नई दिल्ली/जयपुर: भारतीय न्यायपालिका की चारदीवारी के भीतर से एक ऐसी आवाज बाहर आई है, जिसने देश के कानूनी गलियारों में भूचाल ला दिया है। मामला सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज जस्टिस संदीप मेहता और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (एसीजे) संजीव प्रकाश शर्मा के बीच छिड़ी जुबानी जंग का है। द फ्रीलान्स की विशेष टीम ने इस हाई-प्रोफाइल विवाद की तह तक जाने के लिए न्यायिक सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों का गहराई से विश्लेषण किया है, जो न्यायपालिका की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश को लिखी गई चिट्ठी और आरोपों का सिलसिला
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को एक गोपनीय पत्र लिखा। इस पत्र में राजस्थान हाईकोर्ट के कामकाज और पूर्व एसीजे संजीव प्रकाश शर्मा से जुड़ी कुछ प्रशासनिक आपत्तियों व असहज करने वाले तथ्यों का जिक्र था। जैसे ही इन पत्रों के अंश मीडिया और कानूनी हल्कों में लीक हुए, न्यायपालिका के भीतर का असंतोष सड़क पर आ गया। जस्टिस मेहता के इन आरोपों ने न्यायिक नियुक्तियों, स्थानांतरण और अदालती परिसरों में वकीलों के आचरण को लेकर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।
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पूर्व एसीजे संजीव प्रकाश शर्मा का तीखा पलटवार: 'मुझसे जलन होगी'
आरोपों से घिरे पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा ने चुप रहना मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने अत्यंत तीखे शब्दों में जस्टिस मेहता के बयानों और दावों को खारिज किया। एक मीडिया साक्षात्कार और सार्वजनिक मंचों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस शर्मा ने दो टूक कहा, 'मुझसे जलन होगी, अपनी हद पता होनी चाहिए।' उन्होंने आगे आरोप लगाया कि जस्टिस मेहता उनसे व्यक्तिगत रूप से ईर्ष्या रखते हैं और राजस्थान न्यायपालिका के दौरान उनके फैसलों या प्रशासनिक कदमों को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित रहे हैं।
वकीलों की हड़ताल और उकसावे के गंभीर आरोप
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू वकीलों की हड़तालों से जुड़ा है। जस्टिस शर्मा ने यह सनसनीखेज आरोप लगाया है कि सुप्रीम कोर्ट के जज ने वकीलों को हड़ताल के लिए उकसाया था। एक वरिष्ठ न्यायिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह के आरोप लगाया जाना अभूतपूर्व है। यदि बार (वकीलों) और बेंच (न्यायाधीशों) के बीच समन्वय इस हद तक बिगड़ जाए, तो आम मुकदमों की सुनवाई और न्याय मिलने की प्रक्रिया सीधे तौर पर प्रभावित होती है। राजस्थान हाईकोर्ट के स्थानीय वकीलों के बीच भी इस बात को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है कि आखिर अदालती राजनीति में उनकी भूमिका का इस तरह इस्तेमाल क्यों हो रहा है।
प्रक्रियात्मक चूक और संस्थागत गरिमा का सवाल
जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने अपने बचाव में यह भी तर्क दिया कि यदि जस्टिस मेहता को उनके खिलाफ कोई वैध शिकायत या आपत्ति थी, तो उसे उठाने के लिए एक स्थापित संवैधानिक और संस्थागत प्रक्रिया मौजूद थी। प्रक्रिया को दरकिनार कर इस प्रकार के आरोप सार्वजनिक करना या पत्र लीक होना न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा को गहरी ठेस पहुँचाता है।
- सुप्रीम कोर्ट के जज और हाईकोर्ट के पूर्व एसीजे के बीच खुलेआम बयानबाजी।
- CJI को लिखे गए पत्रों के सार्वजनिक होने से न्यायपालिका की पारदर्शिता पर सवाल।
- वकीलों को हड़ताल के लिए उकसाने के दावों से न्यायिक अराजकता का अंदेशा।
- व्यक्तिगत ईर्ष्या और पूर्वाग्रह के आरोप न्यायपालिका की आचार संहिता पर प्रश्नचिह्न।
भविष्य का असर और न्यायपालिका की साख
'द फ्रीलान्स' के विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद महज दो न्यायाधीशों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं या अहं की लड़ाई नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि जब देश की सर्वोच्च अदालतों में प्रशासनिक और वैचारिक मतभेद खुलकर सामने आते हैं, तो आम नागरिकों का न्याय प्रणाली से भरोसा डगमगाने लगता है। आने वाले दिनों में यदि सीजेएस स्तर पर इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह न्यायपालिका के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकटों में से एक बन सकता है।







