नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — मध्य पूर्व के रणनीतिक गलियारों में एक बार फिर युद्ध जैसे हालात बनते दिख रहे हैं। ईरान ने कड़े शब्दों में पाकिस्तान और तुर्किए को चेतावनी दी है कि वे सऊदी अरब के इशारे पर यमन के मामलों में दखल देने से दूर रहें। तेहरान का साफ कहना है कि यदि इन देशों ने यमन के संघर्ष में सैन्य हस्तक्षेप किया, तो इसका अंजाम बहुत बुरा होगा। इस चेतावनी के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल तेज हो गई है। शांतिदूत बनकर जाने वाले देशों की भूमिका पर भी अब सवाल खड़े होने लगे हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका और ईरान के बीच सीधी भिड़ंत के संकेत भी लगातार मिल रहे हैं। ईरान की कड़ी नाकेबंदी और चेतावनी के बावजूद अमेरिकी सेना लगातार आक्रामक रुख अपना रही है। हाल ही में ओमान की खाड़ी में एक कार्गो शिप पर फाइटर जेट से हमला किए जाने की खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन भले ही सीधे युद्ध में फंसने से इनकार करता रहा हो, लेकिन पेंटागन के बयानों और जमीन पर हो रही सैन्य कार्रवाइयों से साफ है कि तनाव लगातार गहराता जा रहा है।
यमन संकट में पाकिस्तान और तुर्किए को ईरान की दो टूक चेतावनी
ईरान के इस तीखे तेवर ने खाड़ी देशों की राजनीति में नया भूचाल ला दिया है। पाकिस्तान और तुर्किए के प्रतिनिधि यमन मसले पर मध्यस्थता और शांति स्थापित करने की बात कहकर मैदान में उतरे थे। लेकिन ईरान ने इसे सीधे तौर पर सऊदी अरब के पक्ष में और अपने खिलाफ एक साजिश के रूप में देखा है। तेहरान से जारी बयानों में साफ कर दिया गया है कि विदेशी ताकतों की दखलअंदाजी इस क्षेत्र की शांति को पूरी तरह से नष्ट कर सकती है। इस चेतावनी के बाद इस्लामाबाद और अंकारा की मुश्किलें भी काफी बढ़ गई हैं।
समुद्री व्यापार के सबसे अहम रास्तों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य पर भी नियंत्रण को लेकर जंग छिड़ी हुई है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश लगातार इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक ताकत बढ़ा रहे हैं। वहीं, ईरान ने अमेरिकी युद्धपोतों और विमानों के मूवमेंट पर कड़ी नजर रख रखी है। होर्मुज के रास्ते होने वाले तेल और सामानों के परिवहन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं इस जलडमरूमध्य में होने वाली हर हलचल पर पैनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार सीधे तौर पर जुड़ा है।
श्रीलंका के पास फंसे ईरान के 19 जहाज और मानवीय संकट
इस बड़े भूराजनीतिक संघर्ष के बीच एक और मानवीय और आर्थिक संकट सामने आया है। श्रीलंका के पास समुद्र में ईरान के करीब 19 जहाज फंसे होने की खबर है। इन जहाजों पर सवार नाविकों के पास खाने-पीने की चीजों, साफ पानी और ईंधन की भारी कमी हो गई है। स्थिति यह है कि कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से कोई भी स्थानीय देश या बंदरगाह इन ईरानी जहाजों की मदद करने को तैयार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का खौफ किस तरह आम नाविकों की जान पर बन आया है, यह इसका ताजा और जीता-जागता उदाहरण है।
इन जहाजों की दुर्दशा पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी चिंता जताई है। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे के कारण कोई भी देश खुलकर मदद का हाथ बढ़ाने से बच रहा है। श्रीलंका के समुद्री क्षेत्र में फंसे ये जहाज इस समय कूटनीति और मानवता के बीच फंसे हुए हैं। ईरान सरकार इन जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए वैकल्पिक रास्तों और कूटनीतिक वार्ताओं पर जोर दे रही है, लेकिन अमेरिकी नाकेबंदी के चलते राहत मिलना आसान नहीं दिख रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाजार पर मंडराता बड़ा खतरा
ईरान और अमेरिका के बीच चल रही इस रस्साकशी का सीधा असर अब वैश्विक बाजारों पर दिखने लगा है। कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका से शेयर बाजार में निवेशकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य या ओमान की खाड़ी में हालात और ज्यादा बिगड़ते हैं, तो पूरी दुनिया में पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है।
द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि आने वाले दिनों में यह तनाव और अधिक खतरनाक रूप ले सकता है। अमेरिका का आक्रामक रवैया और ईरान की रणनीतिक जिद दोनों ही पक्षों को किसी बड़े टकराव की ओर धकेल रहे हैं। क्षेत्रीय शक्तियों जैसे सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान की चालें इस खेल को और जटिल बना रही हैं। भारत और अन्य एशियाई देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर रखनी होगी, ताकि किसी भी अप्रत्याशित परिस्थिति से समय रहते निपटा जा सके।






