युवाओं ने उठाई आवाज: शिक्षा और रोजगार के नाम पर अब आर-पार की लड़ाई
देश के बुनियादी तंत्र को मजबूत करने का दावा कागजों पर भले ही बड़ा नजर आता हो, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। इसी सच्चाई को उजागर करने और छात्रों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए युवाओं ने कमर कस ली है। हाल ही में संपन्न हुए एक महत्वपूर्ण सांगठनिक सम्मेलन में राज्य की शिक्षा व्यवस्था और लगातार बढ़ती बेरोजगारी के संकट को लेकर गंभीर चिंता जताई गई। वक्ताओं का साफ कहना था कि जब तक हुक्मरानों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास नहीं कराया जाएगा, तब तक व्यवस्था में सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा।
आयोजित इस विशेष बैठक में राज्यभर से पहुंचे युवाओं और छात्र नेताओं ने एक स्वर में यह स्वीकार किया कि ग्रामीण अंचल के शिक्षण संस्थान बदहाली के आंसुओं रो रहे हैं। न तो वहां ढंग के बैठने के बेंच-डेस्क हैं और न ही बच्चों के पीने के लिए साफ पानी की उचित व्यवस्था है। ऐसे में इन बुनियादी मुद्दों को मुख्यधारा की राजनीति के केंद्र में लाने के लिए एक व्यापक जनांदोलन की रूपरेखा तैयार की गई है, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई देगी।
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गांव-गांव जाकर स्कूलों की बदहाली का सच लाएंगे सामने
घोषणा के मुताबिक, आने वाले दिनों में युवा कार्यकर्ता शहरी चकाचौंध से दूर ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों का रुख करेंगे। इन स्कूलों की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने के लिए एक विशेष अभियान चलाया जाएगा। इस दौरान विद्यालयों में शिक्षकों की वास्तविक उपस्थिति, कक्षाओं के संचालन की स्थिति, प्रयोगशालाओं की उपलब्धता और साफ-सफाई जैसे तमाम पहलुओं की बारीकी से जांच की जाएगी।
संगठन से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारियों का मानना है कि कागजी आंकड़ों और जमीनी दावों में जमीन-आसमान का फर्क है। अधिकारी एसी कमरों में बैठकर सब कुछ दुरुस्त होने की रिपोर्ट सौंप देते हैं, जबकि बच्चे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। कार्यकर्ता गांव के अभिभावकों और शिक्षकों से भी सीधा संवाद स्थापित करेंगे ताकि उनकी समस्याओं को दस्तावेज के रूप में सरकार के समक्ष पेश किया जा सके।
विधायक संदीप सौरभ की दो टूक: व्यवस्था की नाकामी को अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पालीगंज के लोकप्रिय विधायक संदीप सौरभ ने मौजूदा व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है, लेकिन दुर्भाग्य से हुक्मरान इसी रीढ़ को कमजोर करने में लगे हुए हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें और जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करें।
"शिक्षा और रोजगार आज के समय में देश के सबसे बड़े सवाल बन चुके हैं। जब तक आम आदमी के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलेगी, तब तक समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है। हमारे कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर सरकारी स्कूलों की बदहाली का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने खोलेंगे और सरकार को जवाबदेह बनाएंगे।" — संदीप सौरभ, विधायक, पालीगंज
विधायक ने आगे कहा कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता के कारण आज सरकारी विद्यालयों में नामांकन तो हो रहे हैं, लेकिन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण तालीम नहीं मिल पा रही है। इस अन्याय के खिलाफ चुप बैठना अपराध के बराबर है और युवा वर्ग अब चुप बैठने वाला नहीं है।
10 अक्टूबर तक चलेगा जमीनी सर्वे, तैयार होगी रिपोर्ट
इस आंदोलन को पूरी तरह तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित बनाने के लिए एक निश्चित समयसीमा तय की गई है। आगामी 10 अक्टूबर तक का समय सर्वे के लिए निर्धारित किया गया है। इस समयावधि के भीतर कार्यकर्ता हर स्कूल का भौतिक सत्यापन करेंगे। इस सर्वे में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर फोकस रहेगा:
- विद्यालयों में स्वीकृत पदों के मुकाबले तैनात शिक्षकों की वास्तविक संख्या।
- स्कूल भवन की स्थिति, जर्जर छतें और कमरों की पर्याप्त उपलब्धता।
- छात्र-छात्राओं के अनुपात में शौचालय और पेयजल की चालू हालत।
- बिजली कनेक्शन और पढ़ाई के दौरान मिलने वाली अन्य बुनियादी सुविधाएं।
इस पूरी प्रक्रिया के पूरा होने के बाद एक व्यापक रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसे सार्वजनिक किया जाएगा ताकि प्रशासन के पास लीपापोती करने का कोई अवसर न बचे।
दुर्गापूजा के बाद प्रखंड और जिला स्तर पर हल्ला बोल प्रदर्शन
सर्वे का काम पूरा होने के बाद आंदोलन के अगले चरण का आगाज होगा। तय रणनीति के अनुसार, आगामी दुर्गापूजा के त्योहार के तुरंत बाद जिला और प्रखंड स्तर पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। इन प्रदर्शनों के जरिए स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा जाएगा और तय समय सीमा के भीतर व्यवस्था सुधारने का अल्टीमेटम दिया जाएगा।
संगठन के राज्य सचिव शिवप्रकाश रंजन ने बताया कि यदि प्रशासन ने समय रहते इन मांगों पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो आंदोलन को और अधिक तीव्र किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर राज्य स्तर पर बड़ा जनांदोलन खड़ा किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह से शासन-प्रशासन की होगी। युवाओं की यह हुंकार आने वाले दिनों में राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी हलचल पैदा करने के लिए पूरी तरह तैयार है।






