झारखंड की राजनीति में खनिज संसाधनों, बालू के टेंडर और केंद्रीय कानूनों को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के बीच जुबानी जंग बेहद तेज हो गई है। गढ़वा जिले में बीजेपी के जिला मीडिया प्रभारी रितेश चौबे ने एमएमडीआर (माइंस एंड मिनरल्स डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) कानून के विरोध में झामुमो द्वारा आयोजित धरना-प्रदर्शन को सिरे से खारिज करते हुए इसे महज एक 'राजनीतिक नौटंकी' करार दिया है। रितेश चौबे ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने और आम जनता के बीच भ्रम फैलाने के लिए केंद्रीय कानूनों पर राजनीति कर रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड में बालू, कोयला और पत्थर का अवैध कारोबार बिना किसी डर के चल रहा है और इसे सीधे तौर पर राज्य सरकार का संरक्षण प्राप्त है।
‘एमएमडीआर कानून जनहित में, झामुमो का धरना महज एक नौटंकी’: बीजेपी
बीजेपी के जिला मीडिया प्रभारी रितेश चौबे ने गढ़वा में एक बयान जारी कर झामुमो की नीतियों और उनके विरोध प्रदर्शन पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने देश की बहुमूल्य खनिज संपदा की सुरक्षा, अवैध खनन पर रोक लगाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से एमएमडीआर एक्ट में संशोधन कर कड़े प्रावधान किए हैं। यह कानून देश और जनहित में बनाया गया है ताकि प्राकृतिक संसाधनों की लूटपाट पर पूर्ण विराम लग सके।
रितेश चौबे ने कहा कि झामुमो इस कानून की आड़ में जनता को गुमराह कर रही है। सत्ताधारी दल सड़कों पर उतरकर ऐसा माहौल बना रहा है जैसे यह कानून आम लोगों या झारखंड के हितों के खिलाफ है, जबकि असलियत यह है कि राज्य सरकार अवैध खनन पर पर्दा डालना चाहती है।
"केंद्र सरकार ने जनहित में खनिज संपदा की सुरक्षा और पारदर्शिता लाने के लिए एमएमडीआर कानून बनाया है। लेकिन झामुमो इसके खिलाफ धरना देकर केवल अपनी नाकामी छिपाने की राजनीतिक नौटंकी कर रही है। जनता अब सब समझती है।" — रितेश चौबे, बीजेपी जिला मीडिया प्रभारी, गढ़वा
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झारखंड में बालू टेंडर अटका: अवैध खनन को सरकारी संरक्षण का आरोप
रितेश चौबे ने राज्य सरकार से सीधा सवाल पूछते हुए कहा कि पिछले काफी समय से झारखंड में बालू घाटों की नीलामी और टेंडर प्रक्रिया क्यों लटकी हुई है? उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार नियमानुसार बालू घाटों का टेंडर नहीं कर रही है, जिससे आम लोगों को अपने घर बनाने के लिए बालू नहीं मिल पा रही है। बालू के दाम आसमान छू रहे हैं और आम नागरिक भारी आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि बालू टेंडर न होने के पीछे एक सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। जब तक आधिकारिक टेंडर नहीं होंगे, तब तक बालू माफिया अवैध तरीके से नदियों से बालू उठाएंगे और इसमें ऊंचे स्तर पर बैठे लोगों की जेबें गर्म होंगी। उन्होंने कहा कि राज्य में कोयला, बालू और पत्थर का काला कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है। माफिया तंत्र इतना मजबूत हो चुका है कि उसे कानून-व्यवस्था या पुलिस का कोई डर नहीं रह गया है।
जल, जंगल और जमीन के दोहन का मुद्दा: राज्य में गरमाई राजनीति
झारखंड मुक्ति मोर्चा हमेशा से जल, जंगल और जमीन की रक्षा को अपना प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बताती रही है। इसी मुद्दे पर चुटकी लेते हुए बीजेपी नेता रितेश चौबे ने कहा कि जो पार्टी जल, जंगल और जमीन का नारा देकर सत्ता में आई थी, वही आज झारखंड के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में सबसे आगे दिख रही है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान शासनकाल में झारखंड के जंगलों की अवैध कटाई, पत्थरों का अवैध खनन और नदियों का सीना चीरकर बालू का अवैध उठान चरम पर पहुंच चुका है। इससे स्थानीय निवासियों और आदिवासियों को कोई लाभ नहीं मिल रहा है, बल्कि सारा फायदा अवैध खनन में शामिल बिचौलियों और माफियाओं की जेब में जा रहा है। बीजेपी ने चेतावनी दी है कि यदि राज्य सरकार ने अवैध खनन पर तुरंत रोक नहीं लगाई और समय रहते बालू टेंडर की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की, तो बीजेपी जनहित में सड़कों पर उतरकर बड़ा आंदोलन करेगी।
क्या है एमएमडीआर एक्ट और क्यों हो रहा है इस पर विवाद?
एमएमडीआर (Mines and Minerals Development and Regulation) अधिनियम भारत में खनन क्षेत्र को विनियमित करने वाला सबसे मुख्य कानून है। केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में इसमें कई महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं ताकि खनन पट्टों (Mining Leases) की आवंटन प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता आए, नीलामी (Auction) प्रणाली को अनिवार्य बनाया जा सके और अवैध खनन करने वालों के खिलाफ कड़े दंडात्मक कदम उठाए जा सकें।
इन संशोधनों का मुख्य उद्देश्य राज्य सरकारों के राजस्व में बढ़ोतरी करना और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को नियंत्रित करना है। हालांकि, झारखंड जैसे खनिज समृद्ध राज्यों में क्षेत्रीय दलों और विपक्षी समूहों के बीच इस बात को लेकर राजनीतिक बहस चलती रहती है कि इससे राज्य के अधिकारों पर क्या असर पड़ता है। बीजेपी का कहना है कि यह कानून पूरी तरह से पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था कायम करता है, जबकि सत्ताधारी दल इसे केंद्रीय हस्तक्षेप बताकर इसका विरोध करते हैं।
आम जनता पर असर और निर्माण कार्य ठप होने का संकट
झारखंड में बालू की किल्लत और अवैध खनन का सीधा प्रभाव आम नागरिकों के जीवन पर पड़ रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनने वाले गरीब परिवारों के पक्के मकान हों या फिर आम मध्यमवर्गीय परिवारों का अपना घर बनाने का सपना, बालू की कमी और अत्यधिक कीमतों की वजह से राज्यभर में निर्माण कार्य ठप पड़े हैं।
गढ़वा समेत राज्य के कई जिलों में छोटे ठेकेदार और भवन निर्माण से जुड़े मजदूर बेरोजगारी के संकट से जूझ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी स्तर पर बालू घाटों का संचालन न होने के कारण बालू की कालाबाजारी हो रही है, जिससे आम आदमी को बालू की प्रति ट्रॉली दर तीन से चार गुना अधिक चुकानी पड़ रही है। बीजेपी ने इसे प्रशासनिक नाकामी और पूरी तरह जनविरोधी रवैया बताया है।
राजनीतिक संग्राम तेज: आगे की स्थिति पर नजर
गढ़वा में बीजेपी मीडिया प्रभारी के इस तीखे हमले के बाद झारखंड की राजनीति में जुबानी जंग और तेज होने के आसार हैं। झामुमो जहां एमएमडीआर कानून को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर है और इसे झारखंड के हितों के विपरीत बता रही है, वहीं बीजेपी इस मुद्दे पर सत्ताधारी दल को घेरने के लिए बालू टेंडर और अवैध खनन के मामलों को लगातार प्रमुखता से उठा रही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि राज्य सरकार बालू घाटों की नीलामी को लेकर क्या कदम उठाती है और एमएमडीआर एक्ट को लेकर दोनों दलों के बीच जारी यह सियासी विवाद क्या नया मोड़ लेता है।



