वोट चोरी के आरोपों पर देश की राजनीति में उबाल
भारतीय राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर चुनाव आयोग की भूमिका और मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर संग्राम छिड़ गया है। लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में छपी खोजी रिपोर्ट को आधार बनाते हुए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर तीखा हमला बोला है। एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि देश में चुनाव प्रक्रिया के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है, जो सीधे तौर पर भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद पर प्रहार है।
राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश के विभिन्न राजनीतिक दल चुनावी संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर पहले से ही मुखर रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पिछले कुछ वर्षों से वे लगातार चुनावी गड़बड़ियों के सबूत सामने ला रहे हैं, लेकिन अब तो आयोग के भीतर से ही असहमतियों की खबरें बाहर आने लगी हैं। इस ताजा विवाद ने राष्ट्रीय राजधानी से लेकर प्रदेशों तक की राजनीतिक सरगर्मी को अचानक काफी बढ़ा दिया है।
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दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और मीडिया रिपोर्ट का जिक्र
अपनी बात को पुख्ता करते हुए राहुल गांधी ने उस मीडिया रिपोर्ट का विशेष रूप से उल्लेख किया जिसमें दावा किया गया है कि निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों ने पिछले कुछ महीनों के दौरान कई फैसलों पर अपनी असहमति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी नामक चुनाव आयुक्तों ने आयोग के कदमों पर कथित तौर पर सवाल उठाए और खुद को निर्णय प्रक्रिया से अलग रखने अथवा अंधेरे में रखे जाने की बात कही।
विपक्ष का आरोप है कि इन उच्चाधिकारियों की आपत्तियों को या तो दबा दिया गया या फिर उन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को जिस निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए था, उसमें गिरावट आई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब चुनाव संचालन करने वाले निकाय के भीतर ही पारदर्शिता पर सवाल खड़े होने लगें, तो देश के आम नागरिकों का लोकतंत्र पर से भरोसा डगमगाने लगता है。
'एंटी-इन्कम्बेंसी' के गायब होने पर खड़े किए बड़े सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गांधी ने देश की चुनावी राजनीति के एक बड़े बदलाव की ओर इशारा किया। उन्होंने भारतीय राजनीति के इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि पहले हर राज्य और केंद्र स्तर पर सत्ता विरोधी लहर यानी 'एंटी-इन्कम्बेंसी' का असर बहुत साफ दिखाई देता था। इंदिरा गांधी से लेकर तमाम बड़े नेताओं और राजनीतिक दलों को इस जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा है।
राहुल गांधी ने सवालिया लहजे में कहा कि पिछले कुछ समय से यह बुनियादी राजनीतिक ताकत अचानक गायब सी क्यों हो गई है। उन्होंने कहा,
"लोकतांत्रिक माहौल में काम करने वाला कोई भी राजनीतिक नेता या दल जनता के आक्रोश से अछूता नहीं रह सकता, लेकिन मौजूदा समय में कुछ खास राजनीतिक ताकतों के खिलाफ यह लहर नजर ही नहीं आती, जो अपने आप में एक बड़ा रहस्य है।"— राहुल गांधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष
मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफे और सरकारी गवाह बनने की मांग
इस पूरे प्रकरण के बीच राहुल गांधी ने सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निशाने पर लिया। उन्होंने कड़े शब्दों में मांग की कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने बेहद तीखा तंज कसते हुए कहा कि उन्हें इस मामले में आगे आकर 'सरकारी गवाह' बन जाना चाहिए ताकि सच्चाई देश के सामने आ सके।
कांग्रेस नेता का यह बयान राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। उनका तर्क है कि यदि चुनाव आयोग अपनी साख बचाना चाहता है और देश के संविधान को सुरक्षित रखना है, तो शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को पूरी पारदर्शिता के साथ सामने आकर हर उस सवाल का जवाब देना चाहिए जो आम जनता के वोट के अधिकार से जुड़ा हुआ है।
भारतीय जनता पार्टी का तीखा पलटवार और खंडन
कांग्रेस नेता के इन तमाम गंभीर आरोपों का जवाब देने के लिए मैदान में उतरे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने राहुल गांधी के बयानों को पूरी तरह से तथ्यहीन और अपरिपक्व करार दिया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को देश के चुनावी इतिहास और राजनीतिक वास्तविकताओं का बुनियादी ज्ञान तक नहीं है।
सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले राज्यों का जिक्र करते हुए कहा कि तमिलनाडु में 1967 के बाद, पश्चिम बंगाल में 1977 के बाद और बिहार में 1990 के बाद से कांग्रेस पार्टी कभी अपने दम पर सत्ता में वापस नहीं लौट पाई है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज कांग्रेस पार्टी की स्थिति यह हो चुकी है कि वह क्षेत्रीय दलों की बैसाखी के बिना अपने दम पर एक अदद सीट भी जीतने की स्थिति में नहीं है, और अपनी इन विफलताओं को छिपाने के लिए वह संवैधानिक संस्थाओं पर झूठे आरोप मढ़ रही है।







