द फ्रीलान्स (नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम): भारत की सड़कों पर दौड़ने वाली लाल-हरी और नीली बसें केवल परिवहन का साधन भर नहीं हैं, बल्कि यह देश के करोड़ों आम नागरिकों की रोज़मर्रा की धड़कन हैं। पिछले कुछ दिनों में गूगल ट्रेंड्स पर 'बस' से जुड़े विषयों ने अचानक तूल पकड़ा है, और जब हमने 'द फ्रीलान्स' की विशेष टीम के साथ इसकी तह तक पड़ताल की, तो एक बेहद जटिल और सुलगती हुई तस्वीर सामने आई। दक्षिण के राजनीतिक अखाड़े से लेकर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की सड़कों तक, बस परिवहन आज एक तरफ चुनावी लोकलुभावन वादों और दूसरी तरफ बुनियादी संकटों के बीच बुरी तरह उलझ चुका है।
केरल के सियासी गलियारों में गूंजता 'फ्री बस' का सवाल और बयानबाजी
केरल की राजनीति में इन दिनों महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की योजना और बीमा योजनाओं को लेकर सियासी पारा चरम पर है। कांग्रेस पार्टी ने आगामी चुनावों के मद्देनजर महिला वोटर्स को साधने के लिए इस मुफ्त बस सफर का बड़ा दांव चला है। विपक्षी खेमे का मानना है कि यह सामाजिक कल्याण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। हालांकि, इस पर सत्तारूढ़ और विरोधी दलों के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। हाल ही में केरल के मंत्री सीपी जॉन का एक बयान इस बहस के केंद्र में आ गया, जिसमें उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “बस के पैसे नहीं, बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़ता है।” इस तीखी टिप्पणी ने राज्य में मुफ्त योजनाओं की उपयोगिता और वित्तीय विवेक पर एक नई बहस छेड़ दी है। क्या मुफ्त यात्रा की ये योजनाएं वास्तव में सबसे जरूरतमंदों तक पहुंच रही हैं, या फिर यह महज चुनावी वैतरणी पार करने का एक सियासी हथियार बनकर रह गई हैं?
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सड़कों पर दौड़ती मौत और तकनीकी लापरवाही: पट्टाम्बी की घटना
एक तरफ जहां मुफ्त सफर और चुनावी वादों पर बहस छिड़ी है, वहीं आम जनता की सुरक्षा के बुनियादी सवाल भी मुंह बाए खड़े हैं। केरल के पट्टाम्बी में हाल ही में घटी एक डरावनी घटना ने परिवहन सुरक्षा पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं, जहां एक चलती हुई KSRTC (केरल राज्य सड़क परिवहन निगम) बस अचानक आग की लपटों में घिर गई। गनीमत यह रही कि समय रहते यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, अन्यथा एक बड़ा हादसा हो सकता था। इस घटना ने एक बार फिर पुराने पड़ चुके फ्लीट, मेंटेनेंस की कमी और राज्य परिवहन निगमों की लचर व्यवस्था को बेनकाब कर दिया है। यात्री रोजाना अपनी जान जोखिम में डालकर इन बसों में सफर करने को मजबूर हैं।
मुंबई की धड़कनें थमीं: 'बेस्ट' कर्मचारियों की हड़ताल
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का हाल भी इससे जुदा नहीं है। यहाँ 'बेस्ट' (BEST) बस कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल लगातार दूसरे दिन भी जारी रही, जिससे शहर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई। लाखों दैनिक यात्रियों, ऑफिस जाने वाले प्रोफेशनल्स और स्कूली बच्चों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कर्मचारियों की वेतन विसंगतियों, ठेका प्रथा और लंबित मांगों को लेकर यह आंदोलन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि महानगरों में सार्वजनिक परिवहन को संभालने वाले कर्मी किन दयनीय और तनावपूर्ण स्थितियों में काम कर रहे हैं। प्रशासन और यूनियनों के बीच की इस रस्साकशी में अंततः आम आदमी ही पिस रहा है।
क्या राष्ट्रीयकरण के दौर में ही अटका है बस परिवहन?
पॉलिसी रिसर्च थिंक टैंक 'सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च' (CPPR) की एक हालिया रिपोर्ट इस पूरे संकट की जड़ पर गहरी रोशनी डालती है। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि आखिर क्यों आज भी बस परिवहन व्यवस्था दशकों पुराने राष्ट्रीयकरण (Nationalization) के दौर और लाल फीताशाही से बाहर नहीं निकल पा रही है? निजी भागीदारी की कमी, सरकारी निगमों का घाटा, पुरानी तकनीक और प्रशासनिक उदासीनता ने इस सेक्टर को अपंग बना दिया है। परिवहन सुधारों के नाम पर केवल कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं, जबकि धरातल पर नीतियां जस की तस बनी हुई हैं।
भविष्य का असर और निष्कर्ष
'द फ्रीलान्स' की इस ऑन-द-ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि भारत में बस परिवहन आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ मुफ्त यात्रा के सियासी वादे हैं, तो दूसरी तरफ जलती हुई बसें, हड़तालें और बुनियादी ढांचे की बदहाली है। यदि सरकारों ने जल्द ही कागजी लोकलुभावन घोषणाओं से ऊपर उठकर नीतिगत सुधार, सुरक्षा मानकों के कड़ाई से पालन और परिवहन कर्मियों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकाला, तो देश का यह सार्वजनिक परिवहन तंत्र कभी भी पूरी तरह बैठ सकता है, जिसका सीधा खामियाजा भारत के आम मजदूर और मध्यम वर्ग को भुगतना पड़ेगा।







