दुनिया में मंदी और भारत में तेजी: आखिर क्या है चीनी का यह अजीब खेल?
भारतीय रसोई में मिठास घोलने वाली चीनी अब आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगी है। अगस्त 2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में चीनी फुटकर में औसतन 63.05 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई, जो महीने भर पहले की तुलना में करीब 29 फीसदी ज्यादा है। एक तरफ जहां पूरी दुनिया के बाजारों में चीनी की कोई कमी नहीं है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके दाम लगातार गिर रहे हैं, वहीं भारत में कीमतों का इस तरह आसमान छूना एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
बीते कारोबारी साल में वैश्विक स्तर पर जरूरत से 22 लाख टन ज्यादा चीनी पैदा हुई थी। अनुमान यह भी लगाया जा रहा था कि 2026 और 2027 में कीमतों में और गिरावट आएगी। नवंबर 2025 में तो दुनिया के बाजार में चीनी की कीमत पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी। इसके बावजूद भारतीय उपभोक्ता महंगी चीनी खरीदने को मजबूर हैं। इस अंतर ने अर्थशास्त्रियों और आम लोगों दोनों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर वैश्विक सरप्लस का फायदा भारतीय बाजार को क्यों नहीं मिल पा रहा है।
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घटता पुराना भंडार और सप्लाई का संकट
भारतीय चीनी मिल संघ (ISMA) का मानना है कि कीमतों में इस बेतहाशा तेजी के पीछे मुनाफा कमाने की उम्मीद में की गई खरीद और घबराहट में हुई खरीदारी (पैनिक बाइंग) है। यदि इस तर्क को सही मान लिया जाए, तो इसका मतलब यह है कि भारत में चीनी की कीमत और उसकी वास्तविक उपलब्धता के बीच का रिश्ता अब कमजोर पड़ चुका है।
भारत लंबे समय से दुनिया का एक बड़ा चीनी निर्यातक देश रहा है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में स्थिति बदली है। लगातार तीन साल तक भारत ने करीब 40 लाख टन चीनी विदेश भेजी, जबकि देश के भीतर कुल पैदावार सालाना खपत से करीब 20 लाख टन कम रही। इस अंतर को पाटने के लिए पुराने भंडार का इस्तेमाल किया गया। नतीजतन, साल के अंत में बचने वाली चीनी और सालाना खपत का अनुपात 2018-19 के 64.1 फीसदी से लुढ़क कर 2025-26 में मात्र 16.9 फीसदी पर आ गया, जो पिछले दो दशकों का सबसे निचला स्तर है।
सरकारी नीतियां और आयात कर का पेंच
करीब एक दशक में यह पहला मौका था जब देश की घरेलू खपत के लिए सरकार को बाहर से चीनी मंगवाने की अनुमति देनी पड़ी। अमूमन भारत हर साल 24 से 26 लाख टन चीनी विदेश से मंगाता है, लेकिन उसका एक बड़ा हिस्सा विशेष सरकारी योजनाओं के तहत रिफाइनरियों में साफ होकर वापस विदेश चला जाता है। लेकिन जब कीमतें चिंताजनक स्तर पर पहुंच गईं, तब जाकर सरकार ने अगस्त के आखिरी हफ्ते में 10 लाख टन कच्ची चीनी बिना आयात कर के देश में बेचने की छूट दी।
दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले चीनी पर 100 फीसदी का भारी-भरकम आयात कर लगा हुआ था। इस ऊंचे टैक्स की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में चल रही कम कीमतों का असर भारतीय बाजार तक नहीं पहुंच पाया। जानकारों का कहना है कि यदि संकट के समय सरकार ने आयात की पूरी छूट समय रहते दे दी होती, तो देश के उपभोक्ताओं को चीनी काफी सस्ती मिल सकती थी और जमाखोरों को मुनाफा कमाने का मौका नहीं मिलता।
गन्ना, एथेनॉल और किसानों के भुगतान का चक्र
भारत में चीनी और गन्ने का पूरा कारोबार 1955 के जरूरी वस्तु अधिनियम और विभिन्न नियंत्रण आदेशों के दायरे में आता है। सरकार किसानों के हितों की रक्षा के लिए उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) तय करती है। 2026-27 के लिए यह कीमत बढ़कर 365 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। मिल संघों का कहना है कि मौजूदा गन्ना लागत के हिसाब से एक किलो चीनी के उत्पादन पर लगभग 40 रुपये से ज्यादा का खर्च आता है, जबकि सरकार द्वारा तय न्यूनतम बिक्री कीमत लागत से काफी नीचे बैठती है।
इसके अलावा, गन्ने से एथेनॉल बनाने के मोर्चे पर भी बदलाव आए हैं। जहां कुछ समय पहले कुल चीनी पैदावार का 12 फीसदी हिस्सा एथेनॉल निर्माण में जाता था, वह घटकर अब नौ फीसदी पर आ गया है क्योंकि देश में अब ज्यादातर एथेनॉल मक्के से तैयार किया जा रहा है। इसके बावजूद चीनी उद्योग के सामने वित्तीय संकट और किसानों का बकाया भुगतान हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है।
आगे की राह: क्या नियंत्रण कम करने की है जरूरत?
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले एक दशक से भारत में चीनी की सरकारी व्यवस्था भले ही कागजों पर स्थिर दिखती रही हो, लेकिन इसने बाजार के वास्तविक झटकों को छिपाए रखा। जब दुनिया भर के देश अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कड़े कदम उठाते हैं, तो वैश्विक अस्थिरता का असर स्थानीय बाजार पर पड़ना स्वाभाविक हो जाता है।
"अगर हमें भविष्य में इस तरह के कृत्रिम संकटों से बचना है, तो चीनी कारोबार पर से सरकारी जकड़न को कम करना होगा और बाजार को पारदर्शी बनाना होगा, ताकि उपभोक्ताओं और किसानों दोनों का हित सुरक्षित रह सके।"— कृषि अर्थशास्त्री
निष्कर्ष के तौर पर, अगस्त 2026 की यह स्थिति यह सिखाती है कि केवल पाबंदियों और भारी करों के सहारे कीमतों को लंबे समय तक कृत्रिम रूप से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। नीति निर्माताओं को अब इस पूरी व्यवस्था की नए सिरे से समीक्षा करनी होगी, ताकि दुनिया में सरप्लस होने के बावजूद देश के आम नागरिकों को महंगे दामों पर चीनी न खरीदनी पड़े।






