़ी मेडिकल स्क्रीनिंग में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
हाल ही में एक महीने तक चले व्यापक स्वास्थ्य और बोन मिनरल डेंसिटी (बीएमडी) स्क्रीनिंग अभियान के दौरान हजारों लोगों के स्वास्थ्य की जांच की गई। इस जांच शिविर में किशोरों, कामकाजी युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों ने हिस्सा लिया। रिपोर्ट के अनुसार, जांच कराने वाले कुल लोगों में से एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा पाया गया जिनकी हड्डियों का घनत्व (बोन डेंसिटी) सामान्य से काफी कम था। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हमारी युवा पीढ़ी एक साइलेंट हेल्थ क्राइसिस का सामना कर रही है, जिसके बारे में अधिकांश लोगों को तब तक पता नहीं चलता जब तक कोई गंभीर समस्या सामने नहीं आती।
विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि स्कूल और कॉलेज के छात्र, दफ्तरों में लंबे समय तक सिटिंग जॉब करने वाले कर्मचारी और यहां तक कि खेलकूद से जुड़े कुछ युवा भी इस कमजोरी की चपेट में पाए गए। बंद कमरों और परिसरों के भीतर रहने वाले लोगों की हालत और भी खराब थी, क्योंकि उन्हें पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक धूप और ताजा हवा नहीं मिल पाती। सूर्य के प्रकाश को विटामिन डी का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत माना जाता है, और इसकी कमी सीधे तौर पर हड्डियों के कमजोर होने का मुख्य कारण बनती है।
"हड्डियों से जुड़ी समस्याओं को कभी भी उम्र का तकाजा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कम उम्र में ही शरीर में दर्द या कमजोरी महसूस हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें और अपनी जीवनशैली में सुधार करें। समय पर की गई जांच गंभीर बीमारियों से बचा सकती है।" — डॉ. अतुल कुलश्रेष्ठ, वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ
युवतियों और महिलाओं में तेजी से बढ़ रहा है खतरा
इस स्वास्थ्य सर्वेक्षण का एक और डराने वाला पहलू यह रहा कि पुरुषों के मुकाबले कम उम्र की युवतियों और महिलाओं में हड्डियों की कमजोरी की समस्या अधिक गंभीर रूप में पाई गई। तीस साल से कम उम्र की युवतियों की बीएमडी स्क्रीनिंग में एक बड़ा प्रतिशत ऐसा निकला जिनकी हड्डियां मानक स्तर से काफी कमजोर थीं। इसके पीछे मुख्य वजह उनका खानपान, शारीरिक श्रम की कमी और डाइट में कैल्शियम व आयरन की अनदेखी है। इसके अलावा, महिलाओं में बढ़ती उम्र के साथ होने वाले हार्मोनल बदलाव और मीनोपॉज के आसपास के दौर में उचित देखभाल न होने से हड्डियां तेजी से अपनी ताकत खोने लगती हैं।
महिला चिकित्सकों और आर्थोपेडिक विशेषज्ञों का सुझाव है कि महिलाओं को पैंतीस से चालीस की उम्र के बाद अपनी सेहत को लेकर बेहद सतर्क हो जाना चाहिए। साल में कम से कम एक बार सीरम कैल्शियम, विटामिन डी और बीएमडी स्क्रीनिंग जैसे जरूरी टेस्ट जरूर कराने चाहिए। यदि शुरुआत में ही शरीर में पोषक तत्वों की कमी का पता चल जाए, तो सही आहार और डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट्स लेकर हड्डियों को मजबूत बनाए रखा जा सकता है।
बच्चों और किशोरों में बढ़ते शारीरिक विकार
हड्डियों की कमजोरी का असर केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों में भी इसके दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं। छोटे बच्चों और किशोरों में कैल्शियम और विटामिन डी की भारी कमी के कारण पैर टेढ़े होने जैसी समस्याएं (रिकेट्स) सामने आ रही हैं। जब शरीर का बढ़ता हुआ वजन कमजोर हड्डियों पर दबाव डालता है, तो पैर और घुटने मुड़ने लगते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर बच्चों में इस तरह के लक्षण समय रहते पकड़ में आ जाएं, तो बिना किसी बड़ी सर्जरी के सामान्य उपायों या छोटे मेडिकल उपकरणों से इन्हें ठीक किया जा सकता है। लेकिन यदि इसमें देरी हो जाए, तो हड्डियों को काटकर जटिल सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है।
इसलिए अभिभावकों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चों के खानपान पर विशेष ध्यान दें और उन्हें दूध, हरी सब्जियां, फल और प्राकृतिक खाद्य पदार्थ खाने के लिए प्रेरित करें। बच्चों को घर से बाहर धूप में खेलने के लिए भेजना बेहद जरूरी है ताकि उनके शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी मिल सके। प्रिवेंशन इज द बेस्ट क्योर यानी रोकथाम ही सबसे बेहतर इलाज है, और यह बात हड्डियों के स्वास्थ्य पर पूरी तरह लागू होती है.
दैनिक दिनचर्या में बदलाव और बचाव के उपाय
मजबूत हड्डियों के लिए किसी बहुत महंगे इलाज की जरूरत नहीं होती, बल्कि इसके लिए जीवनशैली में कुछ बुनियादी बदलाव करने की आवश्यकता होती है। सबसे पहले अपने डेली रूटीन से थोड़ा समय निकालकर शारीरिक श्रम या व्यायाम को जगह दें। रोजाना सुबह की धूप में कुछ समय बिताना शरीर के लिए अमृत के समान है। इसके अलावा, अपने भोजन में दूध, पनीर, दही, हरी पत्तेदार सब्जियां और सूखे मेवे जरूर शामिल करें ताकि शरीर को भरपूर मात्रा में कैल्शियम और अन्य जरूरी मिनरल्स मिल सकें।
नौकरीपेशा लोगों को सलाह दी जाती है कि वे लंबे समय तक एक ही कुर्सी पर लगातार न बैठे रहें। बीच-बीच में थोड़ा टहल लें, स्ट्रेचिंग करें और अपने बैठने की सही मुद्रा (पॉश्चर) का ध्यान रखें। यदि आप अपने शरीर को फिट और एक्टिव रखेंगे, तो न केवल हड्डियां मजबूत रहेंगी बल्कि कई अन्य गंभीर बीमारियों से भी बचाव हो सकेगा। स्वास्थ्य के प्रति थोड़ी सी सतर्कता और जागरूकता आपके भविष्य को स्वस्थ और खुशहाल बना सकती है।








