दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में बदला युवाओं का मिजाज
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव हमेशा से देश की मुख्यधारा की राजनीति का एक छोटा लेकिन बेहद अहम आईना रहे हैं। इस बार का चुनाव कई मायनों में अलग और दिलचस्प रहा है। हाल ही में जंतर-मंतर पर जिस तरह से जेन-जेड पीढ़ी की ऊर्जा और नाराजगी सड़क पर उतरी थी, उसकी पहली संस्थागत परीक्षा के रूप में डूसू चुनाव को देखा जा रहा है। विश्वविद्यालय के परिसरों में इस बार छात्र केवल नारों और पर्चों के भरोसे नहीं हैं, बल्कि वे तीखे सवाल पूछ रहे हैं और अपनी समस्याओं के ठोस समाधान की मांग कर रहे हैं।
शुक्रवार को जब छात्र सुबह-सुबह अपने मतदान केंद्रों पर पहुंचे, तो उनके चेहरों पर एक नई किस्म की गंभीरता और जागरूकता साफ झलक रही थी। वे जानते थे कि उनका एक वोट आने वाले एक साल तक उनके अधिकारों और उनकी आवाज को विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंचाएगा। यही वजह है कि इस बार चुनाव प्रचार के तौर-तरीके भले ही पुराने नजर आए हों, लेकिन मतदाताओं यानी आम छात्रों के मन में मुद्दों को लेकर एक नई स्पष्टता देखने को मिली है।
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कैंपस से लेकर सड़क तक: क्या हैं छात्रों के असली मुद्दे?
जब उत्तर और दक्षिण परिसर के विभिन्न कॉलेजों के बाहर छात्रों से बात की गई, तो उनकी प्राथमिकताओं की फेरिस्त में पारंपरिक राजनीतिक बहसों से ज्यादा उनकी रोजमर्रा की परेशानियां शामिल थीं। इनमें सबसे ऊपर विश्वविद्यालय और आसपास के इलाकों में छात्राओं और छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा था। इसके अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय में लगातार आसमान छूती हॉस्टल की फीस, कमरों की भारी कमी और दूर-दराज से आने वाले छात्रों के लिए मेट्रो या डीटीसी बसों में रियायती परिवहन पास जैसी मांगें प्रमुख थीं।
छात्रों का कहना है कि वे अब केवल बड़े-बड़े वादों पर भरोसा नहीं करेंगे। पिछले कुछ सालों में जिस तरह से शिक्षा महंगी हुई है और कैंपस में बुनियादी सुविधाओं का अभाव खटका है, उसने युवाओं को अंदर से झकझोर दिया है। यही कारण है कि इस बार के चुनावों में उम्मीदवारों को छात्रों के कड़े सवालों का सामना करना पड़ा। चाहे एबीवीपी हो, एनएसयूआई हो या कोई अन्य वामपंथी या क्षेत्रीय छात्र संगठन, सबको छात्रों की इन जमीनी चिंताओं के आगे झुकना ही पड़ा।
पारंपरिक सियासत और युवा ऊर्जा का अनोखा संगम
एक तरफ जहां छात्र अपनी बुनियादी और अकादमिक समस्याओं को लेकर मुखर थे, वहीं दूसरी तरफ संगठनात्मक राजनीति की जड़ें भी डीयू के इतिहास की तरह गहरी नजर आईं। मतदान केंद्रों के बाहर लगे तंबू, बड़े-बड़े कटआउट, और लाउडस्पीकरों पर बजते चुनावी गीत इस बात की गवाही दे रहे थे कि मुख्यधारा के राजनीतिक दल अपने छात्र विंग्स के जरिए अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। छात्र भले ही बदलाव चाहते थे, लेकिन संगठनात्मक मशीनरी का प्रभाव पूरी तरह से नकारा नहीं जा सका।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दौर संक्रमण काल का है। एक तरफ युवा पीढ़ी पुराने ढर्रे की राजनीति से ऊब चुकी है और वह अपनी अलग पहचान बनाना चाहती है, तो दूसरी तरफ चुनावी प्रबंधन और संसाधनों के मामले में पारंपरिक दल आज भी मजबूत स्थिति में हैं। यही वजह है कि डूसू चुनाव में इस बार आधुनिक डिजिटल कैंपेनिंग और पारंपरिक शक्ति-प्रर्दशन का एक अनूठा मिश्रण देखने को मिला, जिसने चुनाव को और अधिक रोचक बना दिया।
जंतर-मंतर की गूंज और डीयू के पोलिंग बूथ
हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर जिस तरह से देश भर के युवाओं ने विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किया है, उसने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी थी। उसी युवा आक्रोश का एक सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक विस्तार डीयू के चुनावों में भी महसूस किया गया। छात्र अब केवल अपनी कक्षाओं तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे देश और समाज में हो रहे बदलावों को लेकर भी उतने ही संवेदनशील हैं।
पोलिंग बूथ के बाहर खड़े कई छात्रों ने खुलकर माना कि वे ऐसे प्रतिनिधियों को चुनना चाहते हैं जो प्रशासन के सामने उनकी आवाज बन सकें, न कि सिर्फ राजनीतिक दलों के मोहरे बनकर रह जाएं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में छात्र राजनीति का स्वरूप बदलने वाला है, जहां नेताओं को काम के आधार पर परखा जाएगा, न कि सिर्फ हवासीर या जाति-धर्म के समीकरणों पर।
प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था की कड़ी चौकसी
डूसू चुनावों के दौरान किसी भी प्रकार की हिंसा या अप्रिय घटना को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और डीयू प्रशासन ने पूरी तैयारी कर रखी थी। सभी कॉलेजों के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल और सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था ताकि मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो सके। पिछले वर्षों में चुनावों के दौरान होने वाली झड़पों और गाड़ियों के काफिले से लगने वाले जाम को ध्यान में रखते हुए इस बार प्रशासन काफी सख्त नजर आया।
"छात्र अब सिर्फ नारे लगाने के लिए यूनिवर्सिटी नहीं आते, वे अपने भविष्य और अधिकारों को लेकर पूरी तरह जाग चुके हैं। इस बार के चुनाव ने साबित कर दिया है कि युवाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता।" — डॉ. आलोक रंजन, शिक्षाविद् एवं राजनीतिक विश्लेषक
प्रशासन की सख्ती का असर भी दिखा और अधिकांश कॉलेजों में मतदान शांतिपूर्ण ढंग से पूरा हुआ। हालांकि कुछ जगहों पर छिटपुट बहसों और प्रचार नियमों के उल्लंघन की खबरें जरूर सामने आईं, लेकिन कुल मिलाकर छात्रों ने परिपक्वता का परिचय देते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग किया। लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का पालन कराने के लिए भी यूनिवर्सिटी प्रशासन इस बार काफी मुस्तैद दिखा, जिससे चुनाव प्रचार का दायरा कुछ हद तक नियंत्रित रहा।
निष्कर्ष: क्या यह भविष्य की राजनीति की ओर इशारा है?
डूसू चुनाव के ये नतीजे और मतदान के दौरान दिखा छात्रों का यह उत्साह केवल एक छात्र संघ चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की राजनीतिक दिशा का भी पूर्वाभ्यास है। जब देश का युवा कैंपस से ही अपने अधिकारों, सुरक्षा और आजीविका के सवालों पर मुखर होना शुरू कर देता है, तो देश की मुख्यधारा की राजनीति को भी अपनी चाल बदलनी पड़ती है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जीते हुए नए छात्र नेता इन उम्मीदों पर कितना खरा उतर पाते हैं और क्या वे वादों के मुताबिक डीयू की तस्वीर बदल पाएंगे या नहीं।





