यमन का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध शहर 'तािज़' आज दुनिया के सबसे क्रूर और उपेक्षित मानवीय संकटों के केंद्र में है। 'द फ्रीलान्स' के वरिष्ठ फील्ड रिपोर्टर के रूप में जब मैंने इस युद्धग्रस्त क्षेत्र की सरहदों पर कदम रखा, तो हर तरफ मलबे के ढेर, गोलियों के निशान और सहम हुए चेहरों ने मेरा स्वागत किया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया, खासकर बीबीसी की हालिया ग्राउंड रिपोर्ट्स ने इस वीरान होती ज़मीन की दास्तां को दुनिया के सामने लाने की कोशिश की है, लेकिन यहाँ की ज़मीनी हकीकत इन खबरों से कहीं अधिक भयावह और मानवीय संघर्ष की पराकाष्ठा है।
घेराबंदी और तड़पता जनजीवन
तािज़ पिछले कई सालों से सशस्त्र संघर्ष और कड़े प्रतिबंधों के साये में जी रहा है। शहर के चारों ओर तैनात मिलिशिया और मोर्चों पर गूंजती तोपों की आवाजें यहाँ के बाशिंदों के दैनिक जीवन का संगीत बन चुकी हैं। सुबह की पहली किरण उम्मीद की बजाय बारूद के धुएं के साथ उगती है। सड़कें टूटी हुई हैं, अस्पताल मलबे में तब्दील हो चुके हैं और जो कुछ बचे हैं, वे दवाओं और बिजली की भारी कमी से जूझ रहे हैं। आम नागरिकों के लिए पानी और भोजन जैसी बुनियादी जरूरतें जुटाना भी किसी जंग जीतने से कम नहीं है।
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शिक्षा और बच्चों का भविष्य अधर में
युद्ध की सबसे दर्दनाक कीमत यहाँ के मासूम चुका रहे हैं। ताइज़ की धूल भरी गलियों में आपको स्कूल जाते बच्चे कम और मलबे में कबाड़ बीनते या अपनी जान बचाने के लिए भागते बच्चे ज्यादा मिलेंगे। कई स्कूल या तो बमबारी में नेस्तनाबूद हो चुके हैं या फिर उन्हें सैन्य शिविरों में बदल दिया गया है। शिक्षकों को महीनों से वेतन नहीं मिला है, फिर भी कुछ समर्पित शिक्षक खंडहर हो चुकी इमारतों के नीचे खुले आसमान के नीचे बच्चों को पढ़ाने का साहस जुटा रहे हैं। यह भविष्य की एक ऐसी पीढ़ी है जिसने केवल युद्ध, धमाके और अभाव देखे हैं।
स्वास्थ्य सेवाएं: मौत और जिंदगी के बीच झूलता शहर
तािज़ के अस्पतालों का हाल दिल दहला देने वाला है। ट्रॉमा सेंटर और मेटरनिटी वार्ड्स में डॉक्टर बुनियादी मेडिकल उपकरणों और एनेस्थीसिया के बिना मरीजों का इलाज करने को मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठन (NGOs) और राहत सामग्रियां लगातार जारी संघर्ष और प्रशासनिक बाधाओं के कारण समय पर जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाती हैं। कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और नवजात शिशुओं के लिए इन्क्यूबेटर तक उपलब्ध नहीं हैं। डॉक्टरों के अनुसार, हर दिन कई जानें केवल समय पर इलाज न मिल पाने के कारण चली जाती हैं।
अर्थव्यवस्था का पतन और रोजी-रोटी का संकट
युद्ध ने ताइज़ के पारंपरिक बाजार को पूरी तरह से तबाह कर दिया है। कभी जो शहर व्यापार और कारीगरी के लिए जाना जाता था, वहाँ आज बेरोजगारी चरम पर है। स्थानीय मुद्रा के अवमूल्यन और आसमान छूती महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। लोग अपनी जरूरत का सामान खरीदने के लिए अपने घरों का सामान बेचने को मजबूर हैं। कृषि और स्थानीय उद्योग ठप पड़े हैं, जिससे भुखमरी की स्थिति विकराल होती जा रही है।
उम्मीद की एक धुंधली किरण
इन तमाम त्रासदियों के बीच, ताइज़ के लोगों की जीवटता (resilience) हैरान करने वाली है। सब कुछ तबाह हो जाने के बाद भी यहाँ के युवा और महिलाएं एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। सामुदायिक रसोइयां चलाई जा रही हैं और स्थानीय स्तर पर टूटे हुए बुनियादी ढांचे को जोड़ने के प्रयास हो रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भले ही इस संकट को वो तवज्जो न मिल रही हो जिसकी इसे दरकार है, लेकिन ताइज़ के नागरिक हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे आज भी एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित भविष्य का सपना संजोए हुए हैं।










